शास्त्रों में कहा गया है कि 'संगति' का प्रभाव अमिट होता है। अच्छी संगति लोहे को भी सोना बना सकती है, और बुरी संगति सोने को भी मिट्टी में मिला सकती है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित 'द्विविद वानर' की कथा इस सत्य का सबसे दुखद और ज्वलंत प्रमाण है। क्या आप विश्वास करेंगे कि जिस वानरराज द्विविद का वध भगवान बलराम जी को करना पड़ा, वह कोई साधारण बंदर नहीं था? वह त्रेतायुग का एक महान योद्धा था, जिसने भगवान श्रीराम के चरणों में रहकर लंका युद्ध में राक्षसों के छक्के छुड़ा दिए थे। परंतु द्वापर युग आते-आते, केवल एक गलत मित्रता के कारण उसका ऐसा पतन हुआ कि वह स्वयं एक राक्षस बन बैठा। आइए, विस्तार से जानते हैं एक देव-तुल्य वानर के पतन और साक्षात शेषनाग अवतार दाऊ भैया के उस प्रलयंकारी पराक्रम की रोमांचक गाथा।
त्रेता युग में किष्किंधा नरेश सुग्रीव की वानर सेना में दो अत्यंत पराक्रमी भाई थे— 'मैन्द' और 'द्विविद'। वे साधारण वानर नहीं थे, बल्कि देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों के अंश से उत्पन्न हुए थे। द्विविद में दस हज़ार हाथियों का बल था। रामायण काल में उसने धर्म का साथ दिया था, परंतु द्वापर युग में समय का चक्र ऐसा घूमा कि उसकी मित्रता प्राग्ज्योतिषपुर के क्रूर और अत्याचारी दैत्यराज 'भौमासुर' (जिसे नरकासुर भी कहते हैं) से हो गई।
नरकासुर की तामसिक और आसुरी संगति में रहकर द्विविद की बुद्धि भ्रष्ट हो गई। उसकी सारी सात्विकता नष्ट हो गई और उसके भीतर का पशुत्व और राक्षसीपन जाग उठा। श्रीमद्भागवत में शुकदेव जी महाराज ने उसके पतन का कारण स्पष्ट किया है:
मैन्दभ्राता महावीर्यः सुग्रीवसचिवः पुरा ॥
(श्रीमद्भागवत 10.67.2)
जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ जाकर अत्याचारी नरकासुर का वध कर दिया, तो यह समाचार सुनकर उसका मित्र द्विविद वानर शोक और क्रोध से पागल हो गया। उसने प्रतिज्ञा की कि वह अपने मित्र की मृत्यु का बदला श्रीकृष्ण, उनके परिवार, उनके राज्य और उन सभी लोगों से लेगा जो धर्म के मार्ग पर चलते हैं। इस प्रतिशोध की अग्नि ने उसे पूरी तरह से एक विनाशकारी दैत्य में बदल दिया।
प्रतिशोध में अंधे होकर द्विविद वानर ने श्रीकृष्ण के राज्य आनर्त (द्वारका) और सौराष्ट्र (गुजरात) के क्षेत्रों में ऐसा भयंकर उत्पात मचाया कि प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। वह अपने दस हज़ार हाथियों के बल का प्रयोग निर्दोष प्रजा पर करने लगा।
वह दुष्ट वानर कभी समुद्र के किनारे पहुँच जाता और अपनी विशाल भुजाओं से समुद्र के जल को मथने लगता। वह समुद्र में इतनी ऊंची छलांगें लगाता कि उसकी चोट से समुद्र की गगनचुंबी लहरें उठतीं और तटीय गांवों, नगरों और बस्तियों को डुबो देती थीं। हज़ारों लोग बेघर हो गए और हाहाकार मच गया।
उसका अत्याचार यहीं नहीं रुका। वह जंगलों में जाकर ऋषियों और मुनियों के पवित्र आश्रमों को निशाना बनाता। जहाँ ऋषिगण यज्ञ कर रहे होते, वह वहां पहुँचकर यज्ञ कुंडों में मल-मूत्र त्याग देता, पवित्र अग्नि को बुझा देता और यज्ञ वेदियों को तोड़-फोड़ देता। वह तपस्वियों को पकड़कर पहाड़ की कंदराओं (गुफाओं) में बंद कर देता और बाहर से विशाल चट्टानें लगा देता, जिससे वे वहीं घुटकर मर जाएं। उसने किसानों की खड़ी फसलें, सुंदर बगीचे और वृक्षों को उखाड़कर फेंक दिया। पूरा राज्य उसके भय से कांप उठा था।
एक दिन, वह उत्पाती द्विविद वानर घूमता हुआ द्वारका के निकट स्थित अत्यंत सुंदर और रमणीय 'रैवतक पर्वत' (वर्तमान गिरनार पर्वत क्षेत्र) पर जा पहुँचा। दैवयोग से, उस समय वहां यदुवंशियों के परम आराध्य, साक्षात अनंत शेषनाग के अवतार भगवान बलराम जी (दाऊ भैया) विहार कर रहे थे।
उस समय बलराम जी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और मनमोहक था। उन्होंने नीले रंग के वस्त्र धारण किए थे, गले में वनपुष्पों की सुगंधित 'वैजयंती माला' थी, और एक कान में कमल का सुंदर पुष्प सुशोभित था। उनका गौर वर्ण (सफेद रंग) का विशाल शरीर चंद्रमा के समान चमक रहा था। वे 'वारुणी' (एक प्रकार का दिव्य पेय/मदिरा जो वरुण देव ने उन्हें दी थी) का पान करके आनंद और मस्ती की अवस्था में थे। उनके चारों ओर यदुवंश की सुंदर स्त्रियां और गोपियां मधुर स्वर में गीत गा रही थीं और बलराम जी की सेवा कर रही थीं। वहां का वातावरण अत्यंत शांत, पवित्र और आनंदमय था, ठीक वैसे ही जैसे स्वर्ग में देवराज इंद्र अप्सराओं के साथ विहार करते हैं।
जब उस अहंकारी और कामुक द्विविद वानर ने रैवतक पर्वत पर गीत-संगीत की ध्वनि सुनी और बलराम जी को सुंदर स्त्रियों से घिरा देखा, तो उसका राक्षसी स्वभाव और भड़क उठा। वह तुरंत वहां पहुँचा और वृक्षों की डालियों पर कूद-कूदकर उत्पात मचाने लगा।
उसने अत्यंत निर्लज्जता और धृष्टता का परिचय दिया। वह बलराम जी और उन कुलीन स्त्रियों के सामने जाकर खड़ा हो गया और विचित्र, अश्लील मुंह बनाने लगा। वह कभी दाँत किटकिटाता, कभी अजीब आवाजें निकालता, और कभी स्त्रियों के सामने अपनी पीठ फेरकर अत्यंत अभद्र इशारे करता। उसकी यह हरकतें किसी साधारण वानर की चंचलता नहीं, बल्कि एक कामुक राक्षस की नीचता थी।
परंतु द्विविद का काल निकट आ चुका था। वह उस पत्थर से बच गया और उसका अहंकार सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने बलराम जी का अपमान करने के लिए, उनके सामने रखा वह मदिरा का कलश (बर्तन) उठा लिया, जिसमें दिव्य वारुणी रस था, और उसे ज़मीन पर पटककर फोड़ दिया। इतना ही नहीं, उस दुष्ट ने सारी मर्यादाएं लांघते हुए, वहां उपस्थित यदुवंशी स्त्रियों के वस्त्रों को खींचने और फाड़ने का दुस्साहस किया।
जब बलराम जी ने देखा कि यह कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि एक दुष्ट राक्षस है जो मेरी उपस्थिति में मेरी ही कुलवधुओं और स्त्रियों का अपमान कर रहा है, तो उनके धैर्य का बांध टूट गया। जो बलराम जी शांति के सागर थे, वे ही अब प्रलय के महासागर बन गए।
उनका गौर वर्ण का शरीर क्रोध की अधिकता से तपाए हुए सोने के समान लाल हो गया। उनकी भृकुटियां तन गईं और नेत्रों से मानो आग की लपटें निकलने लगीं। उन्होंने तुरंत अपने दोनों अमोघ और प्रलयंकारी अस्त्र— 'हल' (Plow) और 'मूसल' (Club) —को धारण कर लिया और उस वानर को ललकारा।
द्विविद वानर भी युद्ध के लिए तैयार था। उसने अपने दस हज़ार हाथियों के बल का प्रयोग करते हुए पास ही खड़ा 'साल' (Sal Tree) का एक विशाल और गगनचुंबी वृक्ष जड़ सहित उखाड़ लिया। उसने उस महावृक्ष को हवा में घुमाया और पूरी शक्ति से बलराम जी के सिर पर दे मारा। परंतु दाऊ भैया तो पर्वतों के भी पर्वत हैं! उन्होंने तनिक भी विचलित हुए बिना, अपने 'सुन्नत' नामक मूसल को उठाया और उस आते हुए वृक्ष को बीच हवा में ही काटकर उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिए।
इसके बाद एक भयंकर महायुद्ध छिड़ गया। द्विविद वानर क्रोध में पागल होकर रैवतक पर्वत के बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर बलराम जी पर फेंकने लगा। दूसरी ओर, भगवान बलराम जी खेल-खेल में, मानो कोई बच्चों का खिलौना हो, उन विशाल वृक्षों को अपने मूसल के प्रहार से लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों और बुरादे में बदलते गए।
जब पर्वत के सारे वृक्ष समाप्त हो गए, तो द्विविद ने पर्वत की विशाल चट्टानों और शिखरों को उखाड़कर बरसाना शुरू कर दिया। बलराम जी ने अपने मूसल के वज्र समान प्रहारों से उन चट्टानों को भी पीसकर धूल (चूर्ण) बना दिया। यह दृश्य देखकर आकाश में स्थित देवता भी आश्चर्यचकित रह गए।
जब द्विविद वानर के पास फेंकने के लिए कोई भी वृक्ष, पत्थर या चट्टान नहीं बची, तो वह अंतिम बार पूरी शक्ति लगाकर बलराम जी की ओर दौड़ा। उसने अपनी दोनों लौह समान मुट्ठियों को बांधा और बलराम जी की चौड़ी छाती पर एक भयंकर प्रहार किया। उस प्रहार की ध्वनि इतनी तीव्र थी मानो वज्र गिरा हो।
परंतु आश्चर्य! उस भयंकर प्रहार से यदुनाथ बलराम जी अपने स्थान से एक इंच भी नहीं हिले, वे वैसे ही अविचल खड़े रहे जैसे फूलों की माला पहनने पर हाथी अविचल रहता है। अब बलराम जी ने उस वानर का अंत करने का निश्चय किया। उन्होंने सोचा, "इस पशु को मारने के लिए अस्त्रों की क्या आवश्यकता?"
अतः, भगवान बलराम ने अपने हल और मूसल को एक ओर रख दिया। साक्षात अनंत शक्तिधर ने अपनी वज्र के समान मुट्ठियां बांधीं और उस अहंकारी द्विविद के 'जत्रु' (Collarbone / गले और कंधे के बीच की हड्डी) पर एक ऐसा प्रलयंकारी मुक्का मारा, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड को हिला देने की शक्ति थी।
कराभ्यामेव तं रामो जत्रावभ्यहनद् रुषा ॥
स पपात व्यसुर्भूमौ लोहितं प्रक्षरन्मुखात् ।
(श्रीमद्भागवत 10.67.24-25 मूल संदर्भ)
उस दुष्ट का अंत होते ही आकाश से "जय हो! जय हो!" की ध्वनि गूंज उठी। सिद्ध, मुनि और देवताओं ने प्रसन्न होकर बलराम जी के ऊपर नंदनवन के दिव्य पुष्पों की वर्षा की। अप्सराएं नाचने लगीं और गंधर्वों ने बलराम जी के शौर्य का गान किया। इस प्रकार एक महान वीर का, केवल कुसंगति और अहंकार के कारण, अत्यंत दुखद और भयानक अंत हुआ।
श्रीमद्भागवत महापुराण की यह कथा केवल एक युद्ध का वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए अत्यंत गंभीर चेतावनियों और शिक्षाओं का भंडार है:
- कुसंगति का विष (The Poison of Bad Company): द्विविद वानर इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि अतीत के अच्छे कर्म (जैसे राम-सेवा) भी भविष्य की सुरक्षा की गारंटी नहीं हैं। यदि वर्तमान में हमारी संगति नरकासुर जैसे लोगों के साथ है, तो हमारा पतन निश्चित है। सत्संग हमें ऊपर उठाता है, और कुसंग हमें रसातल में ले जाता है।
- मर्यादा और स्त्री सम्मान: द्विविद ने जब तक पत्थर फेंके, बलराम जी ने सहन किया। परंतु जैसे ही उसने स्त्रियों का अपमान किया और मर्यादा तोड़ी, उसका तत्काल वध हो गया। यह सिखाता है कि ईश्वर अन्य अपराधों को क्षमा कर सकते हैं, किंतु मातृशक्ति और स्त्रियों का अपमान वे कभी सहन नहीं करते।
- बल का सही प्रयोग: बलराम जी के पास असीम बल था, परंतु उन्होंने उसका प्रयोग तब तक नहीं किया जब तक कि धर्म और मर्यादा खतरे में नहीं पड़ गई। उनका क्रोध भी धर्म की स्थापना के लिए ही था, निजी स्वार्थ के लिए नहीं।

