Budget Session 2026 Analysis: Political Deadlock और संसदीय कार्यप्रणाली पर विस्तृत रिपोर्ट

Sooraj Krishna Shastri
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बजट सत्र 2026: राजनीतिक गतिरोध और संसदीय विश्लेषण

एक विस्तृत और निष्पक्ष रिपोर्ट

प्रस्तावना एवं पृष्ठभूमि

वर्ष 2026 का बजट सत्र भारतीय राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो रहा है। आमतौर पर बजट सत्र का प्राथमिक उद्देश्य सरकार की वित्तीय योजनाओं (Financial Roadmap) को प्रस्तुत करना और उस पर चर्चा करना होता है। लेकिन, इस बार यह सत्र विधायी कार्यों से अधिक 'राजनीतिक शक्ति परीक्षण' और 'संवैधानिक परंपराओं के क्षरण' के लिए याद किया जाएगा।

31 जनवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण के साथ शुरू हुआ यह सत्र, 6 फरवरी तक आते-आते सरकार और विपक्ष के बीच एक अभूतपूर्व टकराव में बदल गया है। इस सत्र का विश्लेषण हम चार मुख्य स्तंभों के अंतर्गत करेंगे:

  • आर्थिक परिदृश्य (The Budget 2026)
  • राजनीतिक महासंग्राम (The Political Deadlock)
  • संवैधानिक संकट (Constitutional Crisis)
  • निष्कर्ष एवं भविष्य की दिशा

आर्थिक एजेंडा - बजट 2026-27 का विश्लेषण

सत्र की शुरुआत वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट से हुई। राजनीतिक शोरगुल में बजट के कई महत्वपूर्ण प्रावधान चर्चा से गायब हो गए, लेकिन विश्लेषणात्मक दृष्टि से इसके तीन मुख्य आयाम थे:

1. 'विकसित भारत' का रोडमैप

सरकार ने इस बजट को 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में एक "एक्सेलरेटर" (Accelerator) बताया है।

  • पूंजीगत व्यय (Capex): सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च में 15% की वृद्धि की है। इसका उद्देश्य रोजगार सृजन और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना है।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर: AI और 6G तकनीक के लिए विशेष आवंटन किया गया है, जो दर्शाता है कि सरकार तकनीक-आधारित शासन (e-Governance) पर जोर दे रही है।

2. मध्यम वर्ग और लोकलुभावनवाद

चुनावी राज्यों और मध्यम वर्ग के दबाव को देखते हुए, टैक्स स्लैब में कुछ बदलाव किए गए। हालाँकि, विपक्ष ने इसे "ऊंट के मुंह में जीरा" बताया।

टैक्स राहत: नई कर व्यवस्था (New Tax Regime) को और अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास किया गया, लेकिन पुरानी व्यवस्था (Old Regime) में निवेश करने वालों के लिए कोई बड़ी राहत नहीं दी गई।

3. भारत-अमेरिका व्यापार समझौता (The Hidden Factor)

बजट के साथ-साथ, 'भारत-अमेरिका व्यापार समझौते' के प्रावधानों को लेकर भी एक आर्थिक बहस छिड़ी हुई है। विपक्ष का आरोप है कि बजट में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे फार्मा और कृषि) को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने की तैयारी की गई है, जिसे "आत्मनिर्भर भारत" के विपरीत बताया जा रहा है।

राजनीतिक महासंग्राम - टकराव के बिंदु

इस सत्र का सबसे विस्फोटक पहलू विधायी नहीं, बल्कि राजनीतिक रहा है। 2026 का बजट सत्र तीन मुख्य विवादों के इर्द-गिर्द घूम रहा है:

1. पूर्व सेना प्रमुख का 'संस्मरण' और चीन मुद्दा

यह सत्र का सबसे बड़ा 'फ्लैशपॉइंट' (Flashpoint) है।

  • विवाद: पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण के लीक हुए अंशों में कथित तौर पर 2020 के गलवान संघर्ष और सरकार की निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
  • सदन में संग्राम: राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने इन अंशों को सदन के रिकॉर्ड में लाने का प्रयास किया।
  • सरकार का पलटवार: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने तर्क दिया कि एक "अप्रकाशित पुस्तक" को संसद में साक्ष्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे "सेना का राजनीतिकरण" और "राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़" करार दिया।

2. 'इंडिया' गठबंधन की आक्रामक रणनीति

विपक्ष (INDIA Alliance) इस बार केवल वॉकआउट तक सीमित नहीं रहा। उनकी रणनीति बदली हुई नजर आई:

  • वेल में धरना: विपक्षी सांसद लगातार वेल (Well of the House) में आकर नारेबाजी करते रहे।
  • माइक बंद करने का आरोप: विपक्ष ने कई बार आरोप लगाया कि उनके नेताओं (विशेषकर नेता प्रतिपक्ष) के माइक जानबूझकर म्यूट किए गए जब वे चीन का मुद्दा उठाना चाहते थे।

3. राज्यसभा बनाम लोकसभा

एक अजीब विरोधाभास देखने को मिला। राज्यसभा में जहां तीखी बहस हुई (पीएम मोदी बनाम खड़गे), वहीं लोकसभा पूरी तरह से ठप रही। यह दर्शाता है कि सरकार उच्च सदन में जवाब देने में अधिक सहज थी, लेकिन निचले सदन में टकराव टालना चाहती थी।

संवैधानिक और संसदीय संकट

इस सत्र ने भारतीय संसदीय इतिहास में कुछ ऐसी नजीरें (Precedents) पेश की हैं, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक हैं।

1. प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति (The PM's No-Show)

6 फरवरी 2026 को जो हुआ, वह ऐतिहासिक था। दशकों से परंपरा रही है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का उत्तर दोनों सदनों में देते हैं। लेकिन पीएम ने राज्यसभा में भाषण दिया और लोकसभा में नहीं आए। इसे विपक्ष ने "जवाबदेही के सिद्धांत" का उल्लंघन बताया।

2. अध्यक्ष की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह

लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति की भूमिका गहन समीक्षा के दायरे में है। विपक्ष का आरोप है कि अध्यक्ष 'रेफरी' के बजाय 'गोलकीपर' की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

3. 'सोशल मीडिया संसद' का उदय

संसद अब 'कंटेंट फैक्ट्री' बन गई है। सदन के भीतर के वीडियो आधिकारिक प्रसारण से अधिक देखे जा रहे हैं। सांसदों का व्यवहार अब विधायी चर्चा के बजाय "इंस्टाग्राम रील" के लिए डिजाइन किया जा रहा है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

संसद में जारी इस गतिरोध का आम जनता पर क्या असर पड़ रहा है?

  • करदाता के पैसे की बर्बादी: संसद चलाने का खर्च लगभग ₹2.5 लाख प्रति मिनट आता है। उत्पादकता 15% से भी कम रही है।
  • कानूनों की गुणवत्ता में गिरावट: बिल "गिलोटिन" के जरिए पास होते हैं—यानी बिना बहस के पारित।
  • जनता का मोहभंग: लगातार हंगामा और गाली-गलौज जनता के मन में राजनीति के प्रति वितृष्णा पैदा करता है।

निष्कर्ष एवं भविष्य का आकलन

यह सत्र अब तक "असहमति के प्रबंधन" में पूरी तरह विफल रहा है। सरकार अपने बहुमत के बल पर चर्चा की शर्तों को तय करना चाहती है, जबकि विपक्ष अपनी संख्या और आक्रामकता के बल पर सरकार को झुकाना चाहता है।

आगे क्या होगा? (9 फरवरी के बाद की संभावनाएं):

  • समझौता मुश्किल: सोमवार (9 फरवरी) को हंगामा और बढ़ने के आसार हैं।
  • बजट का बिना चर्चा के पास होना: इसकी पूरी संभावना है कि सरकार ध्वनि मत से बजट पारित करवा लेगी।
  • सड़क पर लड़ाई: संसद का यह गतिरोध अब सड़कों पर उतरेगा।

अंतिम विचार: सदन में हो रही गतिविधियाँ केवल वर्तमान राजनीतिक शोर नहीं हैं; यह भारतीय संसदीय लोकतंत्र के 'संक्रमण काल' का संकेत हैं। हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ संसद 'विमर्श का मंच' कम और 'पक्ष-विपक्ष के शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा' अधिक बन गई है।

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