पं. भगवदत्त: 'वैदिक वाङ्मय का इतिहास' के प्रणेता और पाश्चात्य इंडोलॉजी के प्रबल आलोचक | Pt. Bhagavad Datta

Sooraj Krishna Shastri
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पं. भगवदत्त: वैदिक वाङ्मय के वृहद् इतिहासकार और प्राचीन इतिहास के उद्धारक

पं. भगवदत्त: 'वैदिक वाङ्मय का इतिहास' के प्रणेता और पाश्चात्य इंडोलॉजी के प्रबल आलोचक

एक विस्तृत ऐतिहासिक और अकादमिक विश्लेषण: वह अनुसन्धानकर्ता जिसने ब्रिटिश काल में यूरोपीय विद्वानों के ऐतिहासिक भ्रमजाल को तोड़ा और सिद्ध किया कि भारत का इतिहास और वैदिक साहित्य लाखों वर्ष पुराना है (The Doyen of Vedic Historiography)

19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में मैक्स मूलर (Max Müller), ए.बी. कीथ (A.B. Keith) और मैकडोनेल (Macdonell) जैसे पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों का इतिहास लिखना शुरू किया था। उन्होंने एक ऐसा 'नैरेटिव' (Narrative) गढ़ा जिसमें वेदों को 1200 ई.पू. का बताया गया और भारत के इतिहास को अत्यंत संकुचित कर दिया गया।

इस औपनिवेशिक बौद्धिक आक्रमण (Colonial Intellectual Invasion) का सबसे वैज्ञानिक, तर्कपूर्ण और विस्तृत उत्तर जिस भारतीय विद्वान ने दिया, वे थे—पंडित भगवदत्त (Pt. Bhagavad Datta)। उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों को अकादमिक शोध का रूप दिया और "वैदिक वाङ्मय का इतिहास" (History of Vedic Literature) नामक विशाल ग्रंथ की रचना की, जो आज भी वैदिक साहित्य के शोधार्थियों के लिए विश्वकोश (Encyclopedia) के समान है।

📌 पं. भगवदत्त: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम पंडित भगवदत्त (रिसर्च स्कॉलर)
काल अक्टूबर 1893 – 28 नवंबर 1968
जन्म स्थान अमृतसर, पंजाब (अविभाजित भारत)
कर्मभूमि अनुसंधान विभाग (Research Dept.), डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर
महानतम कृति (साहित्य) वैदिक वाङ्मय का इतिहास (3 खंड)
महानतम कृति (इतिहास) भारतवर्ष का बृहद् इतिहास (2 खंड)
प्रमुख अंग्रेज़ी ग्रंथ Western Indologists: A Study in Motives
विशिष्ट योगदान वेदों की 1131 शाखाओं का ऐतिहासिक प्रमाण खोजना

2. जीवन परिचय: लाहौर डी.ए.वी. से दिल्ली तक

पंडित भगवदत्त का जन्म 1893 में पंजाब के अमृतसर जिले में हुआ था। उनके जीवन पर आर्य समाज और महर्षि दयानंद सरस्वती का गहरा प्रभाव था। उन्होंने लाहौर के डी.ए.वी. (D.A.V.) कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।

अनुसंधान विभाग के निदेशक: उनकी असाधारण प्रतिभा को देखते हुए, डी.ए.वी. कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल महात्मा हंसराज ने उन्हें कॉलेज के नवनिर्मित 'अनुसंधान विभाग' (Vedic Research Institute) का निदेशक (Director) नियुक्त किया। लाहौर में रहते हुए उन्होंने भारत भर से प्राचीन पांडुलिपियों (Manuscripts) का संग्रह किया। 1947 के विभाजन के बाद वे दिल्ली आ गए और अपना शेष जीवन निरंतर लेखन और शोध में व्यतीत किया। पंडित युधिष्ठिर मीमांसक जैसे महान विद्वान उन्हीं की प्रेरणा से तैयार हुए।

3. 'वैदिक वाङ्मय का इतिहास': एक कालजयी महाग्रंथ

पं. भगवदत्त की कीर्ति का मुख्य स्तंभ उनका ग्रंथ "वैदिक वाङ्मय का इतिहास" है। पाश्चात्य विद्वानों (जैसे विंटरनिट्ज़) ने 'History of Indian Literature' लिखी थी, लेकिन वह बहुत सतही थी। पं. भगवदत्त ने इसे तीन विशाल खंडों में लिखा:

ग्रंथ के तीन मुख्य खंड
  • प्रथम भाग (वेदों की शाखाएं): इसमें उन्होंने चारों वेदों की संहिताओं और उनकी सैकड़ों लुप्त और उपलब्ध शाखाओं (Recensions) का विस्तृत विवरण दिया।
  • द्वितीय भाग (ब्राह्मण और आरण्यक): इसमें उन्होंने ऐतरेय, शतपथ, तांड्य आदि ब्राह्मण ग्रंथों और आरण्यकों का काल-निर्धारण और ऐतिहासिक महत्व सिद्ध किया।
  • तृतीय भाग (वेद भाष्यकार): इसमें उन्होंने वेदों के प्राचीन टीकाकारों (सायण, स्कंदस्वामी, उव्वट, वेंकट माधव) का इतिहास और उनकी परंपराओं का वर्णन किया।

यह ग्रंथ केवल सूची नहीं है, बल्कि प्रत्येक ग्रंथ के रचनाकार, उसकी भाषा-शैली और उसके ऐतिहासिक महत्व का आलोचनात्मक विश्लेषण (Critical Analysis) है।

4. वेदों की शाखाओं का पुनरुद्धार (Recensions of the Vedas)

महर्षि पतंजलि ने 'महाभाष्य' में लिखा था: "एकशतमध्वर्युशाखाः सहस्रवर्त्मा सामवेदः एकविंशतिधा बाह्वृच्यं नवधाऽथर्वणो वेदः" (यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1000, ऋग्वेद की 21 और अथर्ववेद की 9 शाखाएं हैं—कुल 1131)।

पाश्चात्य विद्वान इसका मजाक उड़ाते थे कि यह केवल 'अतिशयोक्ति' (Exaggeration) है। पं. भगवदत्त ने इस चुनौती को स्वीकार किया।
उन्होंने पूरे भारत के पुस्तकालयों, मठों और व्यक्तिगत संग्रहों को छाना। अपने शोध में उन्होंने पुराणों, चरणव्यूह और प्राचीन ग्रंथों के हवाले से सैकड़ों वैदिक शाखाओं के नाम, उनके प्रवर्तक ऋषियों और उनके उद्धरणों (Quotations) को खोज निकाला। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि पतंजलि का कथन अक्षरशः सत्य था और भारत में कभी एक विशाल वैदिक वाङ्मय अस्तित्व में था, जो विदेशी आक्रमणों के कारण नष्ट हो गया।

5. वेद भाष्यकारों का इतिहास: सायण से पूर्व की खोज

पश्चिमी विद्वान केवल 14वीं शताब्दी के आचार्य सायण के भाष्य को ही अंतिम प्रमाण मानते थे। वे मानते थे कि सायण से पहले वेदों का कोई विशेष अर्थ-परंपरा नहीं थी।

पं. भगवदत्त ने अपने ग्रंथ के 'वेद भाष्यकार' खंड में इस धारणा को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने खोज कर बताया कि सायण से सैकड़ों वर्ष पूर्व:
1. स्कंदस्वामी (ऋग्वेद भाष्यकार)
2. वेंकट माधव
3. माधवभट्ट
4. उव्वट और हलायुध
जैसे दर्जनों विद्वानों ने वेदों पर अत्यंत प्रामाणिक भाष्य लिखे थे। उन्होंने सायण की अनेक व्याकरणिक गलतियों को भी उजागर किया और महर्षि दयानंद की 'यौगिक अर्थ प्रक्रिया' को प्राचीन और सर्वाधिक प्रामाणिक सिद्ध किया।

6. 'भारतवर्ष का बृहद् इतिहास': स्वदेशी दृष्टिकोण

वैदिक साहित्य के साथ-साथ पं. भगवदत्त ने "भारतवर्ष का बृहद् इतिहास" (आदियुग से गुप्त साम्राज्य के अंत तक) नामक विशाल ग्रंथ की रचना की।

  • आर्यन आक्रमण का खंडन: उन्होंने पुरातात्विक (Archaeological) और साहित्यिक (Literary) प्रमाणों से सिद्ध किया कि आर्य भारत के मूल निवासी थे और वे बाहर से नहीं आए।
  • सिंधु घाटी सभ्यता: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के उत्खनन के बाद, पाश्चात्य विद्वानों ने इसे 'द्रविड़' या 'आर्य-पूर्व' (Pre-Aryan) सभ्यता बताया। पं. भगवदत्त ने इसे 'असुर संस्कृति' (Asura Culture) कहा और बताया कि वेद और ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित 'असुर' भी आर्यों की ही एक शाखा थे (जैसे देव और असुर दोनों प्रजापति की संतानें थीं)।
  • काल-निर्धारण (Chronology): उन्होंने सिकंदर के आक्रमण (326 BCE) के आधार पर चंद्रगुप्त मौर्य का जो काल तय किया गया था, उसे भ्रामक बताया और पुराणों व जैन/बौद्ध ग्रंथों (जैसे त्रिलोकप्रज्ञप्ति) के आधार पर भारतीय इतिहास को हज़ारों वर्ष पीछे ले गए।

7. पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट्स की आलोचना (Study in Motives)

पं. भगवदत्त की अंग्रेजी पुस्तक "Western Indologists: A Study in Motives" एक धमाके के समान थी।

विदेशी विद्वानों की मंशा पर प्रहार

उन्होंने पत्रों और दस्तावेजों (जैसे मैक्स मूलर के अपनी पत्नी और ब्रिटिश अधिकारियों को लिखे पत्र) के आधार पर सिद्ध किया कि कई पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट्स का मुख्य उद्देश्य:
1. भारतीय ज्ञान को ईसाई मत (Christianity) से नीचा दिखाना था।
2. वेदों में 'बर्बरता' और 'अंधविश्वास' सिद्ध करके ब्रिटिश शासन को सही ठहराना था।
3. भारतीयों के मन में अपने ही इतिहास के प्रति हीनभावना (Inferiority Complex) पैदा करना था।

भगवदत्त जी ने लिखा कि पश्चिमी विद्वानों का शोध 'निष्पक्ष' नहीं, बल्कि 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' (Politically Motivated) था।

8. निष्कर्ष: भावी पीढ़ियों के मार्गदर्शक

पंडित भगवदत्त का जीवन एक 'ज्ञान यज्ञ' था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन पुस्तकालयों की धूल फांकने, जीर्ण-शीर्ण पांडुलिपियों को पढ़ने और भारत के वास्तविक इतिहास को पुनर्जीवित करने में लगा दिया।

आज जब हम 'इंडियन नॉलेज सिस्टम' (IKS) या 'इतिहास के पुनर्लेखन' (Rewriting of History) की बात करते हैं, तो हमें पं. भगवदत्त के विशाल साहित्य की ओर लौटना ही पड़ता है। उनका "वैदिक वाङ्मय का इतिहास" आज भी किसी भी विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में 'रेफरेंस बुक' (Reference Book) के रूप में सर्वोच्च स्थान रखता है। वे सही मायनों में प्राचीन भारत के 'बौद्धिक रक्षक' थे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वैदिक वाङ्मय का इतिहास (भाग 1, 2, 3) - पंडित भगवदत्त (प्रणव प्रकाशन / रामलाल कपूर ट्रस्ट)।
  • भारतवर्ष का बृहद् इतिहास (भाग 1, 2) - पंडित भगवदत्त।
  • Western Indologists: A Study in Motives - Bhagavad Datta.
  • The Story of Creation as seen by the Seers - Bhagavad Datta.
  • जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण (संपादित) - पंडित भगवदत्त।

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