महर्षि दीर्घतमस: ऋग्वेद के दिव्यदृष्टा और 'अस्य वामीय सूक्त' के महान ऋषि
एक विस्तृत शोधपरक और आध्यात्मिक आलेख (The Seer of the Asya Vamiya Hymn & Cosmic Mysteries)
वैदिक ऋषियों की आकाशगंगा में महर्षि दीर्घतमस (Maharishi Dirghatamas) एक ध्रुव तारे के समान हैं। वे अंगिरा कुल के ऋषि उचथ्य और ममता के पुत्र थे। उनका जीवन संघर्ष और जिजीविषा की अद्भुत गाथा है। जन्म से नेत्रहीन (अंधे) होने के बावजूद, उन्होंने अपनी प्रज्ञा-चक्षुओं (Inner Vision) से वेदों के उन रहस्यों को देखा, जो आँखों वालों के लिए भी दुर्लभ थे। वे ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के प्रमुख मंत्रद्रष्टा हैं और भारतीय दर्शन के अद्वैतवाद (Monism) की नींव रखने वाले आदि ऋषियों में से एक हैं।
| पिता | महर्षि उचथ्य (Uchathya) |
| माता | ममता (Mamata) |
| कुल / वंश | अंगिरा गोत्र (Angirasa) |
| प्रमुख रचना | ऋग्वेद का 'अस्य वामीय सूक्त' (1.164) |
| विशेष सिद्धि | दिव्यदृष्टि और सूर्योपासना |
| पुत्र | महर्षि कक्षीवान (Kakshivat) |
1. जन्म कथा: 'दीर्घतमस' नाम का रहस्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दीर्घतमस अपनी माता के गर्भ में थे, तब उनके चाचा बृहस्पति ने ममता के साथ सहवास करने का प्रयास किया। गर्भस्थ शिशु ने इसका विरोध किया, जिससे क्रोधित होकर बृहस्पति ने शाप दिया— "तू लंबे समय तक अंधकार (अंधेरे) में रहेगा।"
इसी शाप के कारण वे जन्मांध (Blind by birth) पैदा हुए और उनका नाम 'दीर्घ-तमस' (लंबे समय तक अंधकार में रहने वाला) पड़ा। युवावस्था में उन्हें कई कष्ट सहने पड़े, यहाँ तक कि उनके परिवार ने उन्हें गंगा में बहा दिया था। किन्तु, राजा बलि ने उन्हें बचाया। अंततः, उन्होंने अग्नि और सूर्य की उपासना से अपनी दृष्टि पुनः प्राप्त की, जो प्रतीकात्मक रूप से 'अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश' की यात्रा है।
2. अस्य वामीय सूक्त: सृष्टि और पहेलियाँ
ऋग्वेद का सूक्त 1.164 (अस्य वामीय सूक्त) विश्व साहित्य की सबसे प्राचीन और जटिल दार्शनिक पहेलियों का संग्रह है। इसमें 52 मंत्र हैं जो ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करते हैं।
- दो पक्षियों का रूपक: "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया..." — एक ही वृक्ष (शरीर) पर दो पक्षी (आत्मा और परमात्मा) बैठे हैं। एक फल (कर्मफल) खाता है, दूसरा केवल साक्षी भाव से देखता है।
- काल चक्र (Time Wheel): उन्होंने संवत्सर (वर्ष) को एक चक्र के रूप में वर्णित किया जिसमें 12 अरे (महीने) और 360 खूंटियां (दिन) हैं, जो कभी पुराना नहीं होता।
3. महावाक्य: एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति
महर्षि दीर्घतमस का सबसे बड़ा योगदान भारतीय धर्मनिरपेक्षता और अध्यात्म की नींव है। उन्होंने घोषणा की कि यद्यपि हम अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि देवताओं की पूजा करते हैं, किन्तु तत्वतः (Reality) वे सब एक ही हैं। यह विचार 'एकेश्वरवाद' (Monotheism) और 'बहुदेववाद' (Polytheism) के बीच का सेतु है।
4. निष्कर्ष
महर्षि दीर्घतमस का जीवन हमें सिखाता है कि शारीरिक अक्षमता (अंधत्व) प्रज्ञा के उदय को नहीं रोक सकती। उन्होंने अंधकार को चुनौती दी और वेदों को वह प्रकाश दिया जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। उनके द्वारा रचित 'अस्य वामीय सूक्त' आज भी विद्वानों के लिए शोध का विषय है, जो खगोल विज्ञान, गणित और अध्यात्म का अद्भुत संगम है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- ऋग्वेद संहिता (प्रथम मण्डल, सूक्त 140-164)।
- महाभारत (आदि पर्व - संभव पर्व)।
- विष्णु पुराण।
- वैदिक साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।
