महर्षि पतंजलि: योग सूत्र के प्रणेता, व्याकरण के विद्वान और मानव जाति के उद्धारक
(Yoga Philosophy, Grammar & Ayurveda)
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥" अर्थ: जिन्होंने योग द्वारा चित्त की, व्याकरण द्वारा वाणी की और आयुर्वेद द्वारा शरीर की अशुद्धियों को दूर किया, उन मुनिश्रेष्ठ पतंजलि को मैं हाथ जोड़कर नमन करता हूँ।
भारतीय मेधा के इतिहास में महर्षि पतंजलि (Maharishi Patanjali) का व्यक्तित्व अद्वितीय है। उन्हें केवल एक ऋषि नहीं, बल्कि एक महान मनोवैज्ञानिक, भाषाविद और चिकित्सक माना जाता है। उन्होंने मानव जीवन के तीन मुख्य आयामों—मन, वाणी और देह—को स्वस्थ और पवित्र बनाने के लिए तीन मार्ग प्रशस्त किए। पतंजलि द्वारा रचित 'योग सूत्र' आज वैश्विक स्तर पर योग का आधार स्तंभ है, जो मनुष्य को स्वयं से साक्षात्कार कराने की वैज्ञानिक विधि बताता है।
| उपाधि | योग सूत्र के प्रणेता, महाभाष्यकार |
| अवतार | अनंत शेषनाग के अवतार |
| माता | देवी गोणिका (पौराणिक कथाओं के अनुसार) |
| प्रमुख ग्रंथ | योग सूत्र, महाभाष्य (व्याकरण), चरक संहिता परिशोधन |
| दार्शनिक श्रेणी | योग दर्शन (षड्दर्शन में से एक) |
| मुख्य सिद्धांत | अष्टांग योग (Ashtanga Yoga) |
1. योग सूत्र: मन के नियंत्रण का विज्ञान
महर्षि पतंजलि ने बिखरे हुए योग ज्ञान को 196 सूत्रों में संकलित किया। उनके अनुसार योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि 'चित्त की वृत्तियों का निरोध' (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः) है।
उन्होंने अष्टांग योग का मार्ग दिया, जो आज भी साधना का सर्वोत्तम पथ है:
- यम: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
- नियम: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।
- आसन: शरीर की स्थिर और सुखद स्थिति।
- प्राणायाम: श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण।
- प्रत्याहार: इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाना।
- धारणा: मन को एक स्थान पर केंद्रित करना।
- ध्यान: निरंतर एकाग्रता।
- समाधि: आत्मा का परमात्मा से मिलन।
2. महाभाष्य: संस्कृत व्याकरण का महान स्तंभ
वाणी की शुद्धि के लिए पतंजलि ने पाणिनी की 'अष्टाध्यायी' पर 'महाभाष्य' (Mahabhashya) लिखा। पाणिनी के सूत्रों को व्यावहारिक उदाहरणों और तर्कों के माध्यम से स्पष्ट करना उनका महान कार्य था। व्याकरण जगत में उन्हें 'मुनित्रय' (पाणिनी, कात्यायन, पतंजलि) में अंतिम और निर्णायक स्थान प्राप्त है। उनके महाभाष्य की भाषा इतनी सरल और प्रवाहपूर्ण है कि उसे 'प्रसन्न-गंभीर' कहा जाता है।
3. आयुर्वेद: शरीर की शुद्धि में योगदान
ऐसी मान्यता है कि पतंजलि ही चरक संहिता के परिशोधक थे। शरीर के विकारों को दूर करने के लिए उन्होंने औषधियों और निदान की विधियों पर काम किया। प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि पतंजलि ने आयुर्वेद के माध्यम से यह संदेश दिया कि "जब तक शरीर स्वस्थ नहीं होगा, तब तक मन की शांति और मोक्ष संभव नहीं है।"
4. निष्कर्ष
महर्षि पतंजलि का जीवन मानवता के लिए एक वरदान है। उन्होंने हमें वह तकनीक दी जिससे हम अपने भीतर की अनंत ऊर्जा को पहचान सकें। आज का आधुनिक विश्व जिस तनाव और अशांति से जूझ रहा है, उसका एकमात्र समाधान पतंजलि के योग सूत्रों में निहित है। वे एक ऐसे वैज्ञानिक ऋषि थे जिन्होंने सिद्ध किया कि आत्म-अनुशासन ही स्वतंत्रता का मार्ग है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- पातंजल योग सूत्र (व्यास भाष्य सहित)।
- व्याकरण महाभाष्य (महर्षि पतंजलि)।
- चरक संहिता (सूत्रस्थान)।
- भारतीय दर्शन का इतिहास - डॉ. राधाकृष्णन।
