ब्रह्म एक होने पर भी उपाधि भेद से अनेक है
"एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति"
१. उपाधि भेद और ब्रह्म की एकता
वेदांत का परम सत्य यही है कि वह परम तत्व 'ब्रह्म' मूलतः एक ही है। किन्तु, जैसे आकाश में सूर्य एक होने पर भी लाखों घड़ों तथा उनमें भरे जल की उपाधि (Conditioning/Limiting Adjunct) से अनेकों सूर्य भासित होते हैं, वैसे ही ब्रह्म एक होने पर भी शरीर तथा अन्तःकरणों की उपाधि से अनेक प्रतीत होता है।
- ब्रह्म वास्तव में निरूपाधिक (बिना किसी गुण या सीमा के) है।
- माया के कारण वह सोपाधिक (गुणों और सीमाओं के साथ) प्रतीत होता है।
- जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब दीखता है, वैसे ही बुद्धि में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब 'जीव' कहलाता है।
२. प्रतिबिम्ब का बिम्ब में लय
जब उन घड़ों में से जल निकाल दिया जाए या जल सूख जाए, तो उसमें दिखने वाला प्रतिबिम्ब स्वतः अपने मूल बिम्ब (सूर्य) में लय हो जाता है। ठीक इसी प्रकार:
जब जीव शरीर तथा अन्तःकरण (मन-बुद्धि) की उपाधि से रहित हो जाता है, तो वह चिदाभास (Reflected Consciousness) पुनः सर्वव्यापी ब्रह्म हो जाता है।
यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायैव , सा तुच्छत्वं।"
३. दृश्य का विनाश और आकाश की अपरिवर्तनीयता
यदि सामने दिखने वाला घड़ा फूट जाए और उसमें भरा हुआ जल सूख जाए, फिर भी उससे मूल आकाश को कोई हानि नहीं पहुँचती। घड़े के भीतर का आकाश (घटाकाश) और बाहर का महाकाश सदा से एक ही थे।
दरअसल घड़े को तो फूटना ही था और जल को सूखना ही था, क्योंकि दृश्य जगत का स्वभाव ही विनाशी है।
४. आत्मानात्मविवेक: द्रष्टा और दृश्य
जगद्गुरु भगवान् श्रीशंकराचार्य जी ने अपने ग्रन्थ 'आत्मानात्मविवेक' में विवेक की कसौटी प्रस्तुत की है:
| विशेषता | अनात्मा (दृश्य जगत) | आत्मा (ब्रह्म) |
|---|---|---|
| स्वभाव | नाशवान / विनाशी | अविनाशी / शाश्वत |
| चेतना | जड़ (Inert) | सच्चिदानंद (चेतन) |
| अनुभूति | दुःख रूप | आनंद स्वरूप |
| स्थिति | साक्ष्य (जो देखा जाए) | निरपेक्ष द्रष्टा (देखने वाला) |

