द्वापर युग अपने अंतिम चरण में था। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस उद्देश्य से पृथ्वी पर अवतार लिया था—अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना—वह कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के बाद पूर्ण हो चुका था। पृथ्वी का भार उतर चुका था, परंतु अब भगवान के सामने एक और बड़ी समस्या खड़ी थी। वह समस्या कोई और नहीं, बल्कि स्वयं उनका अपना अजेय 'यदुवंश' था। भगवान के आश्रय में यदुवंशी इतने बलवान और साधन-संपन्न हो गए थे कि देवता भी उन्हें युद्ध में हरा नहीं सकते थे। भगवान जानते थे कि यदि मैं अपने इस अजेय और उद्दंड कुल को पृथ्वी पर छोड़कर अपने परम धाम (वैकुंठ) चला गया, तो ये अपनी शक्ति के मद में पूरी पृथ्वी का विनाश कर देंगे। इसलिए, प्रभु ने अपने ही कुल के संहार के लिए एक ऐसी लीला रची, जिसकी शुरुआत 'पिण्डारक तीर्थ' में संतों के भयंकर श्राप से हुई।
द्वारका के निकट समुद्र तट पर एक अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थान था, जिसे 'पिण्डारक तीर्थ' कहा जाता था। एक बार भगवान श्रीकृष्ण से विदा लेकर कुछ महान और ब्रह्मज्ञानी महर्षि द्वारका से पिण्डारक तीर्थ की ओर गए। श्रीमद्भागवत महापुराण में उन महान ऋषियों के नाम इस प्रकार बताए गए हैं:
कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठो नारदादयः ॥
(श्रीमद्भागवत 11.1.11)
ये सभी ऋषि अत्यंत सिद्ध, त्रिकालदर्शी (तीनों कालों को जानने वाले) और भगवान के परम भक्त थे। उनका उद्देश्य केवल तीर्थ स्नान और भगवत-चर्चा करना था।
उसी समय, यदुवंश के अनेक किशोर और युवा कुमार भी खेलते-खेलते पिण्डारक तीर्थ में आ गए। इन कुमारों में भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवती के अत्यंत रूपवान पुत्र 'साम्ब' भी थे। इन यदुवंशियों को अपनी शक्ति, रूप, ऐश्वर्य और भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र-पौत्र होने का भयंकर अभिमान था।
जब उन घमंडी कुमारों ने तपस्या में लीन उन सीधे-सादे ऋषियों को देखा, तो उनकी मति (बुद्धि) भ्रमित हो गई। भगवान की माया से प्रेरित होकर, उनके मन में ऋषियों का उपहास (मजाक) उड़ाने की दुर्बुद्धि उत्पन्न हुई। उन्होंने साम्ब को स्त्रियों के कपड़े पहना दिए। उसके पेट पर एक बड़ा लोहे का बर्तन (कड़ाही/तसला) बांधकर उसे एक गर्भवती स्त्री (Pregnant Woman) का रूप दे दिया।
उन उद्दंड यादव कुमारों ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र होने का नाटक करते हुए महर्षियों से पूछा:
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किं स्विद् वो जनयिष्यति ॥
(श्रीमद्भागवत 11.1.15)
ये कुमार सोच रहे थे कि ये जंगल में रहने वाले ऋषि क्या जानेंगे, हम इनका मजाक उड़ाकर हँसेंगे। परंतु वे यह भूल गए कि संतों की दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं रहता और संतों का अपमान स्वयं भगवान भी सहन नहीं करते।
ऋषियों ने जैसे ही अपने ज्ञान-नेत्रों से उस 'गर्भवती स्त्री' को देखा, वे समझ गए कि यह कोई स्त्री नहीं बल्कि जाम्बवती का पुत्र साम्ब है, और ये उद्दंड बालक हमारा उपहास कर रहे हैं। संतों का हृदय यद्यपि अत्यंत कोमल होता है, परंतु जब कोई धर्म की मर्यादा तोड़कर उनका पाखंडपूर्ण मजाक उड़ाता है, तो वे भगवान की प्रेरणा से भयंकर रूप भी धारण कर लेते हैं।
ऋषियों के नेत्र क्रोध से लाल हो गए और उन्होंने यदुवंश के विनाश का वह प्रलयंकारी श्राप दे दिया, जिसका वर्णन भागवत के इस अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक श्लोक में है:
जनयिष्यति वो मन्दा मुसलं कुलनाशनम् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.1.16)
ऋषियों का वह वज्र के समान श्राप सुनकर यदुवंशी कुमारों के प्राण सूख गए। उनका सारा अहंकार पल भर में हवा हो गया। वे कांपने लगे। उन्होंने तुरंत साम्ब के पेट से वह कपड़ा और बर्तन हटाने का प्रयास किया। परंतु आश्चर्य और भय की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि साम्ब के पेट से सचमुच एक भयंकर लोहे का मूसल उत्पन्न हुआ था!
साम्बस्य ददृशुस्तस्मिन् मुसलं लोहजं नृप ॥
(श्रीमद्भागवत 11.1.18)
वे रोते हुए उस मूसल को लेकर द्वारका पहुँचे और उन्होंने महाराज उग्रसेन, भगवान श्रीकृष्ण, और बलराम जी को सारी घटना कह सुनाई। द्वारका के सभी लोग इस समाचार को सुनकर कांप उठे।
महाराज उग्रसेन अत्यंत भयभीत हो गए। उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि इस लोहे के मूसल को लोहे की रेती (File) से घिस-घिस कर चूर्ण (पाउडर) बना दिया जाए और उस चूर्ण को समुद्र में फेंक दिया जाए। ऐसा ही किया गया। मूसल का चूर्ण समुद्र में फेंक दिया गया, और घिसते-घिसते जो लोहे का एक छोटा सा तिकोना टुकड़ा बच गया था, उसे भी समुद्र में फेंक दिया गया।
समुद्र की लहरों ने उस लोहे के चूर्ण को द्वारका के तट पर लाकर फेंक दिया, जो बाद में 'एरका' (एक प्रकार की तीखी घास) के रूप में उग आया। और वह जो छोटा सा लोहे का टुकड़ा था, उसे एक मछली ने निगल लिया। बाद में उस मछली को एक मछुआरे ने पकड़ा और उसके पेट से वह लोहे का टुकड़ा 'जरा' नामक बहेलिए (शिकारी) को मिल गया। उसी जरा बहेलिए ने उस लोहे के टुकड़े से अपने तीर का बाणाग्र (तीर का अगला हिस्सा) बनाया, जो बाद में भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में लगा। (यह सब ईश्वरीय विधान था)।
श्रीमद्भागवत की यह कथा हमें जीवन के सबसे कठोर सत्य से परिचित कराती है:
- अहंकार का विनाश निश्चित है: जब शक्ति, धन या पद का अहंकार मस्तिष्क पर चढ़ जाता है, तो मनुष्य अपनी बुद्धि खो बैठता है। यदुवंशियों का बल ही उनके पतन का कारण बना।
- संतों का उपहास (महापाप): संतों, ऋषियों या गुरुजनों का मजाक उड़ाना ऐसा अपराध है, जिसे भगवान भी क्षमा नहीं करते। संतों की वाणी यदि एक बार निकल जाए, तो वह पत्थर की लकीर हो जाती है।
- ईश्वर की लीला और कर्मफल: जो ईश्वर ब्रह्मांड को चलाता है, वह कर्म के नियमों का स्वयं भी पालन करता है। भगवान ने अपने ही कुल को बचाने के लिए धर्म और कर्म के नियम नहीं तोड़े, बल्कि ईश्वरीय विधान (Destiny) को स्वीकार किया।

