कुमारिल भट्ट: मीमांसा के शिखर पुरुष, वार्तिककार और वेदों के परम रक्षक | Kumarila Bhatta

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
कुमारिल भट्ट: मीमांसा के 'वार्तिककार' और वैदिक धर्म के उद्धारक

भट्टपाद कुमारिल भट्ट: मीमांसा के 'वार्तिककार' और वैदिक धर्म के महानायक

एक ऐतिहासिक और दार्शनिक महागाथा: जिन्होंने बौद्ध तर्कों को ध्वस्त कर वेदों को पुनः स्थापित किया और अंत में प्रायश्चित की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।

भारतीय दर्शन के इतिहास में 7वीं शताब्दी एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ थी। यह वह समय था जब बौद्ध और जैन दर्शन अपने उत्कर्ष पर थे और वेदों के कर्मकांड (यज्ञ, विधि-विधान) को अंधविश्वास कहकर नकारा जा रहा था। इस घोर संकट काल में, आदि शंकराचार्य के आगमन से ठीक पहले, एक महान मीमांसक का उदय हुआ—कुमारिल भट्ट (Kumarila Bhatta)।

इन्हें सम्मान से 'भट्टपाद' या 'वार्तिककार' कहा जाता है। कुमारिल भट्ट ने अपनी अद्वितीय तार्किक शक्ति से बौद्ध दार्शनिकों (जैसे धर्मकीर्ति) को शास्त्रार्थ में परास्त किया। उन्होंने सिद्ध किया कि वेद 'अपौरुषेय' (Authorless) और 'स्वतः प्रमाण' (Self-valid) हैं। यदि शंकराचार्य ने 'ज्ञान' की स्थापना की, तो कुमारिल ने उस ज्ञान के लिए 'कर्म' की भूमि तैयार की।

📌 कुमारिल भट्ट: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम कुमारिल भट्ट (Kumarila Bhatta)
उपाधि वार्तिककार, भट्टपाद, मीमांसक-शिरोमणि
काल 7वीं शताब्दी (लगभग 650-700 ईस्वी)
सम्प्रदाय भाट्ट मीमांसा (Bhatta School)
स्थान प्रयाग (इलाहाबाद) / दक्षिण भारत (मतांतर)
शिष्य मंडन मिश्र, प्रभाकर मिश्र (गुरु), उम्बेक
प्रमुख ग्रंथ श्लोकवार्तिक, तन्त्रवार्तिक, टुप्टीका

2. जीवन परिचय: गुप्त वेश में विद्या और प्रायश्चित

कुमारिल भट्ट का जीवन रोमांच और त्याग से भरा है। जब वे युवा थे, उन्होंने देखा कि बौद्ध तार्किक वेदों की निंदा कर रहे हैं, लेकिन वैदिक विद्वान उनका उत्तर देने में असमर्थ हैं क्योंकि वे बौद्ध तर्कशास्त्र (Logic) को नहीं जानते थे।

📖 बौद्ध विहार में गुप्त वास

शत्रु को हराने के लिए उसकी विद्या सीखनी आवश्यक थी। कुमारिल ने अपनी पहचान छुपाई और एक बौद्ध विहार में छात्र के रूप में प्रवेश लिया। वे वहां बौद्ध न्याय और शून्यवद सीखने लगे।

नेत्र-भंग की घटना: एक दिन उनके बौद्ध गुरु वेदों की निंदा कर रहे थे। यह सुनकर कुमारिल की आँखों से आँसू निकल आए। गुरु समझ गए कि यह कोई बौद्ध नहीं, बल्कि वैदिक ब्राह्मण है। उन्होंने कुमारिल को छत से धक्का दे दिया (या मारने का प्रयास किया)। गिरते समय कुमारिल ने कहा—"यदि वेद सत्य हैं, तो मेरी मृत्यु नहीं होगी।"

वे बच गए, लेकिन उनकी एक आँख फूट गई। विद्वानों का कहना है कि उन्होंने "यदि" (If) शब्द का प्रयोग किया (संशय किया), इसलिए वेद ने प्राण तो बचाए पर पूर्ण रक्षा नहीं की।

3. भाट्ट मत (Bhatta School): मीमांसा का यथार्थवाद

कुमारिल भट्ट द्वारा स्थापित मत को 'भाट्ट मत' कहते हैं। यह मीमांसा दर्शन की सबसे लोकप्रिय शाखा है। अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य) ने भी व्यावहारिक दुनिया (Empirical World) के लिए भाट्ट मत को ही अपनाया है—"व्यवहारे भाट्टनयः"

भाट्ट मत के मुख्य सिद्धांत
  • स्वतः प्रामाण्य: ज्ञान (Knowledge) अपने आप में प्रमाण होता है। उसे सही साबित करने के लिए किसी दूसरे प्रमाण की जरूरत नहीं। हाँ, ज्ञान 'गलत' हो सकता है यदि उसे काटने वाला कोई दूसरा ज्ञान आ जाए (परतः अप्रामाण्य)।
  • विपरीत ख्याति (Error): जब हम रस्सी को साँप समझते हैं, तो यह केवल 'भूल' नहीं है (जैसा प्रभाकर मानते हैं), बल्कि यह एक 'गलत आरोपण' (Misapprehension) है। हमने एक गलत वस्तु को वहां प्रोजेक्ट किया।
  • कर्म की प्रधानता: मोक्ष का साधन 'ज्ञान' नहीं, बल्कि निष्काम कर्म और वैदिक आज्ञाओं का पालन है।

4. महान कृतियाँ: श्लोकवार्तिक और तंत्रवार्तिक

कुमारिल ने शबर स्वामी के भाष्य पर तीन विशाल टीकाएँ (वार्तिक) लिखीं:

  • श्लोकवार्तिक (Slokavartika): यह पद्य (Verse) में है और तर्कशास्त्र का खजाना है। इसमें उन्होंने बौद्ध शून्यवाद और विज्ञानवाद का विस्तार से खंडन किया है।
  • तंत्रवार्तिक (Tantravartika): यह गद्य (Prose) में है और मीमांसा के कर्मकांड पक्ष की व्याख्या करता है।
  • टुप्टीका (Tuptika): यह अंतिम अध्यायों की संक्षिप्त टीका है।

5. अनुपलब्धि प्रमाण: 'अभाव' को सिद्ध करना

न्याय दर्शन 4 प्रमाण मानता है, प्रभाकर 5 मानते हैं, लेकिन कुमारिल ने 6 प्रमाण माने। उन्होंने छठा प्रमाण जोड़ा—अनुपलब्धि (Non-apprehension)।

प्रश्न: आप कैसे जानते हैं कि "कमरे में हाथी नहीं है"?

कुमारिल का उत्तर: आप इसे आँखों से (प्रत्यक्ष) नहीं देख सकते, क्योंकि "हाथी का न होना" कोई दिखने वाली वस्तु नहीं है। आप अनुमान भी नहीं लगा रहे। आप इसे अनुपलब्धि से जानते हैं। यानी—"यदि हाथी होता, तो दिखता। चूँकि नहीं दिख रहा, अतः नहीं है।"

इस प्रमाण ने भारतीय तर्कशास्त्र में "नास्ति" (Negation) को समझने का नया द्वार खोला।

6. प्रयाग का महामिलन: शंकराचार्य और तुषाग्नि

कुमारिल भट्ट के जीवन का अंत अत्यंत मार्मिक है। उन्होंने दो महापाप माने थे:
1. अपने बौद्ध गुरु से विद्या सीखकर उन्हीं का खंडन करना (गुरु-द्रोह)।
2. वेदों के सत्य होने पर संशय करना (छत से गिरते समय 'यदि' कहना)।

प्रायश्चित के रूप में, उन्होंने प्रयाग (संगम) में 'तुषाग्नि' (धान की भूसी की धीमी आग) में जलकर देह त्यागने का निर्णय लिया। यह मृत्यु अत्यंत कष्टदायक होती है।

🔥 शंकराचार्य से भेंट

जब कुमारिल भट्ट आधी देह तक जल चुके थे, तब युवा आदि शंकराचार्य (जो केवल 16 वर्ष के थे) वहां पहुंचे। शंकर उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। कुमारिल ने उन्हें देखा और मुस्कुराए। उन्होंने कहा—
"मैं कर्मकांड का रक्षक हूँ और तुम ज्ञानमार्ग के सूर्य हो। मैं अब शास्त्रार्थ की स्थिति में नहीं हूँ, क्योंकि मैं प्रायश्चित कर रहा हूँ। यदि तुम अद्वैत की विजय चाहते हो, तो मेरे शिष्य मंडन मिश्र (जो महिष्मती में रहते हैं) के पास जाओ। यदि तुमने उन्हें हरा दिया, तो समझो तुमने मुझे हरा दिया।"

कहा जाता है कि शंकराचार्य ने उन्हें बचाने का प्रस्ताव दिया, पर कुमारिल अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहे और अग्नि में विलीन हो गए।

7. निष्कर्ष: कुमारिल का चिरस्थायी प्रभाव

भट्टपाद कुमारिल भट्ट का ऋण भारतीय संस्कृति कभी नहीं चुका सकती।

  • बौद्धिक विजय: उन्होंने बौद्ध धर्म को हिंसा से नहीं, बल्कि शास्त्र और तर्क से भारत की मुख्यधारा से बाहर किया।
  • यथार्थवाद: उन्होंने सिखाया कि यह जगत सपना नहीं है (जैसा कुछ बौद्ध मानते थे), यह सत्य है और हमारे कर्मों का फल भी सत्य है।
  • वेदांत का आधार: यदि कुमारिल ने कर्मकांड को स्थापित न किया होता, तो शंकराचार्य को 'ज्ञान' के लिए आधार ही न मिलता। क्योंकि "चित्त की शुद्धि कर्म से होती है, और शुद्ध चित्त में ही ज्ञान टिकता है।"

कुमारिल भट्ट एक ऐसे दीपक थे जो वेदों के सम्मान के लिए तिल-तिल कर जले, ताकि आने वाली पीढ़ियां धर्म के प्रकाश में चल सकें।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • श्लोकवार्तिक - कुमारिल भट्ट (अनुवाद: डॉ. गंगानाथ झा)।
  • शंकर दिग्विजय - माधव विरचित (जीवन चरित्र)।
  • History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Vol I - Mimamsa).
  • तन्त्रवार्तिक - हिंदी टीका।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!