Mrityu Kyon Zaroori Hai? Amarta Ka Abhishap Aur Raja Ki Prerak Kahani

Sooraj Krishna Shastri
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✨ प्रेरणादायक प्रसंग ✨

मृत्यु क्यों महत्वपूर्ण है? अमरता का वरदान या अभिशाप

प्रायः मृत्यु का नाम सुनते ही हर मनुष्य के मन में भय उत्पन्न हो जाता है। कोई भी मरना नहीं चाहता। लेकिन वास्तविकता यह है कि जन्म और मृत्यु इस अनंत सृष्टि के सबसे कठोर और सत्य नियम हैं। यह इस ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने के लिए नितांत आवश्यक है। जरा सोचिए, यदि इस संसार से मृत्यु ही समाप्त हो जाए, तो क्या होगा? मनुष्य अपने लालच और अहंकार में एक-दूसरे पर हावी हो जाएंगे और यह सुंदर संसार एक नर्क बन जाएगा। इसे समझने के लिए यह अद्भुत कहानी पढ़ें...

अमरता की खोज में निकला राजा

प्राचीन काल की बात है। एक अत्यंत प्रतापी और धनवान राजा था। उसके पास विशाल साम्राज्य, वैभव और सब कुछ था, सिवाय 'अमरता' के। राजा को इस बात का बहुत डर सताता था कि एक दिन मृत्यु आएगी और उसका यह सब कुछ उससे छिन जाएगा। एक दिन राजा को पता चला कि उसके राज्य के बाहर एक वृक्ष के नीचे एक परम ज्ञानी और सिद्ध ऋषि ध्यान में बैठे हैं। राजा तुरंत उनके पास गया और हाथ जोड़कर बोला:

"हे स्वामी! मेरे पास अपार संपत्ति है, लेकिन मृत्यु का भय मुझे हर पल डराता है। अगर इस संसार में कोई ऐसी दिव्य जड़ी-बूटी, अमृत या औषधि है जो मुझे अमरता प्रदान कर सकती है, तो कृपया मुझे उसका मार्ग बताएं।"

ऋषि ने अपनी शांत आँखें खोलीं और राजा की मूर्खता पर मुस्कुराते हुए उत्तर दिया:

"हे राजन! यदि तुम्हें अमर ही होना है, तो सामने दिखने वाले इन दो दुर्गम पहाड़ों को पार करो। वहाँ तुम्हें एक अत्यंत स्वच्छ नीले जल वाली झील मिलेगी। उस झील का बस एक घूंट पानी पी लेना, और तुम अमर हो जाओगे। तुम्हारी कभी मृत्यु नहीं होगी।"

झील का किनारा और एक जीवित कंकाल

राजा की खुशी का ठिकाना न रहा। वह बिना कुछ सोचे-समझे, कष्ट सहते हुए उन दो पहाड़ों को पार कर गया। सामने सचमुच एक सुंदर झील थी। जैसे ही राजा ने अंजलि में जल भरकर पीने के लिए हाथ आगे बढ़ाया, अचानक उसे पास की झाड़ियों से एक अत्यंत दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली कराहने की आवाज सुनाई दी।

आवाज का पीछा करते हुए राजा जब वहां पहुँचा, तो उसके होश उड़ गए। उसने देखा कि एक अत्यंत जर्जर, हड्डियों का ढांचा बन चुका बूढ़ा आदमी भयानक दर्द में पड़ा तड़प रहा था। उसके शरीर पर मांस का नामोनिशान नहीं था। राजा ने चौंककर उसका कारण पूछा।

उस कंकाल नुमा व्यक्ति ने कराहते हुए कहा:

"हे अजनबी! भूलकर भी इस झील का पानी मत पीना। मैंने यह पानी पिया था और अमर हो गया। जब मैं सौ साल का हुआ और मेरे शरीर ने काम करना बंद कर दिया, तो मेरे ही बेटे ने मुझे बोझ समझकर घर से निकाल दिया। मैं पिछले पचास सालों से यहाँ लावारिस पड़ा हूँ। मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। मेरा बेटा खुद बूढ़ा होकर मर चुका है और मेरे पोते-पोतियाँ भी अब बूढ़े हो चुके हैं। मैंने बरसों से खाना-पीना छोड़ दिया है कि शायद मेरे प्राण निकल जाएं, फिर भी मैं मर नहीं पा रहा हूँ। यह अमरता मेरे लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन गई है।"

जवानी के साथ अमरता की चाह

यह सुनकर राजा सिहर उठा। उसने सोचा, "यदि बुढ़ापे और बीमारियों के साथ अमरता मिली, तो ऐसी अमरता का क्या फायदा? यह तो जीते जी नर्क है! अगर मैं अमरता के साथ-साथ हमेशा के लिए 'जवानी' भी पा लूँ, तो मेरी समस्या हल हो जाएगी।"

वह तुरंत वापस ऋषि के पास गया और अपनी नई शर्त रखते हुए पूछा, "हे महात्मन्! कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बताएँ जिससे मैं अमरता के साथ-साथ चिर-यौवन (हमेशा जवान रहना) भी प्राप्त कर सकूँ।"

ऋषि ने शांत भाव से कहा, "राजन! उस झील के आगे एक और विशाल पहाड़ है। उसे पार करो, वहाँ तुम्हें पीले अमृत फलों से लदा एक जादुई पेड़ मिलेगा। उनमें से बस एक फल खा लेना, तुम्हें अमरता और जवानी दोनों मिल जाएँगे।"

पीले फलों का वृक्ष और चार पीढ़ियों का युद्ध

राजा पूरे उत्साह से तीसरे पहाड़ को पार कर गया। सामने सचमुच पीले फलों से लदा एक चमत्कारी पेड़ खड़ा था। राजा ने लालच में एक फल तोड़ा और जैसे ही उसे खाने वाला था, तभी उसे भयंकर गाली-गलौज और हथियारों के टकराने की आवाज सुनाई दी। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस एकांत और दूरस्थ स्थान पर कौन इतनी भयंकर लड़ाई कर रहा है!

उसने देखा कि चार अत्यंत शक्तिशाली और जवान युवक, जो बिल्कुल एक जैसी उम्र (लगभग 25-30 वर्ष) के लग रहे थे, एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू थे। वे जोर-जोर से बहस कर रहे थे। राजा ने बीच-बचाव करते हुए पूछा कि वे क्यों लड़ रहे हैं?

उनमें से एक युवक ने क्रोधित होकर कहा:

"अरे! मैं 250 साल का हूँ, और मेरे दाईं ओर खड़ा यह आदमी जो आपको मेरे जैसा ही जवान दिख रहा है, यह 300 साल का है। यह मेरा पिता है! यह मुझे मेरी संपत्ति का हिस्सा नहीं दे रहा है।"

राजा का सिर चकराने लगा। जब उसने दाईं ओर वाले आदमी (पिता) से पूछा, तो उसने चिल्लाकर कहा:

"यह झूठ बोल रहा है! मेरे पिता (जो इस लड़के के दादा हैं), वे 350 साल के हैं और अभी भी इसी तरह जवान और जीवित हैं। उन्होंने अभी तक मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया है, सारी गद्दी दबा कर बैठे हैं। जब मुझे ही कुछ नहीं मिला, तो मैं अपना हिस्सा अपने बेटे को कैसे दे सकता हूँ?"

उस आदमी ने फिर अपने पिता (परदादा) की ओर इशारा किया, जो 400 साल के थे, और उन्होंने भी ठीक वही शिकायत साझा की कि उनके पिता अभी भी गद्दी नहीं छोड़ रहे हैं। उन सभी ने राजा को बताया कि संपत्ति, गद्दी और अधिकार के लिए उनकी अंतहीन लड़ाई ने उनके परिवार को नष्ट कर दिया है और तंग आकर ग्रामीणों ने उन सभी को गाँव से बाहर निकाल फेंका है। कोई मरता नहीं है, इसलिए पीढ़ियों का संघर्ष कभी खत्म नहीं होता।

मोहभंग और ऋषि का परम ज्ञान

राजा के हाथ से वह पीला फल छूटकर नीचे गिर गया। उसका सारा मोहभंग हो चुका था। वह समझ गया कि मृत्यु के बिना यौवन, रिश्ते, प्रेम और सत्ता—सब कुछ केवल विनाश और लालच का कारण है।

वह दौड़कर वापस ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और भर्राए गले से बोला:

"हे महात्मन्! मेरे अज्ञान के अंधकार को दूर करने और मुझे मृत्यु का वास्तविक महत्व सिखाने के लिए आपका कोटि-कोटि धन्यवाद। अब मुझे न अमरता चाहिए और न ही चिर-यौवन।"

तब ऋषि ने अत्यंत मधुर वाणी में संसार का सबसे बड़ा सत्य कहा:

"हे राजन! याद रखो... क्योंकि इस संसार में 'मृत्यु' मौजूद है, केवल इसीलिए दुनिया में 'प्रेम' बचा हुआ है।"

"मृत्यु से बचने की व्यर्थ कोशिश करने के बजाय, जीवन के हर दिन और हर पल को खुशी से जियो। मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि विश्राम है। खुद को बदलो, तुम्हारे देखने का नज़रिया बदलेगा, तो यह पूरी दुनिया बदल जाएगी।"

जीवन को अमृत बनाने के 7 दिव्य सूत्र

ऋषि ने राजा को समझाया कि अमर होने के लिए अमृत पीने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने नित्य कर्मों में भगवान का नाम (जप) जोड़ लो, तो तुम्हारा हर साधारण काम ही दिव्य बन जाएगा:

  • पवित्र स्नान: जब आप नहाते समय भगवान का नाम जपते हैं, तो वह केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि आत्मा का पवित्र स्नान (तीर्थ स्नान) बन जाता है।
  • महाप्रसाद: जब आप भोजन करते समय प्रभु का स्मरण या जप करते हैं, तो वह साधारण अन्न भगवान का पवित्र प्रसाद बन जाता है।
  • तीर्थ यात्रा: जब आप चलते या सफर करते समय जप करते हैं, तो आपके पैरों से नापी गई वह दूरी एक पुण्यमयी तीर्थयात्रा बन जाती है।
  • दिव्य भोग: जब आप रसोई में खाना बनाते समय जप करते हैं, तो उस भोजन में अमृत का वास हो जाता है और वह दिव्य भोग बन जाता है।
  • योग निद्रा: जब आप रात को सोने से पहले प्रभु का स्मरण करते हैं, तो आपकी नींद आलस्य नहीं, बल्कि ध्यानपूर्ण निद्रा (योग-निद्रा) बन जाती है।
  • कर्म ही पूजा: जब आप अपना कोई भी सांसारिक काम (ऑफिस या घर का) करते समय मन में जप करते हैं, तो वह काम ही आपकी सच्ची भक्ति बन जाता है।
  • स्वयं मंदिर: जब आप अपने घर में नियमित रूप से जप और संकीर्तन करते हैं, तो ईंट-पत्थर का वह मकान स्वयं एक जाग्रत पूजा स्थल (मंदिर) बन जाता है।

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