प्रोफेसर जन गोंडा: वैदिक अनुष्ठान और भाषाशास्त्र पर वैश्विक शोध के ध्रुव तारा
एक विस्तृत अकादमिक और भाषावैज्ञानिक विश्लेषण: नीदरलैंड्स का वह 'मौन तपस्वी' जिसने 70 से अधिक पुस्तकें लिखकर पश्चिमी इंडोलॉजी में 'तथ्यों' (Philology) को 'कल्पनाओं' (Comparative Mythology) से ऊपर स्थापित किया (The Giant of Dutch Indology)
- 1. प्रस्तावना: 20वीं सदी का 'एकल महाकोश'
- 2. जीवन परिचय: गौडा (Gouda) से यूट्रेक्ट तक
- 3. शोध पद्धति: ग्रंथों की 'सूक्ष्म चीर-फाड़' (Philology)
- 4. वैदिक शब्दों का अर्थ-विज्ञान (Semantics of Veda)
- 5. 'द विजन ऑफ द वेदिक पोएट्स': ऋषियों की दृष्टि
- 6. विष्णु और शिव: प्रारंभिक हिंदू धर्म का विकास
- 7. 'वैदिक साहित्य का इतिहास': एक मानक ग्रंथ
- 8. निष्कर्ष: पाठ (Text) का परम उपासक
इंडोलॉजी के इतिहास में कुछ विद्वान अपने क्रांतिकारी सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं (जैसे मैक्स मूलर या माइकल विट्जेल), लेकिन कुछ विद्वान अपनी 'तथ्यात्मक गहराई' (Factual Depth) और 'विशाल उत्पादन' (Prodigious Output) के लिए पूजे जाते हैं। डच विद्वान जन गोंडा (Jan Gonda) इसी दूसरी श्रेणी के शिखर पुरुष थे।
गोंडा ने अपने जीवनकाल में संस्कृत भाषा, वैदिक अनुष्ठानों और भारतीय धर्मों पर 70 से अधिक पुस्तकें और 600 से अधिक शोध पत्र लिखे। उनकी विशेषता यह थी कि वे अन्य पश्चिमी विद्वानों की तरह हवा-हवाई निष्कर्ष निकालने के बजाय, वैदिक संस्कृत के एक-एक शब्द, उसके व्याकरण (Syntax) और उसके अर्थ (Semantics) की सूक्ष्म चीर-फाड़ करते थे।
| पूरा नाम | जन गोंडा (Jan Gonda) |
| काल | 14 अप्रैल 1905 – 28 जुलाई 1991 |
| राष्ट्रीयता | डच (नीदरलैंड्स) |
| संस्थान | यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय (Utrecht University) |
| मुख्य शोध क्षेत्र | वैदिक भाषाशास्त्र (Linguistics), सिंटैक्स, अनुष्ठान (Rituals), प्रारंभिक हिंदू धर्म |
| महानतम कृतियाँ | Vedic Literature, Aspects of Early Viṣṇuism, The Vision of the Vedic Poets |
| उपाधि/सम्मान | रॉयल नीदरलैंड्स एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य |
2. जीवन परिचय: गौडा (Gouda) से यूट्रेक्ट तक
जन गोंडा का जन्म नीदरलैंड्स के गौडा में हुआ था। उन्होंने लीडेन और यूट्रेक्ट विश्वविद्यालयों से संस्कृत, इंडो-यूरोपीय भाषाविज्ञान और अरबी का अध्ययन किया। मात्र 27 वर्ष की आयु में (1932) उन्हें यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय में संस्कृत और इंडो-यूरोपीय भाषाशास्त्र का प्रोफेसर नियुक्त कर दिया गया, जहाँ उन्होंने 1976 तक कार्य किया।
मौन तपस्वी: उनकी कार्यशैली एक मशीन जैसी थी। वे सुबह जल्दी उठते थे और दिन भर केवल ग्रंथों का अध्ययन और लेखन करते थे। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय विद्या पर 70 पुस्तकें लिखने वाले गोंडा ने अपने जीवन के अधिकांश भाग में कभी भारत की यात्रा नहीं की। उनके लिए 'ग्रंथ' ही उनका भारत था। वे एक 'आर्मचेयर स्कॉलर' (Armchair Scholar) थे, लेकिन उनकी प्रामाणिकता पर कोई भारतीय पंडित भी उंगली नहीं उठा सकता था।
3. शोध पद्धति: ग्रंथों की 'सूक्ष्म चीर-फाड़' (Philology)
गोंडा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मेथडोलॉजी (Methodology) थी। 19वीं और 20वीं सदी के कई यूरोपीय विद्वान भारतीय ग्रंथों की तुलना ग्रीक या रोमन मिथकों से करते थे (Comparative Mythology)। गोंडा ने इस प्रवृत्ति का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि किसी शब्द (जैसे 'असुर' या 'ब्रह्म') का अर्थ निकालने के लिए हमें यह नहीं देखना चाहिए कि ईरान या ग्रीस में वैसा शब्द क्या अर्थ देता है। इसके बजाय, हमें यह देखना चाहिए कि स्वयं ऋग्वेद के भीतर उस शब्द का किन-किन वाक्यों (Syntax) में प्रयोग हुआ है।
उन्होंने "Stylistic Repetition in the Veda" लिखकर बताया कि वेदों में शब्दों का बार-बार दोहराव (Repetition) कोई साहित्यिक दोष नहीं है, बल्कि वह मंत्र की शक्ति (Mantra Power) को बढ़ाने की एक जानबूझकर की गई तकनीकी व्यवस्था है।
4. वैदिक शब्दों का अर्थ-विज्ञान (Semantics of Veda)
गोंडा ने संस्कृत के प्रमुख शब्दों की गहरी मीमांसा (Semantics) की, जिसके लिए वे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुए।
- ओजस् (Ojas): उन्होंने 'Ancient Indian Ojas, Latin Augos and the Indo-European Nouns in -es/-os' नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने सिद्ध किया कि 'ओजस्' केवल शारीरिक ताकत नहीं है, बल्कि यह एक रचनात्मक और दैवीय ऊर्जा (Creative Vitality) है।
- ब्रह्म (Brahman): पश्चिमी विद्वान अक्सर 'ब्रह्म' का अनुवाद 'मैजिक' (जादू) या 'विश्व-आत्मा' कर देते थे। गोंडा ने स्पष्ट किया कि वैदिक काल में 'ब्रह्म' का मूल अर्थ 'मन्त्र की वह शक्ति है जो सत्य को मूर्त रूप देती है' (Power of the spoken truth)।
- माया (Maya): उन्होंने इसे केवल 'भ्रम' (Illusion) मानने से इनकार किया और वेदों के आधार पर इसे देवताओं की 'अद्भुत निर्माण शक्ति' (Incomprehensible creative power) बताया।
5. 'द विजन ऑफ द वेदिक पोएट्स': ऋषियों की दृष्टि
उनकी सबसे प्रसिद्ध दार्शनिक पुस्तकों में से एक है—"The Vision of the Vedic Poets" (1963)।
इस पुस्तक में गोंडा ने यह विश्लेषण किया कि वैदिक ऋषियों को मंत्र कैसे प्राप्त हुए। उन्होंने शब्द 'धी' (Dhī - Vision/Intuition) का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि ऋषि साधारण कवि नहीं थे; वे ऐसे दृष्टा थे जिन्हें गहन ध्यान की अवस्था में ब्रह्मांड के सत्य 'दिखाई' (Vision) देते थे, और फिर वे उस 'दृष्टि' को भाषा (मंत्र) के सांचे में ढालते थे। यह पुस्तक वेदों को एक रहस्यवादी (Mystic) और आध्यात्मिक गहराई प्रदान करती है।
6. विष्णु और शिव: प्रारंभिक हिंदू धर्म का विकास
वैदिक साहित्य के साथ-साथ गोंडा ने पुराणों और महाकाव्यों पर भी गहरा कार्य किया। उनकी पुस्तक "Aspects of Early Viṣṇuism" (1954) और "Viṣṇuism and Śivaism: A Comparison" (1970) लैंडमार्क मानी जाती हैं।
अन्य विद्वान मानते थे कि विष्णु ऋग्वेद में एक छोटे देवता थे जो बाद में प्रमुख हो गए। गोंडा ने तर्क दिया कि विष्णु शुरुआत से ही 'अंतरिक्ष के रक्षक' और 'यज्ञ की ऊर्जा' के प्रतीक थे। विष्णु के 'तीन कदम' (Trivikrama) ब्रह्मांडीय जीवन शक्ति (Cosmic Life Force) के प्रसार का प्रतीक हैं। उन्होंने यह भी दिखाया कि कैसे वैदिक 'रुद्र' धीरे-धीरे एक करुणावान 'शिव' के रूप में विकसित हुए।
7. 'वैदिक साहित्य का इतिहास': एक मानक ग्रंथ
जर्मन विद्वान विंटरनिट्ज़ के बाद, यदि किसी ने भारतीय साहित्य का सबसे व्यवस्थित इतिहास लिखा है, तो वह गोंडा द्वारा संपादित "A History of Indian Literature" श्रृंखला है।
इस श्रृंखला के 'Vedic Literature (Saṃhitās and Brāhmaṇas)' (1975) नामक खंड को गोंडा ने स्वयं लिखा। इसमें उन्होंने चारों वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों के रचनाकाल, शैली, विषयवस्तु और उनके सामाजिक-धार्मिक महत्व का ऐसा सटीक वर्णन किया है जो आज भी हर इंडोलॉजी के छात्र के लिए 'टेक्स्टबुक' (Textbook) है।
8. निष्कर्ष: पाठ (Text) का परम उपासक
1991 में जन गोंडा का निधन हो गया, लेकिन वे अपने पीछे इंडोलॉजी की एक ऐसी विरासत छोड़ गए जिसकी बराबरी शायद ही कोई कर सके।
जहाँ आधुनिक विद्वान 'सिद्धांतों' (Theories) के पीछे भागते हैं, गोंडा ने हमें सिखाया कि किसी भी सिद्धांत से पहले 'मूल पाठ' (Original Text) और 'व्याकरण' का सम्मान करना आवश्यक है। उन्होंने वेदों को किसी विचारधारा के चश्मे से नहीं देखा, बल्कि वेदों को उन्हीं की भाषा में बोलने दिया। जन गोंडा सही मायनों में 20वीं सदी के पश्चिमी अकादमिक जगत के सबसे प्रामाणिक 'वेद-व्यास' थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Vedic Literature: Samhitās and Brāhmaṇas - Jan Gonda.
- The Vision of the Vedic Poets - Jan Gonda.
- Aspects of Early Viṣṇuism - Jan Gonda.
- Stylistic Repetition in the Veda - Jan Gonda.
- Notes on Brahman - Jan Gonda.
