महर्षि उद्दालक आरुणि: 'तत् त्वम् असि' के उद्घोषक और उपनिषद काल के प्रथम वैज्ञानिक ऋषि
(The Sage of Chandogya & Brihadaranyaka Upanishad)
भारतीय दर्शन के इतिहास में महर्षि उद्दालक आरुणि (Maharishi Uddalaka Aruni) का स्थान एक ध्रुव तारे के समान है। वे उपनिषद काल (Upanishadic Era) के संभवतः सबसे प्रभावशाली विचारक थे। वे केवल एक ऋषि नहीं, बल्कि एक प्रयोगात्मक वैज्ञानिक थे जिन्होंने मिट्टी, लोहे और सोने के उदाहरणों से अद्वैत (Non-duality) को समझाया। वे महर्षि याज्ञवल्क्य के गुरु और बाद में उनके प्रतिद्वंद्वी भी रहे। उनके पिता का नाम 'अरुण' था, इसीलिए वे आरुणि कहलाए।
| पिता | महर्षि अरुण (गौतम गोत्र) |
| गुरु | महर्षि आयोधौम्य (Ayodhaumya) |
| प्रमुख शिष्य | याज्ञवल्क्य, श्वेतकेतु (पुत्र), कौीतकि |
| मुख्य ग्रंथ | छान्दोग्य उपनिषद, बृहदारण्यक उपनिषद |
| दार्शनिक महावाक्य | तत् त्वम् असि (That Thou Art) |
| निवास क्षेत्र | कुरु-पाञ्चाल (प्राचीन भारत का बौद्धिक केंद्र) |
1. गुरुभक्ति की मिसाल: 'आरुणि' नाम का रहस्य
महाभारत के आदिपर्व में उनकी गुरुभक्ति की प्रसिद्ध कथा है। जब वे बालक थे और गुरु आयोधौम्य के आश्रम में रहते थे, एक दिन मूसलाधार वर्षा हुई। गुरु जी ने उन्हें खेत की मेड़ (Embankment) टूटने से रोकने के लिए भेजा। जब मिट्टी से पानी नहीं रुका, तो बालक आरुणि स्वयं उस टूटी हुई मेड़ पर लेट गए और पूरी रात ठंडे पानी में पड़े रहे ताकि आश्रम के खेत न बहें।
प्रात:काल जब गुरु ने उन्हें उस अवस्था में देखा, तो वे द्रवित हो उठे। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि "तुम वेदों और धर्मशास्त्रों के महान ज्ञाता बनोगे।" मेड़ से निकलने (उदीर्ण होने) के कारण उनका नाम उद्दालक पड़ा।
2. श्वेतकेतु संवाद: 'तत् त्वम् असि' का महाविज्ञान
छान्दोग्य उपनिषद के छठे अध्याय में पिता उद्दालक और पुत्र श्वेतकेतु का संवाद विश्व साहित्य की अमूल्य निधि है। जब श्वेतकेतु 12 वर्ष बाद वेदों का अध्ययन कर अहंकारी होकर लौटा, तो पिता ने पूछा—"क्या तुमने उस 'एक' को जाना, जिसके जानने से सब कुछ जान लिया जाता है?" श्वेतकेतु के निरुत्तर होने पर उद्दालक ने प्रायोगिक विधियों से समझाया:
- मिट्टी और घड़ा: जैसे मिट्टी के एक ढेले को जानकर मिट्टी से बनी हर वस्तु (घड़ा, सुराही) का ज्ञान हो जाता है, वैसे ही 'सत' (ब्रह्म) को जानकर पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान हो जाता है।
- बरगद का बीज: उन्होंने पुत्र से बरगद का फल तुड़वाया और उसके सूक्ष्म बीज को तोड़ने को कहा। जब पुत्र ने कहा "इसमें कुछ नहीं दिखता", तो उद्दालक ने कहा—"इसी अदृश्य सूक्ष्मता (Nothingness) से यह विशाल वृक्ष खड़ा है।"
- नमक और पानी: उन्होंने पानी में नमक घुलवाया और कहा—"नमक दिखता नहीं, पर हर बूंद में है। वैसे ही ब्रह्म इस शरीर में व्याप्त है। तत् त्वम् असि (वह ब्रह्म तुम ही हो)।"
3. याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ: अंतर्यामी का प्रश्न
बृहदारण्यक उपनिषद में राजा जनक की सभा में एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ का वर्णन है। उद्दालक ने अपने ही पूर्व शिष्य महर्षि याज्ञवल्क्य को कड़ी चुनौती दी।
उद्दालक ने पूछा: "वह सूत्र (Thread) कौन सा है जिससे यह लोक, परलोक और सभी प्राणी बंधे हुए हैं? और वह 'अंतर्यामी' कौन है जो पृथ्वी, जल, अग्नि और मन के भीतर रहकर उनका नियंत्रण करता है, पर वे उसे नहीं जानते?"
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि वह 'वायु' सूत्र है और 'आत्मा' ही वह अंतर्यामी है जो अमृत स्वरूप है। इस उत्तर से संतुष्ट होकर उद्दालक ने सभा में याज्ञवल्क्य की विद्वत्ता का लोहा माना।
4. प्रथम वैज्ञानिक ऋषि: पदार्थवाद और प्रयोग
आधुनिक विद्वान (जैसे देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय) उद्दालक को 'विज्ञान और भौतिकवाद का आदि-पुरुष' मानते हैं। ग्रीक दार्शनिक थेल्स (Thales) से भी सदियों पहले उद्दालक ने कहा था कि सृष्टि की उत्पत्ति किसी जादू से नहीं, बल्कि पदार्थ के विकास से हुई है।
- त्रि-वृतकरण (Triplication): उन्होंने बताया कि भोजन, जल और तेज (अग्नि) हमारे शरीर में कैसे तीन भागों (स्थूल, मध्यम, सूक्ष्म) में बंटते हैं। अन्न से मन बनता है, जल से प्राण और तेज से वाणी। यह प्राचीन शरीर-विज्ञान (Physiology) का पहला सिद्धांत था।
5. निष्कर्ष
महर्षि उद्दालक आरुणि उन विरले ऋषियों में से थे जिन्होंने धर्म को अंधविश्वास से निकालकर 'अनुभव' और 'तर्क' की कसौटी पर रखा। उनका यह संदेश कि "तुम केवल शरीर नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना हो" (तत् त्वम् असि), आज भी वेदांत का सर्वोच्च शिखर है। वे सच्चे अर्थों में भारत के प्रथम दार्शनिक-वैज्ञानिक थे।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- छान्दोग्य उपनिषद (अध्याय 6 - श्वेतकेतु संवाद)।
- बृहदारण्यक उपनिषद (अध्याय 3 - जनक सभा)।
- महाभारत (आदिपर्व - पौष्य पर्व)।
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta.
