थेरवाद और लंका: एक ऐतिहासिक महागाथा
"अशोक के धर्म-विजय से लेकर आधुनिक पुनरुत्थान तक"
१. धर्म का आगमन: मिहिंताले की भेंट
श्रीलंका में बौद्ध धर्म का इतिहास "महावंश" (Mahavamsa) नामक प्राचीन ग्रन्थ में विस्तार से मिलता है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में, ज्येष्ठ पूर्णिमा (Poson Poya) के दिन, अशोक पुत्र अर्हत महिंदा की भेंट श्रीलंका के राजा देवनम्पिया-तिस्सा से मिहिंताले की पहाड़ियों पर हुई।
महिंदा ने राजा की बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए उनसे "आम के वृक्ष" से जुड़ा एक प्रश्न पूछा। राजा के उत्तर से संतुष्ट होकर उन्होंने राजा और उनके दरबार को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। यह घटना श्रीलंका के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई।
२. शास्त्र संरक्षण: जब धर्म को लिखा गया
आरंभ में बुद्ध के उपदेश केवल मौखिक (Oral Tradition) रूप में कंठस्थ किए जाते थे। परन्तु पहली शताब्दी ईसा पूर्व में श्रीलंका में भयंकर अकाल पड़ा (जिसे 'बेमिनितिया सेया' कहा जाता है) और दक्षिण भारतीय आक्रमण हुए।
धर्म के लोप होने के डर से, राजा वट्टा गामिनी अभय (Valagamba) के शासनकाल में, ५०० अर्हत भिक्षु मटाले के अलोका-विहार (Aluvihara) में एकत्रित हुए। यहाँ उन्होंने पहली बार ताड़ के पत्तों पर 'पाली त्रिपिटक' को लिखा। यह बौद्ध इतिहास की सबसे युगांतकारी घटना थी।
३. औपनिवेशिक अंधकार और 'पानादुरा' का सूर्योदय
16वीं सदी से पुर्तगाली, डच और अंग्रेजों ने श्रीलंका पर कब्जा किया और बौद्ध धर्म को कुचलने का प्रयास किया। 19वीं सदी तक स्थिति ऐसी हो गई थी कि भिक्षुओं को छिपकर रहना पड़ता था।
महान पुनरुत्थान (1873): अगस्त 1873 में, मिगेत्तुवत्ते गुनानंद थेरा (Migettuwatte Gunananda Thera) नामक एक ओजस्वी भिक्षु ने ईसाई मिशनरियों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी। इसे "पानादुरा डिबेट" कहा जाता है। गुनानंद थेरा की तर्कों ने न केवल स्थानीय लोगों में स्वाभिमान जगाया, बल्कि इस घटना ने अमेरिकी कर्नल हेनरी स्टील ऑलकोट को भी आकर्षित किया, जिन्होंने बाद में बौद्ध शिक्षा के प्रचार में बड़ा योगदान दिया।
४. अद्भुत वास्तुकला और इंजीनियरिंग
श्रीलंका के प्राचीन स्तूप और सिंचाई व्यवस्था (Irrigation) इंजीनियरिंग का चमत्कार हैं। यहाँ की वास्तुकला न केवल धार्मिक है, बल्कि विज्ञान और कला का अद्भुत संगम है।
🗿 गल विहार (Gal Vihara) - पोलोन्नारुवा
12वीं शताब्दी में राजा पराक्रमबाहु प्रथम द्वारा निर्मित यह स्थल ग्रेनाइट की चट्टानों को काटकर बनाया गया है। यहाँ बुद्ध की चार प्रतिमाएं हैं:
- ध्यान मुद्रा: समाधि में लीन बुद्ध।
- खड़ी मुद्रा (7 मीटर): यह सबसे विशिष्ट है, जिसमें बुद्ध की भुजाएं छाती पर बंधी हैं (इसे 'दुःख भंजन' मुद्रा भी कहा जाता है)।
- परिनिर्वाण मुद्रा (14 मीटर): लेटी हुई विशाल प्रतिमा।
🛕 रुवानवेलिसेया (महान स्तूप)
राजा दुत्तुगामुनु (161-137 BC) द्वारा निर्मित यह स्तूप अपनी पवित्रता के लिए जाना जाता है। इसके आधार पर सैकड़ों हाथियों की कतार बनी है, जो यह दर्शाती है कि "पूरे धर्म का भार इन शक्तिशाली हाथियों ने उठा रखा है।"
५. पवित्र दंत अवशेष (Sacred Tooth Relic)
चौथी शताब्दी में कलिंग (ओडिशा, भारत) की राजकुमारी हेममाली और राजकुमार दंत अपने बालों के जूड़े में छिपाकर बुद्ध का पवित्र दांत श्रीलंका लाए थे।
प्राचीन काल से यह मान्यता रही है कि "जिसके पास यह दांत होगा, वही श्रीलंका का राजा होगा।" आज यह कैंडी के भव्य मंदिर में सुरक्षित है, जहाँ प्रतिदिन इसकी शाही पूजा होती है।

