महर्षि शंख (Maharishi Shankha)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि शंख: न्याय के प्रणेता और 'शंख स्मृति' के महान रचयिता

महर्षि शंख: न्यायशास्त्र के स्तंभ और 'शंख-लिखित' स्मृति के प्रणेता

(The Sage of Impartial Justice & Dharma Shastra)

"शंखेन लिखितं प्रोक्तं धर्मशास्त्रमनुत्तमम्।" अर्थ: महर्षि शंख और लिखित द्वारा कहा गया यह धर्मशास्त्र अत्यंत उत्तम और कल्याणकारी है।

प्राचीन भारतीय न्याय परंपरा में महर्षि शंख (Maharishi Shankha) का नाम एक ऐसे ऋषि के रूप में अमर है जिन्होंने 'कानून के शासन' (Rule of Law) को व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर रखा। वे धर्मशास्त्र के महान आचार्य थे। महाभारत और पुराणों में उनके और उनके भाई महर्षि लिखित के बीच के प्रसंगों का वर्णन मिलता है, जो यह सिखाते हैं कि न्याय की दृष्टि में सगा भाई भी यदि अपराधी है, तो उसे दंड मिलना ही चाहिए। उनकी रचना 'शंख स्मृति' आज भी हिन्दू विधि और आचार-संहिता का महत्वपूर्ण स्रोत है।

📌 महर्षि शंख: एक दृष्टि में
प्रमुख भूमिका धर्मशास्त्रकार (Jurist) और महान तपस्वी
भाई महर्षि लिखित (Likhita)
मुख्य ग्रंथ शंख स्मृति (Shankha Smriti)
वंश भरद्वाज या भृगु वंश से संबंधित (विभिन्न मत)
विशेष पहचान अत्यंत निष्पक्ष न्याय और सत्यनिष्ठा
निवास बाहुदा नदी के तट पर स्थित आश्रम

1. शंख और लिखित: निष्पक्ष न्याय की अद्भुत कथा

महाभारत के शांतिपर्व में महर्षि शंख से जुड़ा एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग आता है। शंख और लिखित दोनों भाई अलग-अलग आश्रमों में रहते थे। एक दिन लिखित अपने भाई शंख के आश्रम पहुँचे, पर शंख वहां नहीं थे। भूख लगने पर लिखित ने आश्रम की वाटिका से बिना पूछे कुछ फल तोड़कर खा लिए।

  • चोरी का बोध: जब शंख लौटे, तो लिखित ने उन्हें सब बताया। शंख ने कहा— "तुमने बिना आज्ञा फल लिए, यह 'स्तेय' (चोरी) है। जाओ और राजा सुद्युम्न से इसका दंड मांगो।"
  • राजदंड: लिखित राजा के पास गए। राजा उन्हें दंड नहीं देना चाहते थे, पर लिखित के आग्रह और शंख की आज्ञा पर राजा ने उनके दोनों हाथ काट देने का दंड दिया।
  • चमत्कार: दंड भोगने के बाद जब लिखित वापस लौटे और शंख की आज्ञा से बाहुदा नदी में स्नान किया, तो उनके हाथ पुनः प्रकट हो गए। यह शंख के तप और लिखित के प्रायश्चित की शक्ति थी।

2. शंख स्मृति: सामाजिक व्यवस्था का विधान

महर्षि शंख द्वारा रचित 'शंख स्मृति' हिन्दू धर्म के 18 प्रमुख स्मृति ग्रंथों में से एक है। यह ग्रंथ मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए कड़े नियम निर्धारित करता है।

  • वर्णाश्रम धर्म: इसमें चारों वर्णों और आश्रमों के कर्तव्यों का सूक्ष्म वर्णन है।
  • प्रायश्चित विधान: यदि किसी से अनजाने में पाप हो जाए, तो उसे कैसे शुद्ध किया जाए, इसके लिए शंख ऋषि ने बहुत विस्तृत नियम दिए हैं।
  • न्याय प्रक्रिया: इसमें संपत्ति, उत्तराधिकार और ऋण (Loan) से संबंधित नियमों का भी उल्लेख है, जो तत्कालीन कानूनी व्यवस्था को दर्शाता है।

3. दार्शनिक संदेश: कानून के समक्ष समानता

महर्षि शंख का दर्शन यह है कि 'दंड' मनुष्य को शुद्ध करने का एक साधन है। उन्होंने सिखाया कि यदि कोई अपना अपराध स्वीकार कर दंड भोग लेता है, तो वह उस पाप से मुक्त हो जाता है। उनके अनुसार, न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति (राजा) का कर्तव्य है कि वह मोह और स्नेह का त्याग कर केवल धर्म का पालन करे।

4. निष्कर्ष

महर्षि शंख का जीवन हमें अनुशासन और ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है। उन्होंने सिद्ध किया कि नैतिकता केवल दूसरों को उपदेश देने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के परिवार पर भी लागू करने के लिए होती है। उनकी 'शंख स्मृति' आज भी भारतीय न्याय चेतना की जड़ों में विद्यमान है। वे एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने करुणा के साथ कठोर न्याय का सामंजस्य स्थापित किया।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • महाभारत (शांति पर्व - शंख-लिखित उपाख्यान)।
  • शंख स्मृति (धर्मशास्त्र संग्रह)।
  • पुराण कोश - महर्षि शंख का जीवन चरित्र।
  • Ancient Indian Jurisprudence - History of Dharma Shastra.

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