आचार्य प्रभाकर मिश्र: मीमांसा के 'गुरु', अख्यातिवाद के प्रवर्तक और कर्तव्य के दार्शनिक | Prabhakara Mishra

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य प्रभाकर मिश्र: मीमांसा के 'गुरु' और यथार्थवाद के शिखर पुरुष

आचार्य प्रभाकर मिश्र: मीमांसा के 'गुरु' और यथार्थवाद के महान दार्शनिक

एक विस्तृत दार्शनिक यात्रा: जिन्होंने अपने गुरु कुमारिल भट्ट से अलग होकर 'गुरुमत' की स्थापना की और दुनिया को बताया कि "ज्ञान कभी गलत नहीं होता।"

भारतीय दर्शन में **पूर्व मीमांसा** (Purva Mimamsa) कर्मकांड, वेद-व्याख्या और ज्ञान-मीमांसा का सबसे सशक्त दर्शन है। 7वीं-8वीं शताब्दी में इस दर्शन में दो महान आचार्य हुए—कुमारिल भट्ट और उनके शिष्य प्रभाकर मिश्र

प्रभाकर मिश्र ने अपने गुरु के मतों से असहमति जताते हुए एक नई विचारधारा को जन्म दिया, जिसे 'गुरुमत' (The Guru's School) या 'प्रभाकर मत' कहा जाता है। उनका दर्शन इतना सूक्ष्म और तार्किक था कि परंपरा ने शिष्य (प्रभाकर) को गुरु (कुमारिल) से भी अधिक भारी उपाधि 'गुरु' से विभूषित किया। प्रभाकर का मानना था कि ज्ञान स्वयं-प्रकाश (Self-luminous) है और वेदों का मुख्य उद्देश्य केवल 'कार्य' (Action) के लिए प्रेरित करना है।

📌 आचार्य प्रभाकर मिश्र: एक दृष्टि में
पूरा नाम प्रभाकर मिश्र (Prabhakara Mishra)
उपाधि गुरु (The Teacher), निबन्धनकार
काल 7वीं - 8वीं शताब्दी (लगभग 650-720 ईस्वी)
सम्प्रदाय गुरुमत (प्रभाकर मीमांसा)
गुरु कुमारिल भट्ट (परंपरानुसार)
प्रमुख सिद्धांत अख्यातिवाद (No Illusion), अन्विताभिधानवाद, त्रिपुटी प्रत्यक्ष
प्रमुख ग्रंथ बृहती (शबर भाष्य पर टीका), लघ्वी

2. जीवन परिचय और 'गुरु' उपाधि की रोचक कथा

प्रभाकर मिश्र का जीवन वृत्त बहुत स्पष्ट नहीं है, लेकिन भारतीय दार्शनिक परंपरा उन्हें कुमारिल भट्ट का शिष्य मानती है। उनके जीवन की एक प्रसिद्ध किंवदंती बताती है कि उन्हें 'गुरु' की उपाधि कैसे मिली।

📖 'अत्र-तुत्र' की कथा (The Legend of Tutra)

कहा जाता है कि कुमारिल भट्ट 'शबर भाष्य' के एक अत्यंत जटिल वाक्य "अत्र तुन्नो..." का अर्थ समझने में कठिनाई महसूस कर रहे थे। वाक्य अस्पष्ट था। उनके शिष्य प्रभाकर ने उस वाक्य को पढ़ा और तुरंत उसका सही अर्थ और अन्वय (Syntax) निकाल दिया। उन्होंने सुझाया कि यहाँ "अत्र तुन्नो" (यहाँ तोड़ा गया) नहीं, बल्कि "अत्र-तु-न-उक्तम्" (यहाँ यह नहीं कहा गया है) पढ़ना चाहिए।

शिष्य की इस मेधा को देखकर कुमारिल भट्ट अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा—"अत्र तु अहं तव शिष्यः, त्वं मम गुरुः" (इस विषय में मैं तुम्हारा शिष्य हूँ और तुम मेरे गुरु हो)। तभी से प्रभाकर का मत 'गुरुमत' कहलाने लगा।

3. त्रिपुटी-प्रत्यक्ष और ज्ञान का स्वप्रकाशत्व

प्रभाकर का ज्ञान सिद्धांत (Epistemology) अत्यंत अनूठा है। वे मानते हैं कि ज्ञान कभी छिपा नहीं रहता, वह दीपक की तरह स्वयं को और वस्तुओं को प्रकाशित करता है।

त्रिपुटी प्रत्यक्ष (The Theory of Triple Revelation)

प्रभाकर के अनुसार, हर ज्ञान (Knowledge) में एक साथ तीन चीजें प्रकट होती हैं:

  • 1. ज्ञाता (Subject): जानने वाला (मैं)।
  • 2. ज्ञेय (Object): जो जाना जा रहा है (जैसे—घड़ा)।
  • 3. ज्ञान (Cognition): जानने की क्रिया।

उदाहरण: जब मैं कहता हूँ "मैं घड़े को जानता हूँ", तो इसमें 'मैं' (आत्मा), 'घड़ा' (विषय) और 'जानना' (ज्ञान) तीनों एक साथ भासित होते हैं। इसे त्रिपुटी-भान कहते हैं। ज्ञान स्व-प्रकाश (Self-luminous) है, इसे जानने के लिए किसी दूसरे ज्ञान की जरूरत नहीं होती।

4. अख्यातिवाद: "भ्रम कुछ नहीं होता" (Theory of Error)

भारतीय दर्शन में "हम गलती क्यों करते हैं?" (Theory of Error) पर बहुत बहस हुई है। शंकराचार्य इसे 'अनिर्वचनीय' कहते हैं, कुमारिल 'विपरीत-ख्याति' कहते हैं। लेकिन प्रभाकर का सिद्धांत सबसे क्रांतिकारी है—अख्यातिवाद (Akhyati - Non-apprehension).

सिद्धांत: प्रभाकर कहते हैं, "ज्ञान कभी झूठा नहीं होता" (All knowledge is valid).

उदाहरण: जब आप रस्सी को साँप समझ लेते हैं, तो प्रभाकर के अनुसार:

  • आपने 'रस्सी' को देखा (प्रत्यक्ष)।
  • आपको 'साँप' की याद आई (स्मृति)।
  • गलती यहाँ हुई कि आप यह भूल गए कि साँप केवल याद (Memory) है, सामने नहीं है।

इसे 'स्मृति-प्रमोष' (Loss of memory of the distinction) कहते हैं। अर्थात, भ्रम कोई 'नया ज्ञान' नहीं है, बल्कि दो सही ज्ञानों (देखना और याद करना) के बीच का 'अंतर' न समझ पाना है। इसलिए प्रभाकर के लिए "भ्रम" जैसी कोई सकारात्मक चीज नहीं है, यह केवल विवेक का अभाव (Non-apprehension) है।

5. अन्विताभिधानवाद: भाषा और अर्थ का सिद्धांत

शब्द अर्थ कैसे देते हैं? इस पर प्रभाकर का मत 'अन्विताभिधानवाद' कहलाता है।

अन्विताभिधानवाद (Anvitabhidhanavada)

प्रभाकर मानते हैं कि शब्दों का अपना कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता जब तक कि वे किसी वाक्य में जुड़ न जाएं, और वह वाक्य किसी 'कार्य' (Action) से संबंधित न हो।

उदाहरण: "गाय" शब्द का तब तक कोई मतलब नहीं जब तक कहा न जाए "गाय लाओ"। बच्चे भाषा "कार्य" (Action) को देखकर सीखते हैं। इसलिए, वेद के वही वाक्य प्रमाण हैं जो किसी क्रिया (यज्ञ, विधि) का आदेश देते हैं। जो वाक्य केवल जानकारी देते हैं (सिद्ध वस्तु), वे प्रमाण नहीं हैं।

6. धर्म और 'नियोग': कर्तव्य के लिए कर्तव्य

पूर्व मीमांसा का मुख्य विषय 'धर्म' है। कुमारिल मानते हैं कि वेद 'भावना' (Bhavana) सिखाते हैं। लेकिन प्रभाकर कहते हैं कि वेद का सार 'नियोग' (Command/Ought) है।

नियोग क्या है?
यह एक 'अपूर्व' (Unseen Force) है। जब वेद कहता है "यज्ञ करो", तो यह एक आदेश (Categorical Imperative) है। हमें यज्ञ इसलिए नहीं करना चाहिए कि हमें फल (स्वर्ग) चाहिए, बल्कि इसलिए करना चाहिए क्योंकि यह आदेश (Duty) है। प्रभाकर का यह सिद्धांत इम्मैनुएल कांट (Kant) के "Duty for Duty's sake" के बहुत निकट है।

7. गुरुमत बनाम भाट्टमत (प्रभाकर vs कुमारिल)

मीमांसा के इन दो दिग्गजों के बीच का अंतर समझना आवश्यक है:

विषय कुमारिल भट्ट (भाट्ट मत) प्रभाकर मिश्र (गुरु मत)
ज्ञान प्रामाण्य स्वतः प्रामाण्य (Self-validity). स्वतः प्रामाण्य (Self-validity).
भ्रम का सिद्धांत विपरीत-ख्याति (रस्सी में साँप का दिखना गलत ज्ञान है)। अख्याति (ज्ञान गलत नहीं होता, बस भेद का आग्रहण है)।
आत्मा का ज्ञान आत्मा 'मानस प्रत्यक्ष' का विषय है (मैं खुद को देखता हूँ)। आत्मा 'ज्ञाता' के रूप में हर ज्ञान में स्वतः प्रकट होती है (त्रिपुटी)।
अभाव (Negation) अभाव एक स्वतंत्र पदार्थ है (अनुपलब्धि प्रमाण)। अभाव कुछ नहीं है, वह केवल 'आधार' (Locus) का ज्ञान है।
वेद का अर्थ अभिहितान्वयवाद (शब्दों के अर्थ जुड़ते हैं)। अन्विताभिधानवाद (वाक्य का अर्थ प्रधान है)।

8. निष्कर्ष: प्रभाकर का प्रभाव

आचार्य प्रभाकर मिश्र भारतीय दर्शन के उन विरले चिंतकों में से हैं जिन्होंने "यथार्थवाद" (Realism) की चरम सीमा को छू लिया। उन्होंने सिखाया कि हमारी चेतना और दुनिया के बीच सीधा संबंध है। उनका दर्शन हमें सिखाता है कि:

  • कर्तव्य सर्वोपरि है: फल की चिंता किए बिना वेद के आदेश का पालन करना ही धर्म है।
  • सत्य की निष्ठा: ज्ञान कभी धोखा नहीं देता, हमारी अपूर्णता (स्मृति दोष) ही भ्रम पैदा करती है।

यद्यपि बाद के काल में कुमारिल भट्ट का मत (भाट्ट मत) अधिक लोकप्रिय हुआ और वेदांतियों ने भी व्यावहारिक स्तर पर भाट्ट मत को अपनाया, फिर भी न्याय-व्यवस्था (Jurisprudence) और भाषा-विज्ञान (Linguistics) में प्रभाकर के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। 'गुरुमत' आज भी भारतीय तार्किकता का एक उज्ज्वल अध्याय है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • बृहती - प्रभाकर मिश्र (मद्रास विश्वविद्यालय प्रकाशन)।
  • मीमांसा दर्शन - हिंदी व्याख्या।
  • Introduction to Purva Mimamsa - Dr. G.N. Jha.
  • The Prabhakara School of Purva Mimamsa - G.N. Jha.

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