महर्षि कणाद: विश्व के प्रथम परमाणु वैज्ञानिक और वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक
(Vedic Physics & Atomic Theory)
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः॥" अर्थ: अब हम धर्म की व्याख्या करेंगे। जिससे लौकिक उन्नति (अभ्युदय) और पारलौकिक कल्याण (मोक्ष) की सिद्धि हो, वही धर्म है। — (वैशेषिक सूत्र 1.1.1-2)
पाश्चात्य जगत में जॉन डाल्टन (John Dalton) को परमाणु सिद्धांत का जनक माना जाता है, किन्तु उनसे लगभग 2500 वर्ष पूर्व भारत की धरती पर एक ऐसे महान ऋषि हुए थे जिन्होंने न केवल 'परमाणु' (Atom) की खोज की, बल्कि उसकी संरचना और गति के नियमों को भी परिभाषित किया। वे थे महर्षि कणाद (Maharishi Kanada)। उन्होंने 'वैशेषिक दर्शन' की स्थापना की, जो पदार्थ विज्ञान (Physics) और दर्शन (Philosophy) का अद्भुत संगम है।
| मूल नाम | उलूक, काश्यप |
| प्रसिद्ध नाम | कणाद (Kanada), कणभुक |
| प्रमुख ग्रंथ | वैशेषिक सूत्र (Vaisheshika Sutra) |
| दर्शन | वैशेषिक दर्शन (षड्दर्शन में से एक) |
| मुख्य खोज | परमाणुवाद (Atomic Theory), गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा |
| निवास क्षेत्र | द्वारका या प्रभास क्षेत्र (गुजरात) के आसपास |
1. नाम रहस्य: कणाद या उलूक?
महर्षि का मूल नाम 'उलूक' मुनि था। उन्हें 'कणाद' नाम मिलने के पीछे दो रोचक मान्यताएँ हैं:
- कण + अद् (अन्न के कण खाने वाला): वे इतने विरक्त तपस्वी थे कि खेतों से फसल कटने के बाद ज़मीन पर गिरे हुए अन्न के दानों (कणों) को चुनकर अपना जीवन निर्वाह करते थे।
- परमाणु (कण) का अन्वेषक: उन्होंने सृष्टि के सबसे सूक्ष्म कण (परमाणु) के रहस्य को समझा, इसलिए विद्वानों ने उन्हें 'कणाद' (परमाणु पर विचार करने वाला) कहा।
2. परमाणु सिद्धांत: आधुनिक विज्ञान से हज़ारों वर्ष पूर्व
महर्षि कणाद ने बताया कि यदि हम किसी पदार्थ को विभाजित करते जाएँ, तो अंत में एक ऐसी अवस्था आएगी जिसे और तोड़ा नहीं जा सकता। उसे उन्होंने 'परमाणु' (Atom) कहा।
उनके सिद्धांत के मुख्य बिंदु:
- अविनाशी: परमाणु नित्य है, इसे न बनाया जा सकता है, न नष्ट किया जा सकता है।
- अदृश्य: यह इतना सूक्ष्म है कि आँखों से नहीं देखा जा सकता।
- द्व्यणुक और त्रसरेणु: दो परमाणु मिलकर 'द्व्यणुक' (Diatomic Molecule) बनाते हैं। तीन द्व्यणुक मिलकर 'त्रसरेणु' बनाते हैं, जो दृश्य जगत का आधार है।
3. भौतिक विज्ञान: गति और गुरुत्वाकर्षण के नियम
महर्षि कणाद के 'वैशेषिक सूत्र' में भौतिकी (Physics) के कई नियम छिपे हैं, जो न्यूटन से बहुत पहले लिखे गए थे।
- गुरुत्वाकर्षण (Gravity): उन्होंने बताया कि यदि किसी वस्तु को ऊपर फेंका जाए, तो वह 'गुरुत्व' (भारीपन) के कारण पुनः पृथ्वी पर गिरती है।
- गति के नियम (Laws of Motion): उन्होंने 'कर्म' (Action/Motion) के पांच प्रकार बताए—उत्क्षेपण (ऊपर फेंकना), अवक्षेपण (नीचे फेंकना), आकुंचन (सिकुड़ना), प्रसारण (फैलना) और गमन (चलना)।
- वेग (Velocity): उन्होंने वेग को 'संस्कार' के अंतर्गत रखा और बताया कि बल (Force) लगाने पर ही गति उत्पन्न होती है।
4. निष्कर्ष
महर्षि कणाद का दर्शन केवल अध्यात्म नहीं, बल्कि विशुद्ध विज्ञान है। उन्होंने पदार्थ (Matter) को धर्म और मोक्ष से जोड़कर देखा। उनका मानना था कि सृष्टि के रहस्यों को जानकर ही ईश्वर को समझा जा सकता है। आज जब हम आधुनिक विज्ञान की प्रगति देखते हैं, तो हमें महर्षि कणाद की उस सूक्ष्म दृष्टि को नमन करना चाहिए जिसने बिना किसी प्रयोगशाला के, केवल ध्यान और तर्क के बल पर ब्रह्मांड के मूल कण को खोज निकाला था।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- वैशेषिक सूत्र (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)।
- भारतीय दर्शन का इतिहास - एस.एन. दासगुप्ता।
- Vaisheshika Philosophy - Encyclopedia of Indian Philosophies.
- न्याय-वैशेषिक - विभिन्न संस्कृत टीकाएँ।

