डॉ. सुधीर कुमार गुप्त: वैदिक संहिताओं के शब्दार्थ और निरुक्त के वैज्ञानिक शोधकर्ता | Dr. Sudhir Kumar Gupta

Sooraj Krishna Shastri
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डॉ. सुधीर कुमार गुप्त: वैदिक संहिताओं के शब्दार्थ और निरुक्त के वैज्ञानिक शोधकर्ता

डॉ. सुधीर कुमार गुप्त: वैदिक संहिताओं के शब्दार्थ और निरुक्त के वैज्ञानिक शोधकर्ता

आधुनिक प्राच्यविद्या और आर्य समाज के वह मूर्धन्य आचार्य, जिन्होंने यास्क मुनि और महर्षि दयानन्द सरस्वती की 'यौगिक' (Derivative) वेद-भाष्य पद्धति को आधुनिक भाषाविज्ञान (Linguistics) और शब्दार्थ-मीमांसा (Semantics) के तार्किक धरातल पर विश्व पटल पर स्थापित किया।

1. प्रस्तावना: वैदिक शब्दार्थ की उलझन और आधुनिक शोध की आवश्यकता

वेद विश्व का प्राचीनतम साहित्य हैं, परन्तु उनकी भाषा (वैदिक संस्कृत) लौकिक संस्कृत से अत्यंत भिन्न है। जब मैक्समूलर, ग्रिफिथ और सायण जैसे विद्वानों ने वेदों का अनुवाद किया, तो उन्होंने वैदिक शब्दों का अर्थ तत्कालीन लौकिक या पौराणिक कहानियों के आधार पर (रूढ़ अर्थ में) कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि वेद केवल 'आदिम कबीलों के प्राकृतिक-गीत' या 'इतिहास की पुस्तकों' तक सीमित होकर रह गए।

इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने के लिए जिस शब्दार्थ-मीमांसा (Vedic Semantics) की आवश्यकता थी, उसे डॉ. सुधीर कुमार गुप्त (Dr. Sudhir Kumar Gupta) ने पूर्ण किया। उन्होंने महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा पुनर्जीवित की गई 'आर्ष पद्धति' (जिसमें शब्दों के अर्थ उनकी 'धातुओं' या Roots से निकाले जाते हैं) का गहरा वैज्ञानिक और भाषाई अध्ययन किया और यह प्रमाणित किया कि वेदों में कोई इतिहास या पौराणिक कथाएँ नहीं हैं, बल्कि वे विशुद्ध विज्ञान और अध्यात्म के सार्वभौमिक नियम हैं।

📌 डॉ. सुधीर कुमार गुप्त: एक अकादमिक एवं ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम डॉ. सुधीर कुमार गुप्त (Dr. Sudhir Kumar Gupta)
काल निर्धारण 20वीं शताब्दी - आधुनिक वैदिक शोध के प्रमुख स्तंभ
अकादमिक उपाधियाँ एम.ए., पीएच.डी. (संस्कृत साहित्य एवं वैदिक दर्शन)
मुख्य शोध क्षेत्र वैदिक शब्दार्थ-विज्ञान (Vedic Semantics), निरुक्त, महर्षि दयानन्द की भाष्य-प्रक्रिया
अत्यंत प्रसिद्ध कार्य स्वामी दयानन्द की वेदभाष्य शैली का तार्किक और भाषाई विश्लेषण
वैचारिक परम्परा आर्य समाज, आर्ष-यौगिक पद्धति (Derivative/Root-based interpretation)

2. जीवन और अकादमिक पृष्ठभूमि: वैदिक साहित्य के मूक साधक

डॉ. सुधीर कुमार गुप्त का अकादमिक जीवन विश्वविद्यालयों के उन परिसरों में बीता, जहाँ प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक पश्चिमी शोध-प्रणालियों (Western Research Methodologies) की कसौटी पर परखा जाता था। एक ओर उनके पास पाणिनीय अष्टाध्यायी और यास्क के निरुक्त का पारंपरिक ज्ञान था, तो दूसरी ओर उनके पास पाश्चात्य 'Philology' (भाषाशास्त्र) का वैज्ञानिक दृष्टिकोण था।

उन्होंने अपना अधिकांश शोध-कार्य आर्य समाज की बौद्धिक संस्थाओं और विभिन्न शोध-पत्रिकाओं (Research Journals) के माध्यम से प्रस्तुत किया। वे एक मूक साधक थे जो मंचों के शोरगुल से दूर पुस्तकालयों में बैठकर वैदिक संहिताओं के एक-एक शब्द की 'व्युत्पत्ति' (Etymology) खोजते थे।

3. 'यौगिक अर्थ' की वैज्ञानिकता: रूढ़िवादी और पाश्चात्य भाष्यों का खण्डन

डॉ. गुप्त के शोध का केंद्र-बिंदु यास्क मुनि का वह सिद्धांत था जिसे महर्षि दयानन्द ने अपना अस्त्र बनाया: "सर्वाणि नामानि आख्यातजानि" (सभी संज्ञा शब्द धातुओं/क्रियाओं से उत्पन्न होते हैं)।

रूढ़ (Fixed) बनाम यौगिक (Derivative) अर्थ

डॉ. गुप्त ने उदाहरण देकर समझाया कि पाश्चात्य और मध्यकालीन भाष्यकारों ने कैसे अर्थ का अनर्थ किया:
1. अश्व (Ashva): लौकिक संस्कृत में यह एक पशु (घोड़ा) है (रूढ़ अर्थ)। परन्तु डॉ. गुप्त ने सिद्ध किया कि वेदों में 'अश्' धातु से बने इस शब्द का अर्थ 'व्यापक ऊर्जा', 'विद्युत' या 'वेगवान ऊष्मा' है। अतः अश्वमेध का अर्थ 'घोड़े की बलि' नहीं, बल्कि 'राष्ट्र की ऊर्जा और शक्ति का संवर्धन' है।
2. गौ (Go): इसे केवल 'गाय' मान लेने से वेद चरवाहों के गीत लगते हैं। डॉ. गुप्त ने निरुक्त के आधार पर बताया कि 'गौ' का अर्थ 'सूर्य की किरण', 'पृथ्वी', 'वाणी' और 'ज्ञान की रश्मियाँ' भी होता है।

4. 'दयानन्द की वेदभाष्य शैली': डॉ. गुप्त का ऐतिहासिक विश्लेषण

बीसवीं सदी में कई विश्वविद्यालयों में यह प्रश्न उठाया जा रहा था कि क्या महर्षि दयानन्द का वेदभाष्य केवल एक धार्मिक सुधार (Religious reform) है, या उसका कोई ठोस व्याकरणिक और वैज्ञानिक आधार भी है?

डॉ. सुधीर कुमार गुप्त ने अपने शोध-निबंधों और पुस्तकों में दयानन्द की वेदभाष्य शैली का सूक्ष्मतम विश्लेषण (Micro-analysis) किया। उन्होंने शतपथ ब्राह्मण, निरुक्त और पाणिनीय उणादि सूत्रों का प्रमाण देकर अकादमिक जगत के सामने यह सिद्ध कर दिया कि दयानन्द ने अपनी ओर से कोई नया अर्थ नहीं गढ़ा है। दयानन्द का भाष्य प्राचीनतम 'आर्ष-परम्परा' का शत-प्रतिशत प्रामाणिक और व्याकरण-सम्मत (Grammatically flawless) पुनरुद्धार है। डॉ. गुप्त के इन तर्कों ने अकादमिक जगत में दयानन्द-भाष्य को सर्वोच्च प्रामाणिकता (Highest Authenticity) प्रदान की।

5. वैदिक आख्यानों (Allegories) का रहस्योद्घाटन: इतिहास नहीं, विज्ञान

वेदों में कई ऐसी कहानियाँ या आख्यान (Akhyanas) प्रतीत होते हैं, जिन्हें सुनकर साधारण मनुष्य भ्रमित हो जाता है। जैसे— इन्द्र ने वृत्रासुर को मारा, सरमा और पणि का संवाद, या पुरुरवा और उर्वशी की कथा। पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट्स ने इन्हें भारत का 'प्राचीन इतिहास' (Ancient History) मान लिया।

आलंकारिक विज्ञान (Scientific Allegory)

डॉ. गुप्त ने इन आख्यानों का 'शब्दार्थ-वैज्ञानिक' (Semantic) विच्छेदन किया:

उन्होंने सिद्ध किया कि वेद में कोई ऐतिहासिक राजा नहीं है। 'इन्द्र' सूर्य की विद्युत ऊर्जा है और 'वृत्र' जल को रोकने वाला बादल (आवरण) है। इन्द्र का वज्र वह तड़ित (Lightning) है जो बादलों को फोड़कर वर्षा लाती है। यह शुद्ध 'वर्षा-विज्ञान' (Meteorology) है जिसे आलंकारिक भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार पुरुरवा (गड़गड़ाता हुआ बादल) और उर्वशी (बिजली/जल) का संवाद प्रकृति की शक्तियों का काव्यात्मक वर्णन है।

6. निरुक्त और निघण्टु: वैदिक शब्दकोश की पुनर्व्याख्या

डॉ. सुधीर कुमार गुप्त ने 'निघण्टु' (वैदिक शब्दकोश) और 'निरुक्त' (उसकी व्याख्या) पर गंभीर शोध किया। उन्होंने उन शब्दों का संकलन किया जिनके अर्थ समय के साथ विकृत हो गए थे।

"तद्यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद्दैवतमुच्यते।" (निरुक्त 7.1)

उन्होंने यास्क के इस सूत्र के आधार पर आधुनिक जगत को बताया कि वेदों में 'देवता' (Deity) का अर्थ कोई मानवरूपी भगवान नहीं है। वेद का वह मंत्र जिस 'विषय' (Subject) का प्रतिपादन करता है, वही उस मंत्र का 'देवता' होता है। यदि मंत्र अग्नि (Fire/Heat) के गुण बता रहा है, तो उसका देवता अग्नि है। यह डॉ. गुप्त के शब्दार्थ-शोध की एक बहुत बड़ी विजय थी, जिसने वेदों को 'बहुदेववाद' (Polytheism) के लांछन से मुक्त कर दिया।

7. तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Philology) और वेद

डॉ. गुप्त ने वेदों के शब्दार्थ की तुलना आधुनिक पश्चिमी भाषाशास्त्र से भी की। उन्होंने दिखाया कि पाश्चात्य विद्वान जब 'Phonetic Laws' (जैसे ग्रिम का नियम - Grimm's Law) का प्रयोग करके शब्दों के अर्थ निकालते हैं, तो वे अक्सर एक सीमित दायरे में फँस जाते हैं।

उन्होंने पाश्चात्य विद्वान रुडोल्फ रॉथ (Rudolf Roth) और सायण के भाष्यों की तुलना दयानन्द के भाष्य से की और भाषाई दृष्टि से (Linguistically) सिद्ध किया कि संस्कृत एक ऐसी जीवंत और यौगिक भाषा है जहाँ एक ही 'धातु' से सैकड़ों शब्द बनते हैं। अतः इसे लैटिन या ग्रीक की तरह 'रूढ़' मानकर अनुवाद करना 'वेद-विज्ञान' की हत्या करना है।

8. प्रमुख साहित्यिक अवदान एवं निष्कर्ष

डॉ. सुधीर कुमार गुप्त का साहित्य यद्यपि अत्यंत क्लिष्ट और शोधपरक है, परन्तु वह वैदिक स्कॉलर्स के लिए 'स्वर्ण-खदान' के समान है। उनकी प्रमुख कृतियों में 'महर्षि दयानन्द की वेदभाष्य शैली', निरुक्त-मीमांसा से जुड़े शोध-पत्र, और वैदिक आख्यानों की वैज्ञानिक व्याख्याएँ शामिल हैं।

निष्कर्षतः, डॉ. सुधीर कुमार गुप्त उन गिने-चुने आधुनिक प्राच्य-विद्वानों में से हैं जिन्होंने वेदों को 'अंधविश्वास', 'इतिहास' और 'कर्मकांड' के त्रिकोण से निकालकर 'शब्द-ब्रह्म' और 'विज्ञान' के धरातल पर पुनर्स्थापित किया। यदि आज कोई भी शोधार्थी वेदों के सही अर्थ और महर्षि दयानन्द की भाष्य-प्रक्रिया की वैज्ञानिकता (Scientificity of Dayanand's methodology) को समझना चाहता है, तो उसे डॉ. सुधीर कुमार गुप्त के शोध-ग्रंथों का आश्रय लेना ही पड़ेगा।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • स्वामी दयानन्द की वेद-भाष्य शैली - डॉ. सुधीर कुमार गुप्त।
  • वैदिक आख्यानों का स्वरूप और वैज्ञानिक व्याख्या (विभिन्न शोध पत्रिकाएँ)।
  • यास्क का निरुक्त एवं वैदिक शब्दार्थ-मीमांसा।
  • आर्य समाज के ऐतिहासिक और अकादमिक जर्नल ('वेदवाणी', 'परोपकारी' आदि में प्रकाशित लेख)।

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