'हरिश्चंद्र':'राजर्षि'
अक्सर यह जिज्ञासा होती है कि क्या 'हरिश्चंद्र' नाम का कोई वैदिक ऋषि था? शोध और धर्मग्रंथों के अनुसार, वेदों में जिस हरिश्चंद्र का उल्लेख है, वे इक्ष्वाकु वंशी राजा हरिश्चंद्र ही हैं। उन्हें वेदों में एक मंत्रदृष्टा ऋषि (Mantra-Seer) के रूप में नहीं, बल्कि एक 'यजमान' और 'राजर्षि' (Rajarshi) के रूप में दर्शाया गया है।
| वैदिक उल्लेख | ऐतरेय ब्राह्मण (7.13 - 7.18) |
| पदवी | राजर्षि (Royal Sage) |
| मुख्य प्रसंग | वरुण देव की उपासना और शुनीशेप आख्यान |
| क्या वे मंत्रदृष्टा थे? | नहीं, वे वैदिक कथा के नायक (Protagonist) हैं, मंत्र रचयिता नहीं। |
1. ऐतरेय ब्राह्मण की कथा (वैदिक सन्दर्भ)
ऋग्वेद की शाखा 'ऐतरेय ब्राह्मण' में हरिश्चंद्र की एक प्रसिद्ध कथा है जो पुराणों की सत्यवादी कथा से थोड़ी अलग है।
- वरुण से संवाद: इस वैदिक आख्यान में, राजा हरिश्चंद्र नारद मुनि की सलाह पर वरुण देव की उपासना करते हैं। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि यदि उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ, तो वे उसे वरुण को ही बलि चढ़ा देंगे।
- शुनीशेप प्रसंग: जब पुत्र (रोहित) हुआ, तो राजा मोहवश बलि टालते रहे। अंत में, उन्होंने अजीगर्त ऋषि के पुत्र 'शुनीशेप' को गोद लिया ताकि अपने पुत्र के स्थान पर उसकी बलि दे सकें। (यह कथा वैदिक काल में वचन की कठोरता को दर्शाती है)।
- विश्वामित्र की भूमिका: यज्ञ के दौरान विश्वामित्र ने शुनीशेप को बचाया और उसे अपना दत्तक पुत्र बना लिया।
2. 'विद्वान' और 'राजर्षि' में अंतर
वैदिक परंपरा में दो प्रकार के ज्ञानी माने गए हैं:
- ब्रह्मर्षि (विद्वान): जैसे वशिष्ठ और विश्वामित्र, जिन्होंने वेदों के मंत्र देखे (Composed/Saw Hymns)। हरिश्चंद्र इस श्रेणी में नहीं आते।
- राजर्षि (Royal Sage): वे राजा जो अपने तप और सत्यनिष्ठा के कारण ऋषियों जैसा सम्मान पाते हैं। हरिश्चंद्र इसी श्रेणी के महान राजर्षि हैं। महाभारत में नारद जी युधिष्ठिर से कहते हैं कि हरिश्चंद्र एकमात्र ऐसे राजा हैं जो सशरीर स्वर्ग में देवताओं की सभा में बैठते हैं।
निष्कर्ष
अतः, हरिश्चंद्र नाम के कोई अलग 'वैदिक विद्वान' नहीं थे। राजा हरिश्चंद्र ही वह व्यक्तित्व हैं जिनका चरित्र वेदों (ऐतरेय ब्राह्मण) से लेकर पुराणों (मार्कंडेय पुराण) तक फैला हुआ है। उनकी विद्वत्ता उनके 'त्याग' और 'सत्य' के पालन में निहित थी, न कि ग्रंथों की रचना में।
