डॉ. धर्मवीर: अथर्ववेद और वैदिक समाज के प्रखर भाष्यकार
एक विस्तृत अकादमिक और वैदिक विश्लेषण: महर्षि दयानंद सरस्वती की परंपरा के वह उद्भट विद्वान, जिन्होंने अथर्ववेद को 'जादू-टोने' के पश्चिमी लांछन से मुक्त कर उसमें राष्ट्रवाद, समाज-विज्ञान और अध्यात्म के दर्शन को पुनर्स्थापित किया।
- 1. प्रस्तावना: पाश्चात्य भ्रांतियों का निवारण और डॉ. धर्मवीर का अवतरण
- 2. जीवन परिचय: दयानंद कॉलेज से परोपकारिणी सभा (अजमेर) तक की यात्रा
- 3. अथर्ववेद: जादू-टोना नहीं, अपितु 'ब्रह्मवेद' और विज्ञान का भंडार
- 4. वैदिक समाज और पर्यावरण: 'भूमि सूक्त' का राष्ट्रवाद
- 5. ब्रह्मचर्य सूक्त: राष्ट्र-निर्माण और युवा शक्ति का मनोविज्ञान
- 6. अक्ष सूक्त और कुरीतियाँ: वैदिक समाज की कर्मण्यता का संदेश
- 7. वर्ण व्यवस्था और सामाजिक समरसता: गुण-कर्म-स्वभाव का सिद्धांत
- 8. 'काल की कसौटी पर': पत्रकारिता और साहित्यिक अवदान
- 9. निष्कर्ष: आधुनिक युग में वेद पथ के पथिक
भारतीय वेद-विज्ञान और संस्कृत साहित्य के आधुनिक विद्वानों में आचार्य डॉ. धर्मवीर (पूर्व प्रधान, परोपकारिणी सभा, अजमेर) का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। जहाँ राल्फ टी.एच. ग्रिफिथ (R.T.H. Griffith), मैक्स मूलर (Max Müller), और माइकल विट्जेल जैसे पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट्स ने वेदों का केवल भौगोलिक और ऐतिहासिक स्तरीकरण किया, वहीं डॉ. धर्मवीर ने यास्क के 'निरुक्त' और महर्षि दयानंद सरस्वती की आर्ष पद्धति (यौगिक/रूढ़िवादी नहीं) का उपयोग करते हुए वेदों का तात्त्विक, सामाजिक और आध्यात्मिक भाष्य प्रस्तुत किया।
डॉ. धर्मवीर का सबसे बड़ा योगदान अथर्ववेद (Atharvaveda) के उस पुनर्पाठ में है, जिसे पश्चिमी विद्वानों ने जानबूझकर "जादू-टोने, तंत्र-मंत्र और आदिम अंधविश्वासों की किताब" कहकर प्रचारित किया था। डॉ. धर्मवीर ने अपने अकादमिक शोध, प्रवचनों और लेखनी के माध्यम से सिद्ध किया कि अथर्ववेद वास्तव में उन्नत समाज-विज्ञान (Sociology), आयुर्वेद (Medicine), और राष्ट्रनीति (Statecraft) का सर्वोच्च ग्रन्थ है।
| पूरा नाम | आचार्य डॉ. धर्मवीर (विद्यालंकार) |
| परलोक गमन | 26 अक्टूबर 2016 |
| प्रमुख संस्थान | परोपकारिणी सभा (अजमेर), दयानंद कॉलेज, महर्षि दयानंद शोधपीठ (पंजाब विश्वविद्यालय) |
| धारित पद | पूर्व प्रधान एवं मंत्री (परोपकारिणी सभा), संस्कृत प्राध्यापक, सम्पादक 'परोपकारी' |
| मुख्य शोध क्षेत्र | अथर्ववेद भाष्य, वैदिक समाजशास्त्र, उपनिषद, महर्षि दयानंद का दर्शन |
| प्रमुख कृतियां/लेखन | 'काल की कसौटी पर' (सम्पादकीय लेखों का संग्रह - 3 खण्ड), वेद-विज्ञान प्रवचनमाला |
| वैचारिक दृष्टिकोण | आर्ष पद्धति (यौगिक अर्थ), पश्चिमी इंडोलॉजी का अकादमिक खंडन, कर्म-आधारित वर्ण व्यवस्था |
2. जीवन परिचय: दयानंद कॉलेज से परोपकारिणी सभा तक की यात्रा
डॉ. धर्मवीर का जीवन महर्षि दयानंद सरस्वती के आदर्शों का जीवंत स्वरूप था। सन् 1974 में वे दयानन्द कॉलेज, अजमेर में संस्कृत के प्राध्यापक नियुक्त हुए। अध्यापन के साथ-साथ उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय (चंडीगढ़) में महर्षि दयानन्द शोधपीठ से प्रख्यात विद्वान डॉ. भवानीलाल भारतीय के निर्देशन में अपनी पीएच.डी. पूर्ण की।
उनका जीवन केवल अकादमिक नहीं था, बल्कि वे एक प्रायोगिक वेदानुयायी थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि वे अपने घर में अपनी पुत्रियों के साथ केवल 'संस्कृत' भाषा में ही संवाद करेंगे, और इस संकल्प का उन्होंने आजीवन निर्वाह किया। वे लगभग चार दशकों तक महर्षि दयानंद द्वारा स्थापित संस्था 'परोपकारिणी सभा' (अजमेर) से जुड़े रहे और इसके प्रधान के रूप में वैदिक साहित्य के प्रकाशन और ऋषि उद्यान के गुरुकुल में छात्रों के मार्गदर्शन में अभूतपूर्व योगदान दिया।
3. अथर्ववेद: जादू-टोना नहीं, अपितु 'ब्रह्मवेद' और विज्ञान का भंडार
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के पाश्चात्य विद्वानों (जैसे मॉनियर विलियम्स, ग्रिफिथ) ने एक नैरेटिव गढ़ा कि ऋग्वेद जहाँ 'प्रकृति पूजा' का ग्रंथ है, वहीं अथर्ववेद आर्यों के पतन के बाद अनार्यों से सीखे गए 'जादू-टोने' (Sorcery and Witchcraft) का संकलन है।
डॉ. धर्मवीर ने अपने 'वेद-विज्ञान' व्याख्यानमाला में स्पष्ट किया कि वेदों में प्रयुक्त शब्द 'रूढ़' (Fixed meaning) नहीं हैं, बल्कि 'यौगिक' (Derivative/Root-based) हैं।
पाश्चात्य विचारकों ने अथर्ववेद में वर्णित 'पिशाच', 'राक्षस', 'असुर' और 'कृमि' शब्दों को भूत-प्रेत और मिथकीय दानव मान लिया। डॉ. धर्मवीर ने निरुक्त के आधार पर सिद्ध किया कि ये शब्द वास्तव में:
1. चिकित्सा विज्ञान में: रोगों को उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म कीटाणुओं (Bacteria/Viruses) के लिए प्रयुक्त हुए हैं (जिन्हें मारने के लिए अथर्ववेद में विभिन्न औषधियों का वर्णन है)।
2. समाज-विज्ञान में: समाज को खोखला करने वाले दुष्ट, शोषक और भ्रष्ट प्रवृत्तियों वाले अपराधियों के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
अथर्ववेद को भारतीय परंपरा में 'ब्रह्मवेद' कहा जाता है। इसमें अध्यात्म, ईश्वर के स्वरूप (स्कम्भ सूक्त), और आयुर्वेद का सबसे विस्तृत वर्णन है। डॉ. धर्मवीर ने अथर्ववेद को मनुष्य की 'शारीरिक, मानसिक और राष्ट्रीय व्याधियों' को दूर करने वाले महान शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया।
4. वैदिक समाज और पर्यावरण: 'भूमि सूक्त' का राष्ट्रवाद
अथर्ववेद के 12वें काण्ड का पहला सूक्त 'भूमि सूक्त' (पृथ्वी सूक्त) है। डॉ. धर्मवीर ने इस सूक्त को विश्व का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक 'राष्ट्रगीत' और 'पर्यावरण संरक्षण घोषणापत्र' (Environmental Manifesto) माना है।
अर्थात् "भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।" डॉ. धर्मवीर ने अपने विश्लेषण में समझाया कि वैदिक समाज में पृथ्वी को जड़ पदार्थ (Dead Matter) नहीं माना गया। अथर्ववेद स्पष्ट निर्देश देता है कि भूमि के खनिजों, वनों और जल का दोहन इस प्रकार होना चाहिए कि उसके मर्म (हृदय) को चोट न पहुंचे:
- पर्यावरण चेतना: डॉ. धर्मवीर अथर्ववेद (12.1.35) का उद्धरण देते थे जहाँ मनुष्य पृथ्वी से प्रार्थना करता है कि "हे भूमि! मैं तेरे भीतर जो कुछ भी खोदू (खनन करूँ), वह शीघ्र भर जाए। हे शुद्ध करने वाली पृथ्वी! मैं तेरे मर्मस्थल और हृदय को आघात न पहुंचाऊँ।"
- सामाजिक समता: भूमि सूक्त बताता है कि यह पृथ्वी अनेक भाषाएं बोलने वाले और अनेक धर्मों (स्वभावों) को मानने वाले लोगों को एक माता के समान धारण करती है। यह वैदिक समाज की सहिष्णुता और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का आदि-मूल है।
5. ब्रह्मचर्य सूक्त: राष्ट्र-निर्माण और युवा शक्ति का मनोविज्ञान
डॉ. धर्मवीर का अथर्ववेद के 'ब्रह्मचर्य सूक्त' (काण्ड 11, सूक्त 5) पर किया गया विवेचन उनके शैक्षिक और सामाजिक दर्शन का मुख्य बिंदु है। आज के युग में जहाँ 'ब्रह्मचर्य' को केवल शारीरिक अर्थों में संकुचित कर दिया गया है, डॉ. धर्मवीर ने इसके 'व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय अर्थ' को उजागर किया।
अथर्ववेद का मंत्र है: "ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति" (अथर्ववेद ११.५.१७)
अर्थात् राजा भी अपने राष्ट्र की रक्षा केवल सेनाओं से नहीं, बल्कि ब्रह्मचर्य के तप (संयम, चरित्र-निर्माण, और ज्ञानार्जन) से करता है। डॉ. धर्मवीर ने व्याख्या की कि वैदिक समाज का आधार 'गुरुकुल व्यवस्था' थी। एक आचार्य अपने शिष्य को उसी प्रकार धारण करता है, जैसे माता अपने गर्भ को (तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति)। यह तीन रातें अविद्या के नाश और ज्ञान के उदय का प्रतीक हैं। समाज की नींव मजबूत चरित्र वाले युवाओं पर ही टिक सकती है।
6. अक्ष सूक्त और कुरीतियाँ: वैदिक समाज की कर्मण्यता का संदेश
ऋग्वेद और अथर्ववेद दोनों में द्यूत (जुआ) खेलने के विनाशकारी परिणामों पर चेतावनी दी गई है। ऋषि उद्यान में डॉ. धर्मवीर जी द्वारा छात्रों को पढ़ाए गए 'अक्ष सूक्त' (Aksh Sukta) के प्रवचन अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वैदिक समाज कोई काल्पनिक 'स्वर्ग' नहीं था जहाँ कोई बुराई नहीं थी। वहाँ भी जुआरी और समाज-कंटक थे। किंतु अथर्ववेद का संदेश बहुत स्पष्ट है— "अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व" (जूआ मत खेल, कृषि कर)। डॉ. धर्मवीर ने आधुनिक शेयर बाजार, सट्टेबाजी और शॉर्टकट से अमीर बनने की लालसा को इस सूक्त से जोड़ते हुए 'परिश्रम और पुरुषार्थ' (श्रम-संस्कृति) को वैदिक समाज का मूल आधार बताया।
7. वर्ण व्यवस्था और सामाजिक समरसता: गुण-कर्म-स्वभाव का सिद्धांत
डॉ. धर्मवीर ने महर्षि दयानंद के पदानुसरण में यह अकाट्य तर्क दिया कि वैदिक समाज की 'वर्ण-व्यवस्था' (Varna System) जन्म-आधारित (जातिवाद) नहीं थी। यह एक पूर्णतः वैज्ञानिक, 'गुण-कर्म और स्वभाव' पर आधारित सामाजिक श्रम-विभाजन (Division of Labor) था।
- अथर्ववेद का प्रमाण: उन्होंने अथर्ववेद के मन्त्रों (जैसे 19.32.8) का उद्धरण दिया जहाँ प्रार्थना की गई है कि "मुझे ब्राह्मण (विद्वान), क्षत्रिय (रक्षक), शूद्र (श्रमशील) और आर्य (वैश्य) सभी का प्रिय बनाओ।" यह जन्म-आधारित छुआछूत को सिरे से नकारता है।
- नारी का स्थान: अथर्ववेद में स्त्री शिक्षा पर सर्वाधिक बल है। डॉ. धर्मवीर ने उन मन्त्रों की विशद व्याख्या की जहाँ स्त्री को 'ब्रह्मचर्य' का पालन कर विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह के योग्य माना गया है (ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् - अथर्ववेद 11.5.18)।
8. 'काल की कसौटी पर': पत्रकारिता और साहित्यिक अवदान
एक उच्च कोटि के वक्ता और भाष्यकार होने के साथ-साथ, डॉ. धर्मवीर एक सिद्धहस्त लेखक भी थे। वे परोपकारिणी सभा के मुखपत्र 'परोपकारी' पत्रिका के संपादक रहे।
उनके द्वारा लिखे गए सम्पादकीय लेखों का संग्रह "काल की कसौटी पर" (तीन खण्डों में) प्रकाशित हुआ है। इन लेखों में उन्होंने वैदिक दृष्टिकोण से समकालीन राजनीतिक, सामाजिक, और धार्मिक ज्वलंत विषयों का बेबाक और तर्कपूर्ण विश्लेषण किया है। उनके लेख हमेशा पाठकों को 'सत्यासत्य' के निर्णय में स्वावलंबी बनाने पर जोर देते थे, ताकि कोई भी अज्ञानी व्यक्ति या पाश्चात्य इतिहासकार धर्मपरायण जनता को भ्रमित न कर सके। उनकी पुत्री सुयशा आर्य और अन्य शिष्यों ने उनके वेद-विज्ञान के ज्ञान को डिजिटल और मुद्रित रूप में संरक्षित करने का भगीरथ कार्य किया है।
9. निष्कर्ष: आधुनिक युग में वेद पथ के पथिक
आचार्य डॉ. धर्मवीर केवल एक प्राध्यापक या विद्वान नहीं थे; वे वैदिक संस्कृति के मौन तपस्वी थे। उनका जीवन "परोपकाराय सतां विभूतयः" का जीता-जागता प्रमाण था।
जहाँ माइकल विट्जेल जैसे इंडोलॉजिस्ट वेदों को अतीत का एक मृत भाषाई ढांचा मानते हैं, वहीं डॉ. धर्मवीर ने अथर्ववेद को एक 'जीवंत संविधान' (Living Constitution) के रूप में प्रस्तुत किया, जो आज की पर्यावरणीय आपदाओं, सामाजिक असमानता, और युवाओं के चारित्रिक पतन का सटीक समाधान प्रस्तुत करता है। अथर्ववेद पर उनके प्रवचन और व्याख्याएं आज भी आर्य समाज और वैश्विक वैदिक-समुदाय के लिए प्रकाश-स्तंभ (Lighthouse) का कार्य कर रही हैं।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- काल की कसौटी पर (डॉ. धर्मवीर के सम्पादकीय लेखों का संग्रह - खण्ड 1, 2, 3) - प्रकाशक: परोपकारिणी सभा, अजमेर।
- वेद पथ के पथिक (आचार्य धर्मवीर स्मृति ग्रन्थ) - सम्पादक: ज्योत्सना 'धर्मवीर', दिनेशचन्द्र शर्मा।
- अथर्ववेद भाष्य - महर्षि दयानन्द सरस्वती और स्वामी ब्रह्ममुनि।
- 'परोपकारी' पत्रिका के विशेषांक एवं डॉ. धर्मवीर के वेद-विज्ञान प्रवचन (ऋषि उद्यान, अजमेर)।
- The Vedic Age and Dr. Dharamveer's discourses on Brahmacharya & Bhumi Sukta.
