विदुषी लोपामुद्रा: ऋग्वेद की ऋषिका और गृहस्थ धर्म की महान दार्शनिक
एक विस्तृत शोधपरक और सांस्कृतिक आलेख (Vedic Rishika, Philosopher & Architect of Hadi Vidya)
भारतीय सनातन परम्परा में लोपामुद्रा (Lopamudra) उस गौरवमयी युग की प्रतीक हैं जब स्त्रियाँ केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान की व्याख्याता भी थीं। वे विदर्भ राज की पुत्री और महान महर्षि अगस्त्य की पत्नी थीं। लोपामुद्रा का व्यक्तित्व ज्ञान, रूप और तपस्या का अनूठा संगम है। उन्होंने ऋग्वेद की ऋचाओं का साक्षात्कार किया और यह सिद्ध किया कि गृहस्थ जीवन आध्यात्मिक उन्नति में बाधक नहीं, बल्कि सहायक हो सकता है।
| पिता | विदर्भ नरेश (राजा निमि या विदर्भराज) |
| पति | महर्षि अगस्त्य (सप्तर्षियों में से एक) |
| पुत्र | इध्मवाह (दृढ़च्युत) |
| सम्बन्धित वेद | ऋग्वेद (प्रथम मण्डल, सूक्त 179) |
| आध्यात्मिक पद | ब्रह्मवादिनी ऋषिका |
| विशेष योगदान | श्रीविद्या की 'हादि विद्या' (Hadi Vidya) शाखा |
1. ऋग्वेद में योगदान: सूक्तों की दृष्टा
ऋग्वेद में लगभग 27 ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है जिन्होंने मन्त्रों का साक्षात्कार किया। लोपामुद्रा इनमें अग्रणी हैं। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल (सूक्त 179) में लोपामुद्रा और अगस्त्य के बीच का संवाद संकलित है। यह सूक्त 'काम' (Desire) और 'तप' (Penance) के बीच संतुलन स्थापित करने की वैज्ञानिक विधि बताता है।
लोपामुद्रा ने तर्क दिया कि केवल वैराग्य ही सत्य नहीं है, बल्कि धर्मसम्मत गृहस्थ जीवन भी मोक्ष का मार्ग है। उनके मन्त्रों में उच्च कोटि की मनोवैज्ञानिक समझ और दार्शनिक स्पष्टता झलकती है।
2. अगस्त्य और लोपामुद्रा: तप और गृहस्थ का समन्वय
लोपामुद्रा का विवाह महर्षि अगस्त्य से होना एक अनूठी कथा है। राजा की पुत्री होने के बावजूद उन्होंने राजसी सुखों का त्याग कर अगस्त्य मुनि के साथ वन में रहना स्वीकार किया।
- तपस्या की सहभागिनी: उन्होंने अगस्त्य मुनि के साथ मिलकर अनेक वर्षों तक तप किया।
- वंश की रक्षा: उन्होंने अपने पति को गृहस्थ धर्म के प्रति जाग्रत किया ताकि पितृ-ऋण से मुक्ति मिल सके और सृष्टि का चक्र चलता रहे।
- संतान: उनका पुत्र 'इध्मवाह' हुआ, जो बड़ा होकर स्वयं एक महान ऋषि और वेदों का ज्ञाता बना।
3. श्रीविद्या साधना: 'हादि विद्या' की प्रवर्तिका
तन्त्र शास्त्र और ललिता सहस्रनाम की परम्परा में लोपामुद्रा का स्थान सर्वोच्च आचार्यों में है। श्रीविद्या (Srividya) की साधना की दो मुख्य धाराएँ हैं— कादि विद्या (Kadi Vidya) और हादि विद्या (Hadi Vidya)।
- हादि विद्या: श्रीविद्या का वह गुप्त मन्त्र जो 'ह' अक्षर से प्रारम्भ होता है, उसे 'लोपामुद्रा मन्त्र' या 'हादि विद्या' कहा जाता है।
- उपासना: वे देवी ललिता त्रिपुरा सुन्दरी की अनन्य उपासिका थीं। आज भी दक्षिण भारत की मन्त्र साधना में लोपामुद्रा को 'श्रीविद्या' की प्रमुख गुरु माना जाता है।
4. निष्कर्ष
विदुषी लोपामुद्रा का जीवन यह सिद्ध करता है कि ज्ञान किसी लिंग या सामाजिक स्थिति का मोहताज नहीं है। वे एक राजकुमारी, एक तपस्विनी, एक मन्त्रदृष्टा ऋषिका और एक आदर्श पत्नी के रूप में भारतीय नारीत्व का आदर्श प्रस्तुत करती हैं। उनका दर्शन मनुष्य को यह सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अनासक्त भाव से कर्तव्य पालन करना ही वास्तविक योग है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- ऋग्वेद संहिता (प्रथम मण्डल)।
- ललिता सहस्रनाम (भाष्य)।
- महाभारत (वन पर्व - अगस्त्य-लोपामुद्रा उपाख्यान)।
- सौन्दर्यलहरी और तन्त्र शास्त्र के प्राचीन ग्रन्थ।
