डॉ. एस. राधाकृष्णन: भारतीय दर्शन के विश्व-प्रवक्ता और दार्शनिक राष्ट्रपति
एक विस्तृत दार्शनिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह शिक्षक जिसने पश्चिम की 'बुद्धि' और पूरब की 'अंतर्दृष्टि' (Intuition) को एक साथ मिलाया (The Philosopher-King of India)
- 1. प्रस्तावना: पूरब और पश्चिम का सेतु
- 2. जीवन परिचय: तिरुत्तनी से राष्ट्रपति भवन तक
- 3. ईसाई मिशनरियों को उत्तर और हिंदू धर्म की रक्षा
- 4. दार्शनिक विचार: 'अंतर्प्रज्ञा' और 'आदर्शवाद'
- 5. प्रमुख कृतियाँ: 'भारतीय दर्शन' और 'हिंदू जीवन दृष्टि'
- 6. नव-वेदांत (Neo-Vedanta): अद्वैत की आधुनिक व्याख्या
- 7. विश्व धर्म की परिकल्पना (Religion of the Spirit)
- 8. शिक्षक दिवस: एक शिक्षक का सम्मान
- 9. निष्कर्ष: दार्शनिक राजा
बीसवीं सदी में यदि किसी एक व्यक्ति ने भारतीय दर्शन (Indian Philosophy) को पश्चिमी जगत में सम्मानजनक स्थान दिलाया, तो वे थे—डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan)। वे केवल भारत के दूसरे राष्ट्रपति नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक युग के सबसे महान दार्शनिकों में से एक थे।
यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने कहा था कि "एक आदर्श राज्य वह है जहाँ राजा दार्शनिक हो या दार्शनिक राजा हो।" डॉ. राधाकृष्णन के रूप में भारत ने इस आदर्श को जिया। उन्होंने मैक्स मूलर और कीथ जैसे विद्वानों के कार्य को आगे बढ़ाते हुए सिद्ध किया कि भारतीय दर्शन केवल 'रहस्यवाद' नहीं, बल्कि 'तर्क और अनुभव' का विज्ञान है।
| पूरा नाम | सर्वपल्ली राधाकृष्णन |
| काल | 5 सितंबर 1888 – 17 अप्रैल 1975 |
| जन्म स्थान | तिरुत्तनी, तमिलनाडु (मद्रास प्रेसीडेंसी) |
| शिक्षा | मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज (दर्शनशास्त्र में एम.ए.) |
| प्रमुख पद (अकादमिक) | कुलपति (BHU, आंध्र वि.वि.), स्पाल्डिंग प्रोफेसर (ऑक्सफोर्ड) |
| प्रमुख पद (राजनीतिक) | भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति, भारत के द्वितीय राष्ट्रपति (1962-67) |
| प्रमुख कृतियाँ | Indian Philosophy (2 Vols), The Hindu View of Life, An Idealist View of Life |
| सम्मान | भारत रत्न (1954), टेम्पलटन पुरस्कार |
2. जीवन परिचय: तिरुत्तनी से राष्ट्रपति भवन तक
राधाकृष्णन का जन्म एक गरीब तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुत्तनी और तिरुपति में हुई। बाद में वे **मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज** गए। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने दर्शनशास्त्र (Philosophy) को अपनी पसंद से नहीं चुना था, बल्कि इसलिए चुना क्योंकि उनके चचेरे भाई ने उन्हें दर्शनशास्त्र की पुरानी किताबें मुफ्त में दे दी थीं। लेकिन यही संयोग उनके और भारत के लिए वरदान बन गया।
करियर की ऊंचाइयां: वे मैसूर और कलकत्ता विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर रहे। 1936 में, वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में **'स्पाल्डिंग प्रोफेसर ऑफ ईस्टर्न रिलीजन्स एंड एथिक्स'** बनने वाले पहले एशियाई बने। यह वही कुर्सी थी जिस पर कभी मैक्स मूलर बैठना चाहते थे।
3. ईसाई मिशनरियों को उत्तर और हिंदू धर्म की रक्षा
मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान, राधाकृष्णन ने देखा कि ईसाई मिशनरी हिंदू धर्म की आलोचना करते थे। वे कहते थे कि "वेदांत में नैतिकता (Ethics) नहीं है" और "यह जीवन को नकारने वाला (Life-negating) धर्म है।"
इस आलोचना ने युवा राधाकृष्णन को झकझोर दिया। उन्होंने हिंदू धर्म का गहरा अध्ययन किया और अपनी एम.ए. थीसिस **"The Ethics of the Vedanta"** (वेदांत का नीतिशास्त्र) लिखी।
उनका तर्क: उन्होंने अल्बर्ट श्वाइट्ज़र (Albert Schweitzer) जैसे आलोचकों को जवाब दिया कि वेदांत संसार को 'मिथ्या' कहकर भागना नहीं सिखाता, बल्कि यह सिखाता है कि "सबमें एक ही ब्रह्म है", जो **सर्वोच्च नैतिकता** और मानवतावाद का आधार है।
4. दार्शनिक विचार: 'अंतर्प्रज्ञा' और 'आदर्शवाद'
राधाकृष्णन का दर्शन **'पूर्ण आदर्शवाद'** (Absolute Idealism) कहलाता है।
राधाकृष्णन का सबसे प्रमुख सिद्धांत **'अंतर्प्रज्ञा'** है।
- बुद्धि (Intellect): यह विश्लेषण करती है, चीजों को तोड़कर देखती है। यह विज्ञान के लिए ठीक है।
- अंतर्प्रज्ञा (Intuition): यह समग्रता (Whole) को देखती है। यह अनुभवजन्य ज्ञान है।
वे कहते हैं: "ज्ञान केवल जानकारी इकट्ठा करना नहीं है, बल्कि आत्मा का रूपांतरण है।" सत्य को केवल तर्कों से नहीं, बल्कि सीधे अनुभव (Direct Experience) से जाना जा सकता है।
5. प्रमुख कृतियाँ: 'भारतीय दर्शन' और 'हिंदू जीवन दृष्टि'
राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को अंग्रेजी भाषा में इतना सुगम बना दिया कि पूरी दुनिया चकित रह गई।
- Indian Philosophy (Vol I & II): यह उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है। इसमें उन्होंने वेदों से लेकर रामानुज तक के दर्शन का निष्पक्ष और व्यवस्थित इतिहास लिखा। इसे आज भी मानक (Standard) पाठ्यपुस्तक माना जाता है।
- The Hindu View of Life (1927): इसमें उन्होंने हिंदू धर्म को किसी 'कट्टर मत' (Dogma) के बजाय **"जीवन जीने की एक पद्धति"** (Way of Life) बताया। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म एक संग्रहालय नहीं है, बल्कि एक जीवित परंपरा है जो समय के साथ बदलती रहती है।
- An Idealist View of Life: इसमें उन्होंने आधुनिक विज्ञान और नास्तिकता की चुनौतियों के बीच 'धर्म' की प्रासंगिकता सिद्ध की।
6. नव-वेदांत (Neo-Vedanta): अद्वैत की आधुनिक व्याख्या
राधाकृष्णन परंपरागत रूप से **शंकर के अद्वैत वेदांत** के समर्थक थे, लेकिन उन्होंने इसे आधुनिक संदर्भ में नया रूप दिया। इसे **'नव-वेदांत'** कहा जाता है।
माया का अर्थ: शंकराचार्य के लिए जगत 'माया' (Illusion) था। राधाकृष्णन ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि जगत 'असत्य' नहीं है, बल्कि 'सापेक्ष' (Relative) है। संसार का अपना महत्व है। हमें संसार में रहकर कर्म करना चाहिए, लेकिन उसमें लिप्त नहीं होना चाहिए। इस व्याख्या ने वेदांत को समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण से जोड़ दिया।
7. विश्व धर्म की परिकल्पना (Religion of the Spirit)
राधाकृष्णन किसी संप्रदाय में बंधे नहीं थे। वे **"आत्मा के धर्म"** (Religion of the Spirit) की बात करते थे।
उनका मानना था कि भविष्य का धर्म तर्क और विज्ञान के साथ चलेगा और वह मानवतावादी होगा।
8. शिक्षक दिवस: एक शिक्षक का सम्मान
जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तो उनके कुछ छात्र और मित्र उनका जन्मदिन (5 सितंबर) मनाना चाहते थे। राधाकृष्णन ने विनम्रता से कहा:
"मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय, यदि 5 सितंबर को **'शिक्षक दिवस'** के रूप में मनाया जाए, तो मुझे गर्व होगा।"
उनका मानना था कि शिक्षक वह नहीं जो केवल तथ्यों को रटाए, बल्कि वह है जो छात्र को सोचना सिखाए और उसे एक बेहतर इंसान बनाए। वे कहते थे, "सच्चे शिक्षक वे हैं जो हमारे लिए सोचने में मदद करते हैं।"
9. निष्कर्ष: दार्शनिक राजा
डॉ. राधाकृष्णन एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिनमें **सरस्वती** (ज्ञान) और **लक्ष्मी** (राजसत्ता) का दुर्लभ मिलन था। वे सोवियत संघ में राजदूत रहे, जहाँ स्टालिन जैसा तानाशाह भी उनकी विद्वत्ता का प्रशंसक बन गया था।
उन्होंने भारत को 'धर्मनिरपेक्ष' (Secular) राज्य बनाने का समर्थन किया, जिसका अर्थ 'धर्म-विरोधी' होना नहीं, बल्कि 'सभी धर्मों का सम्मान' करना था। उन्होंने भारतीय दर्शन को 'पुस्तकालयों' से निकालकर 'विश्व मंच' पर प्रतिष्ठित किया। वे आधुनिक भारत के **बौद्धिक प्रकाश स्तंभ** (Intellectual Lighthouse) हैं।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Indian Philosophy (Vol I & II) - S. Radhakrishnan.
- The Hindu View of Life - S. Radhakrishnan.
- An Idealist View of Life - S. Radhakrishnan.
- The Principal Upanishads (Translation & Commentary) - S. Radhakrishnan.
- Radhakrishnan: A Biography - S. Gopal.
