महर्षि सोमशर्मन (Maharishi Somasharman)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि सोमशर्मन: भगवान शिव के चतुर्थ अवतार और शैव दर्शन के आचार्य

महर्षि सोमशर्मन: शिव के चतुर्थ योगावतार और पाशुपत मत के आदि प्रवर्तक

(The 4th Incarnation of Lord Shiva & Shaiva Tradition)

"चतुर्थे द्वापरे प्राप्ते सोमो भूत्वा ह्यवातरत्।
प्रभासतीर्थमासाद्य योगात्मा योगमास्थितः॥"
अर्थ: चौथे द्वापर युग में भगवान शिव ने 'सोमशर्मन' के रूप में अवतार लिया और प्रभास तीर्थ में रहकर योग की स्थापना की। — (लिंग पुराण)

भारतीय शैव परंपरा में भगवान शिव के 28 योगावतारों का वर्णन मिलता है, जो प्रत्येक द्वापर युग में ज्ञान और योग की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं। इन्हीं में से चतुर्थ द्वापर युग के अवतार हैं—महर्षि सोमशर्मन (Maharishi Somasharman)। वे न केवल एक ऋषि थे, बल्कि साक्षात् महादेव के स्वरूप थे जिन्होंने लुप्त हो रहे 'पाशुपत योग' और 'शैव दर्शन' को पुनः स्थापित किया। प्रभास क्षेत्र (गुजरात का सोमनाथ क्षेत्र) उनकी मुख्य तपस्थली माना जाता है।

📌 महर्षि सोमशर्मन: एक दृष्टि में
अवतार क्रम भगवान शिव के 28 अवतारों में चतुर्थ (4th)
युग चतुर्थ द्वापर (4th Dvapara)
निवास/तीर्थ प्रभास तीर्थ (Prabhasa Tirtha), सोमनाथ
दर्शन शैव दर्शन, पाशुपत मत
प्रमुख शिष्य अक्षपाद, कणाद, उलूक और वत्स
ग्रंथ उल्लेख लिंग पुराण, शिव पुराण, वायु पुराण

1. पौराणिक कथा: प्रभास क्षेत्र में प्राकट्य

पुराणों के अनुसार, जब चौथे द्वापर युग में धर्म की हानि होने लगी और मनुष्य योग मार्ग से विमुख होने लगे, तब भगवान शिव ने अपनी योग माया से **सोमशर्मन** के रूप में अवतार ग्रहण किया। वे प्रभास तीर्थ (आधुनिक सोमनाथ, गुजरात) में प्रकट हुए। प्रभास क्षेत्र को 'चंद्रमा का क्षेत्र' (सोम) कहा जाता है, जहाँ उन्होंने अपनी तपस्या से इस स्थान को और भी पावन बना दिया। उनके तेज से प्रभावित होकर हज़ारों मुमुक्षु उनके पास ज्ञान प्राप्त करने आए।

2. दार्शनिक योगदान: पाशुपत योग का प्रसार

महर्षि सोमशर्मन का मुख्य उद्देश्य 'पाशुपत योग' का पुनरुद्धार करना था। उन्होंने सिखाया कि जीव (पशु) को माया के पाश (बंधन) से मुक्त होकर शिव (पशुपति) के साथ तादात्म्य स्थापित करना चाहिए।

  • योग मार्ग: उन्होंने यम, नियम और आसन के साथ-साथ 'शिव-तत्व' के ध्यान पर बल दिया।
  • भक्ति और ज्ञान: उनके अनुसार, बिना शिव की भक्ति के ज्ञान अधूरा है और बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नहीं है।
  • धर्म स्थापना: उन्होंने उस समय प्रचलित भ्रांतियों को दूर कर वेदों के अनुकूल शैव मत की स्थापना की।

3. सोमशर्मन के चार महान शिष्य

सोमशर्मन के शिष्य परंपरा में चार ऐसे नाम मिलते हैं, जिन्होंने भारतीय दर्शन को बदल कर रख दिया। यद्यपि ये नाम अन्य अवतारों के साथ भी जुड़ते हैं, किन्तु लिंग पुराण इन्हें सोमशर्मन के शिष्यों के रूप में प्रतिष्ठित करता है:

  1. अक्षपाद: जिन्होंने न्याय दर्शन की नींव रखी।
  2. कणाद: जिन्होंने परमाणु सिद्धांत (Atomic Theory) दिया।
  3. उलूक: जो वैशेषिक दर्शन के प्रचारक रहे।
  4. वत्स: जिन्होंने शास्त्र और योग की शिक्षा को आगे बढ़ाया।

इन शिष्यों के माध्यम से सोमशर्मन ने न केवल अध्यात्म बल्कि तर्क (Logic) और विज्ञान (Physics) को भी भारतीय मनीषा का अंग बनाया।

4. निष्कर्ष

महर्षि सोमशर्मन का अवतार हमें यह स्मरण कराता है कि सत्य शाश्वत है और समय-समय पर दिव्य विभूतियाँ आकर उसे प्रकाशित करती हैं। पाशुपत मत के आचार्यों में उनका नाम आदि गुरुओं की श्रेणी में आता है। आज भी सोमनाथ और प्रभास क्षेत्र की ऊर्जा में सोमशर्मन का तप विद्यमान माना जाता है। वे शिव और शक्ति के उस सामंजस्य के प्रतीक हैं जो साधक को संसार से पार ले जाता है।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • लिंग पुराण (पूर्व भाग - 24वाँ अध्याय)।
  • शिव पुराण (शतरुद्र संहिता - अवतार वर्णन)।
  • वायु पुराण (शैव अवतार प्रसंग)।
  • भारतीय दर्शन का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।

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