Shatadhanva Vadh Aur Akrura Ka Dwarka Tyag: Syamantaka Mani Katha

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

शतधन्वा का वध और अक्रूर जी का द्वारका त्याग: स्यमन्तक मणि का महा-विवाद

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 57)

संसार में 'धन' और 'संपत्ति' का आकर्षण इतना भयंकर होता है कि वह बड़े-बड़े ज्ञानियों, साधुओं और वीरों की बुद्धि को भी भ्रष्ट कर देता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित 'स्यमन्तक मणि' की कथा इस बात का ज्वलंत प्रमाण है। यह वह अद्भुत मणि थी जिसने साक्षात द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण पर भी चोरी का झूठा कलंक लगा दिया था। जब भगवान ने जाम्बवान को युद्ध में हराकर वह मणि वापस लाकर सत्राजित को सौंपी, तो सत्राजित ने लज्जित होकर अपनी रूपवती पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया। परंतु मणि का यह विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ। इस मणि के कारण द्वारका में एक ऐसा खूनी षड्यंत्र रचा गया, जिसने यदुवंशियों के बीच फूट डाल दी, साक्षात बलराम जी को श्रीकृष्ण पर संदेह करने पर विवश कर दिया, और परम भक्त अक्रूर जी को द्वारका छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया।

1. अक्रूर और कृतवर्मा का षड्यंत्र तथा सत्राजित की हत्या

सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से होने से पूर्व, अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा— ये तीनों ही यदुवंशी सरदार सत्यभामा से विवाह करना चाहते थे। जब सत्राजित ने मणि और सत्यभामा दोनों श्रीकृष्ण को सौंप दिए (यद्यपि भगवान ने मणि लेने से इंकार कर दिया था), तो इन तीनों के भीतर ईर्ष्या और प्रतिशोध की अग्नि धधक उठी।

उसी समय, लाक्षागृह (Lakshagriha) में पांडवों के जल मरने की झूठी अफवाह फैली। यह समाचार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी हस्तिनापुर चले गए। श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर अक्रूर और कृतवर्मा ने अत्यंत दुष्ट और लालची 'शतधन्वा' को भड़काया। उन्होंने शतधन्वा से कहा— "सत्राजित ने हम सबका घोर अपमान करके सत्यभामा कृष्ण को दे दी है। तुम जाकर सत्राजित का वध कर दो और वह स्यमन्तक मणि छीन लो। घबराओ मत, हम हर स्थिति में तुम्हारे साथ हैं।"

शतधन्वा अत्यंत पापी था। एक रात जब सत्राजित अपने महल में गहरी नींद में सो रहा था, तब शतधन्वा ने उसके कक्ष में प्रवेश किया। स्त्रियों के चीखने और रोने की परवाह किए बिना, उस दुष्ट ने सोते हुए सत्राजित की निर्ममता से हत्या कर दी और बहुमूल्य स्यमन्तक मणि लूट कर भाग गया। महर्षि शुकदेव जी इस जघन्य कृत्य का वर्णन करते हुए कहते हैं:

॥ सत्राजित का वध ॥
एवं भिन्नमतिस्ताभ्यां सत्राजितमसत्तमः ।
शयानमवधील्लोभात् स पापः क्षीणजीवितः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.57.5)
अर्थ: अक्रूर और कृतवर्मा के द्वारा बुद्धि भ्रष्ट किए जाने पर, उस महापापी और दुष्ट शतधन्वा ने लोभवश सोते हुए सत्राजित का वध कर दिया। इस जघन्य पाप को करके उस पापी ने स्वयं अपनी आयु (जीवन) ही क्षीण कर ली।
2. सत्यभामा का विलाप और भगवान श्रीकृष्ण का प्रतिशोध

अपने पिता की इस प्रकार नृशंस हत्या देखकर महारानी सत्यभामा शोक से मूर्छित हो गईं। उन्होंने "हा तात! हा तात!" कहकर अत्यंत विलाप किया। सत्यभामा ने अपने पिता के शव को अंतिम संस्कार होने तक 'तेल के कड़ाहे' (Oil Vat) में सुरक्षित रखवाया और स्वयं रथ पर सवार होकर सीधे हस्तिनापुर की ओर निकल पड़ीं।

हस्तिनापुर पहुँचकर रोती हुई सत्यभामा ने भगवान श्रीकृष्ण को शतधन्वा के इस घोर पाप की सूचना दी। सर्वज्ञ भगवान श्रीकृष्ण यद्यपि सब जानते थे, फिर भी सामान्य मनुष्यों की भांति अपनी पत्नी के दुःख में दुःखी होने की लीला करते हुए बोले— "अहो कष्टम्! प्रिये! तुम चिंता मत करो। इस दुष्ट ने केवल तुम्हारे पिता को ही नहीं मारा है, बल्कि मेरे ससुर की हत्या करके मेरा भी घोर अपमान किया है। मैं इस पापी का वध अवश्य करूँगा।" भगवान श्रीकृष्ण और दाऊ भैया तुरंत द्वारका लौट आए और शतधन्वा को मारने की घोषणा कर दी।

3. शतधन्वा की प्राण-रक्षा की भीख और उसका पलायन

जब शतधन्वा को पता चला कि साक्षात काल-स्वरूप श्रीकृष्ण और बलराम उसके पीछे आ रहे हैं, तो वह मृत्यु के भय से थर-थर कांपने लगा। वह दौड़कर कृतवर्मा के पास गया और प्राणों की भीख मांगने लगा। परंतु कृतवर्मा ने साफ इंकार कर दिया और कहा— "मैं श्रीकृष्ण और बलराम से शत्रुता करने का दुस्साहस नहीं कर सकता।"

निराश होकर शतधन्वा अक्रूर जी के पास गया। अक्रूर जी परम ज्ञानी और भगवान के भक्त थे। जब शतधन्वा ने उनसे रक्षा की गुहार लगाई, तो अक्रूर जी ने स्पष्ट रूप से इंकार करते हुए कहा—

"अरे मूर्ख! जो भगवान खेल-खेल में गोवर्धन पर्वत उठा लेते हैं, जिन्होंने कंस जैसे महाबली का नाश कर दिया, और जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना करते हैं, उनसे विरोध (शत्रुता) करके तीनों लोकों में कौन जीवित रह सकता है? मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता।"

जब शतधन्वा ने देखा कि कोई उसका साथ नहीं दे रहा है, तो उसने वह चमकती हुई 'स्यमन्तक मणि' अक्रूर जी के पास छिपा दी। अक्रूर जी ने भी लोभवश उस मणि को अपने पास रख लिया। इसके बाद शतधन्वा एक अत्यंत तीव्र गति वाले घोड़े (जो एक दिन में सौ योजन दौड़ सकता था) पर सवार होकर अपने प्राण बचाने के लिए मिथिला की ओर भाग खड़ा हुआ।
4. मिथिला के पास शतधन्वा का वध

भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी गरुड़-ध्वज वाले अपने दिव्य रथ पर सवार होकर शतधन्वा का पीछा करने लगे। मिथिलापुरी के निकट पहुँचकर शतधन्वा का वह घोड़ा थककर गिर पड़ा और मर गया। शतधन्वा अब पैदल ही दौड़ भागने लगा।

यह देखकर भगवान श्रीकृष्ण भी रथ से कूद पड़े और पैदल ही उसका पीछा करने लगे। कुछ ही दूरी पर भगवान ने अपना अमोघ 'सुदर्शन चक्र' छोड़ दिया। सुदर्शन चक्र ने तीव्र गति से जाकर शतधन्वा का सिर धड़ से अलग कर दिया। शतधन्वा का अंत हो गया, परंतु जब भगवान श्रीकृष्ण ने उसके वस्त्रों की तलाशी ली, तो स्यमन्तक मणि उसके पास नहीं मिली!

5. मणि का न मिलना और दाऊ भैया (बलराम जी) का संदेह

श्रीकृष्ण ने लौटकर बलराम जी से कहा— "भैया! शतधन्वा तो मारा गया, परंतु स्यमन्तक मणि उसके पास नहीं है। वह मणि कहीं और है।"

यह सुनते ही बलराम जी को भगवान श्रीकृष्ण पर संदेह हो गया। मणि के प्रभाव और भगवान की माया से बलराम जी ने सोचा कि शायद कृष्ण ने मणि अपने पास रख ली है और मुझसे झूठ बोल रहे हैं।

बलराम जी ने क्रोधित होकर कहा— "कृष्ण! वह मणि जिसके भी पास है, वह अत्यंत भाग्यशाली है। तुम उसे अपने ही पास रखो। मुझे उस मणि की कोई आवश्यकता नहीं है। परंतु मैं अब तुम्हारे साथ द्वारका नहीं आऊँगा।" ऐसा कहकर बलराम जी श्रीकृष्ण को वहीं छोड़कर विदेहराज (जनक) की नगरी 'मिथिला' में चले गए। जनक जी ने बलराम जी का अत्यंत सत्कार किया। (यहीं पर दुर्योधन ने बलराम जी से गदा-युद्ध की शिक्षा प्राप्त की थी)।

6. अक्रूर जी का द्वारका त्याग और नगर में अरिष्ट (महामारी)

इधर द्वारका में जब अक्रूर जी और कृतवर्मा को पता चला कि शतधन्वा मारा गया है, तो वे भयभीत हो गए। अक्रूर जी स्यमन्तक मणि लेकर गुप्त रूप से द्वारका छोड़कर भाग गए। स्यमन्तक मणि की विशेषता थी कि वह जहाँ रहती थी, वहाँ महामारी या अकाल नहीं पड़ता था।

जैसे ही अक्रूर जी उस मणि को लेकर भागे, द्वारका में भयंकर बीमारियां और प्राकृतिक आपदाएं आने लगीं। श्रीमद्भागवत में इसका अत्यंत सटीक वर्णन मिलता है:

॥ मणि के अभाव में अरिष्ट ॥
अक्रूरे प्रोषितेऽरिष्टान्यासन् वै द्वारकौकसाम् ।
शारीरा मानसास्तापा मुहुर्दैविकभौतिकाः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.57.30)
अर्थ: अक्रूर जी के द्वारका से चले जाने पर द्वारकावासियों को अनेक प्रकार के अरिष्ट (बुरे शकुन और आपदाएं) दिखाई देने लगे। उन सभी लोगों को बार-बार शारीरिक, मानसिक, दैविक और भौतिक संताप (कष्ट) सताने लगे।

नगर के वृद्ध लोगों ने कहा— "अक्रूर के पिता श्वफल्क अत्यंत पुण्यात्मा थे। वे जहाँ रहते थे, वहाँ कभी अकाल नहीं पड़ता था। अक्रूर भी उन्हीं के समान पवित्र हैं। अक्रूर के द्वारका छोड़ने के कारण ही हमारे नगर पर ये विपत्तियां आई हैं। हमें उन्हें तुरंत वापस बुलाना चाहिए।"

7. अक्रूर की वापसी और स्यमन्तक मणि का सत्य प्रकट होना

भगवान श्रीकृष्ण अंतर्यामी हैं। वे सब जानते थे कि बीमारियां अक्रूर जी के जाने से नहीं, बल्कि 'स्यमन्तक मणि' के द्वारका से दूर जाने के कारण आई हैं। परंतु लोगों का भ्रम दूर करने और अपना मिथ्या कलंक मिटाने के लिए, भगवान ने दूत भेजकर अक्रूर जी को ससम्मान वापस द्वारका बुलवा लिया।

जब अक्रूर जी वापस आए, तो भगवान ने उनका अत्यंत आदर-सत्कार किया। फिर भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत मधुर, सम्मानजनक और कूटनीतिक शब्दों में अक्रूर जी से कहा:

॥ भगवान का अक्रूर जी से संवाद ॥
ननु दानपते न्यस्तस्त्वय्यास्ते शतधन्वना ।
स्यमन्तको मणिः श्रीमान् विदितः पूर्वमेव नः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.57.36)
अर्थ: भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा— "हे दानपते (अक्रूर जी)! हम यह बात पहले से ही जानते हैं कि शतधन्वा वह श्रीमान स्यमन्तक मणि आपके पास छोड़ गया था और वह अब भी आप ही के पास सुरक्षित है।"

भगवान ने आगे कहा— "सत्राजित का कोई पुत्र नहीं है, अतः उस मणि पर उनकी पुत्री सत्यभामा और मेरे पुत्रों का अधिकार है। परंतु उस मणि को धारण करना किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं है। आप अत्यंत पवित्र और व्रती हैं, इसलिए वह मणि आप ही के पास रहनी चाहिए। परंतु मेरे बड़े भाई बलराम और सत्यभामा को मुझ पर संदेह है। कृपया आप एक बार वह मणि इस भरी सभा में दिखा दीजिए, ताकि मेरा कलंक धुल जाए।"

8. अक्रूर जी द्वारा मणि का प्रदर्शन और कलंक मुक्ति

भगवान के इन सांत्वना और प्रेम भरे वचनों को सुनकर अक्रूर जी अत्यंत लज्जित हुए। उन्होंने उसी क्षण भरी सभा में वह मणि भगवान के सम्मुख प्रस्तुत कर दी:

॥ मणि का प्रदर्शन ॥
एवं सामभिरालब्धः श्वफल्कतनयो मणिम् ।
आदाय वाससाच्छन्नं ददौ सूर्यसमप्रभम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.57.40)
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण के इन सांत्वना भरे वचनों को सुनकर श्वफल्कनंदन (अक्रूर जी) ने अपने वस्त्रों में छिपाकर रखी हुई, सूर्य के समान दमकती हुई वह मणि निकाली और भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दी।

मणि का प्रकाश देखकर पूरी सभा चकाचौंध हो गई। भगवान श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्यभामा, बलराम जी और सभी यदुवंशियों को दिखाकर अपने ऊपर लगा 'चोरी का कलंक' सर्वदा के लिए मिटा दिया। और फिर भगवान की असीम करुणा देखिए— उन्होंने वह मणि स्वयं न रखकर, वापस अक्रूर जी को ही सौंप दी। अक्रूर जी उस मणि को धारण करके स्वर्ण के समान चमकने लगे।

कथा का फल (Phala Shruti) और आध्यात्मिक संदेश

स्यमन्तक मणि की यह कथा हमें सिखाती है कि अत्यधिक धन और संपत्ति अच्छे-अच्छे ज्ञानियों (जैसे अक्रूर जी) और वीरों के मन में भी लोभ उत्पन्न कर देती है। जब साक्षात ईश्वर पर कलंक लग सकता है, तो हम साधारण मनुष्यों की क्या बिसात! इसलिए समाज में लगने वाले मिथ्या आरोपों से घबराना नहीं चाहिए, सत्य अंततः प्रकट होकर ही रहता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण के इसी अध्याय के अंतिम श्लोक में इस कथा को सुनने का महान फल बताया गया है कि "जो भी मनुष्य इस स्यमन्तक मणि की कथा को पढ़ता, सुनता अथवा स्मरण करता है, वह अपनी समस्त दुष्कीर्ति (बदनामी/झूठे कलंक) और पापों से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है।"

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