डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल: वैदिक प्रतीकों के शोधकर्ता और भारतीय संस्कृति के आधुनिक ऋषि
एक विस्तृत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह पुरातत्वविद् जिसने मिट्टी की मूर्तियों, पाषाण स्तम्भों और प्राचीन कलाकृतियों में वेदों के 'गुप्त प्रतीकों' (Vedic Symbolism) को खोज निकाला (The Cultural Archaeologist of India)
- 1. प्रस्तावना: कला, पुरातत्व और वेदों का समन्वय
- 2. जीवन परिचय: मथुरा संग्रहालय से बी.एच.यू. तक
- 3. वैदिक प्रतीकों का शोध (Vedic Symbolism)
- 4. कला में वैदिक दर्शन: 'पूर्ण कुंभ' और 'हिरण्यगर्भ'
- 5. 'पृथिवी सूक्त' और 'राष्ट्र का स्वरूप'
- 6. 'पाणिनिकालीन भारतवर्ष': व्याकरण में इतिहास की खोज
- 7. साहित्यिक योगदान: 'पद्मावत' से 'हर्षचरित' तक
- 8. निष्कर्ष: संस्कृति के अमर व्याख्याता
भारतीय प्राच्य विद्या (Indology) में वेदों पर कार्य करने वाले विद्वानों की दो मुख्य धाराएं रही हैं—एक धारा 'व्याकरण और कर्मकांड' (जैसे सायण, मीमांसक) की थी, और दूसरी 'आध्यात्मिक' (जैसे श्री अरविंद) की थी। लेकिन डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल (Dr. Vasudev Sharan Agrawal) ने एक तीसरी और पूर्णतः मौलिक धारा को जन्म दिया—'सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक (Symbolic) धारा'।
उन्होंने सिद्ध किया कि वेदों के जो मंत्र हवा में गूंजते थे, उन्हें ही भारतीय शिल्पकारों ने साँची के स्तूपों, मथुरा की मूर्तियों और गुप्त काल के मंदिरों में पत्थरों पर उकेरा है। वे एक ऐसे पुरातत्वविद् (Archaeologist) थे जिनकी आँखें जमीन के नीचे दबे इतिहास को देखती थीं, और मस्तिष्क वेदों के आकाश में विचरण करता था।
| पूरा नाम | डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल |
| काल | 9 अगस्त 1904 – 27 जुलाई 1966 |
| जन्म स्थान | खेड़ा, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) - मूल निवास: मेरठ |
| शिक्षा | एम.ए., पीएच.डी., डी.लिट. (लखनऊ विश्वविद्यालय) |
| कार्यक्षेत्र | मथुरा संग्रहालय (Curator), राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली (Director), बी.एच.यू. (Professor) |
| महानतम कृति (इतिहास) | पाणिनिकालीन भारतवर्ष (India as Known to Panini) |
| महानतम कृति (संस्कृति) | कला और संस्कृति, वेद विद्या, Sparks from the Vedic Fire |
| सम्मान | साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956 - 'पद्मावत संजीवनी व्याख्या' के लिए) |
2. जीवन परिचय: मथुरा संग्रहालय से बी.एच.यू. तक
वासुदेव शरण अग्रवाल का जन्म उत्तर प्रदेश के एक वैश्य परिवार में हुआ था। उनकी उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई। लखनऊ में उन्हें डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी जैसे महान इतिहासकारों का सानिध्य मिला।
करियर की शुरुआत: उनका जीवन पुस्तकों तक सीमित नहीं था। वे कई वर्षों तक मथुरा पुरातत्व संग्रहालय के क्यूरेटर (Curator) रहे। मथुरा में रहते हुए उन्होंने कुषाण और गुप्तकालीन मूर्तिकला का सूक्ष्म अध्ययन किया। बाद में वे राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum), नई दिल्ली के अधीक्षक बने और अंततः BHU में इंडोलॉजी (प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति) विभाग के अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
3. वैदिक प्रतीकों का शोध (Vedic Symbolism)
डॉ. अग्रवाल का मानना था कि वेदों की भाषा 'प्रतीकात्मक' (Symbolic) है। वैदिक ऋषियों ने गहरे आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय (Cosmic) सत्यों को भौतिक वस्तुओं (जैसे गाय, घोड़ा, कलश, वृक्ष) के रूप में व्यक्त किया।
उन्होंने पं. मधुसूदन ओझा की विज्ञान-परंपरा और श्री अरविंद के दर्शन का अद्भुत समन्वय किया। अपनी पुस्तकों (जैसे Sparks from the Vedic Fire और Vedic Lectures) में उन्होंने बताया:
- अग्नि: केवल भौतिक आग नहीं, बल्कि सृष्टि के कण-कण में व्याप्त 'प्राण-ऊर्जा' (Life-force) है।
- सुपर्ण (गरुड़): यह 'काल' (Time) या 'सूर्य' का प्रतीक है, जो सृष्टि के चक्र को चलाता है।
- यज्ञ: यह प्रकृति का वह शाश्वत नियम है जिसमें एक ऊर्जा दूसरी ऊर्जा में रूपांतरित होती है। पूरा ब्रह्मांड एक 'महायज्ञ' है।
4. कला में वैदिक दर्शन: 'पूर्ण कुंभ' और 'हिरण्यगर्भ'
डॉ. अग्रवाल की सबसे मौलिक देन यह है कि उन्होंने सिद्ध किया कि भारतीय स्थापत्य (Architecture) और कला में वेदों के ही विचार प्रतिबिंबित होते हैं।
- पूर्ण कुंभ (Purna Kumbha): सांची के स्तूपों और कई प्राचीन मंदिरों के प्रवेश द्वार पर 'पानी से भरे कलश' (पूर्ण कुंभ) की आकृतियां हैं। डॉ. अग्रवाल ने ऋग्वेद का संदर्भ देकर बताया कि यह कलश 'हिरण्यगर्भ' या 'अमृत' (अविनाशी जीवन शक्ति) का प्रतीक है।
- अश्वत्थ (पीपल का वृक्ष): सिंधु घाटी की मुहरों से लेकर बौद्ध कला तक दिखने वाला यह वृक्ष वेदों के 'उर्ध्वमूलम् अधःशाखम्' (उलटे लटके हुए संसार रूपी वृक्ष) का भौतिक रूप है।
- चक्र (Wheel): अशोक चक्र या सुदर्शन चक्र वास्तव में वेदों के 'काल-चक्र' और 'ऋत' (Cosmic Order) का ज्यामितीय (Geometric) प्रतिनिधित्व है।
5. 'पृथिवी सूक्त' और 'राष्ट्र का स्वरूप'
अथर्ववेद का 'पृथिवी सूक्त' (Bhumi Sukta) डॉ. अग्रवाल के जीवन दर्शन का केंद्र था। इस सूक्त का मंत्र "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" (भूमि मेरी माता है, और मैं उसका पुत्र हूँ) उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार बना।
अपने अत्यंत प्रसिद्ध निबंध 'राष्ट्र का स्वरूप' (जो आज भी हिंदी पाठ्यक्रम का हिस्सा है) में उन्होंने राष्ट्र के तीन अनिवार्य तत्व बताए:
1. भूमि (Land): भूगोल और प्रकृति के प्रति श्रद्धा।
2. जन (People): उस भूमि पर बसने वाले लोग।
3. संस्कृति (Culture): लोगों के विचार और कला।
उन्होंने लिखा—"भूमि और जन मिलकर तब तक राष्ट्र नहीं बनते, जब तक उनमें संस्कृति का प्राण न फूंका जाए। संस्कृति राष्ट्र का मस्तिष्क है।"
6. 'पाणिनिकालीन भारतवर्ष': व्याकरण में इतिहास की खोज
पाणिनि का 'अष्टाध्यायी' एक नीरस व्याकरण ग्रंथ माना जाता था। लेकिन डॉ. अग्रवाल ने इस ग्रंथ पर अपना पी-एच.डी. शोध किया—"India as Known to Panini" (पाणिनिकालीन भारतवर्ष)।
एक जासूस की तरह, उन्होंने पाणिनि के व्याकरण के सूत्रों में से 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत का:
- भूगोल: नदियां, पहाड़, नगरों के नाम।
- अर्थव्यवस्था: सिक्के (कार्षापण), व्यापारिक मार्ग, कृषि।
- समाजशास्त्र: वेशभूषा, भोजन, जातियां, गोत्र।
खोज निकाला। यह दुनिया के इतिहास लेखन में एक क्रांतिकारी 'मेथडोलॉजी' (Methodology) मानी जाती है, जहाँ एक व्याकरण की किताब से पूरे युग का सामाजिक इतिहास लिख दिया गया।
7. साहित्यिक योगदान: 'पद्मावत' से 'हर्षचरित' तक
वे केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं थे; मध्यकालीन और शास्त्रीय साहित्य पर भी उनका गहरा अधिकार था।
- पद्मावत संजीवनी व्याख्या: मलिक मोहम्मद जायसी के सूफी महाकाव्य 'पद्मावत' पर उन्होंने एक ऐसी प्रामाणिक और सांस्कृतिक टीका लिखी, जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
- हर्षचरित (एक सांस्कृतिक अध्ययन): बाणभट्ट के गद्य काव्य का उन्होंने ऐसा विश्लेषण किया कि 7वीं सदी का पूरा भारतीय समाज (कपड़े, गहने, हथियार) जीवंत हो उठा।
- भारत की मौलिक एकता: इस पुस्तक में उन्होंने भौगोलिक विविधताओं के बीच भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता को वेदों और पुराणों के आधार पर सिद्ध किया।
8. निष्कर्ष: संस्कृति के अमर व्याख्याता
डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल 1966 में केवल 62 वर्ष की आयु में इस संसार से विदा हो गए, लेकिन अपनी लेखनी से वे भारत की सांस्कृतिक नसों में हमेशा के लिए प्रवाहित हो गए।
उन्होंने अंग्रेजी की चकाचौंध के बीच 'प्रांजल हिंदी' में गहन शोधपरक साहित्य रचा। यदि आज हम किसी प्राचीन मूर्ति, स्तूप या मंदिर को देखकर केवल पत्थर नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे 'वैदिक दर्शन' का अनुभव कर पाते हैं, तो यह डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल द्वारा दी गई दृष्टि का ही प्रताप है। वे सही मायनों में भारत की मिट्टी (भूमि) और वेदों (आकाश) को जोड़ने वाले महापुरुष थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- पाणिनिकालीन भारतवर्ष - डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल।
- कला और संस्कृति - डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल।
- वेद-विद्या - डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल।
- Sparks from the Vedic Fire - V.S. Agrawal.
- भारत की मौलिक एकता - डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल।
