महर्षि उद्गीथ (Maharishi Udgitha)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि उद्गीथ: सामवेदीय गान के आचार्य और ऋग्वेद के भाष्यकार

महर्षि उद्गीथ: वैदिक गान की शक्ति और ऋग्वेद के मर्मज्ञ भाष्यकार

(Vedic Chanting & Scriptural Commentary)

"ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत।" अर्थ: इस ओंकार रूपी अक्षर को ही 'उद्गीथ' मानकर इसकी उपासना करनी चाहिए। — (छान्दोग्य उपनिषद 1.1.1)

वैदिक वाङ्मय में महर्षि उद्गीथ (Maharishi Udgitha) का नाम दो महत्वपूर्ण रूपों में उभरता है—प्रथम, ऋग्वेद के एक प्राचीन भाष्यकार के रूप में और द्वितीय, सामवेद की उस विशिष्ट गायन शैली के अधिष्ठाता के रूप में जिसे 'उद्गीथ' कहा जाता है। 'उद्गीथ' का अर्थ है 'ऊँचे स्वर में किया जाने वाला गान'। उपनिषदों में उद्गीथ को साक्षात् प्राण और ओंकार (ॐ) बताया गया है। महर्षि उद्गीथ ने ध्वनि के विज्ञान और मंत्रों के अर्थ को गहराई से प्रतिपादित किया।

📌 महर्षि उद्गीथ: एक दृष्टि में
प्रमुख भूमिका ऋग्वेद भाष्यकार (Commentator) एवं सामवेदीय आचार्य
सम्बन्धित वेद ऋग्वेद (भाष्य हेतु), सामवेद (गायन हेतु)
मुख्य ग्रंथ ऋग्वेद-भाष्य (10वें मंडल के कुछ सूक्तों पर उपलब्ध)
दार्शनिक आधार ओंकार उपासना (उद्गीथ विद्या)
समकालीनता सायण और स्कन्दस्वामी के पूर्ववर्ती भाष्यकारों की श्रेणी

1. ऋग्वेद भाष्यकार के रूप में महर्षि उद्गीथ

संस्कृत साहित्य के इतिहास में सायाणाचार्य से पूर्व भी कई ऋषियों ने वेदों पर भाष्य लिखे थे। महर्षि उद्गीथ उन्हीं प्राचीन भाष्यकारों में से एक हैं। उनके भाष्य का नाम 'उद्गीथ-भाष्य' है। यद्यपि आज यह भाष्य पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है, किन्तु ऋग्वेद के दसवें मंडल (10th Mandala) के कुछ सूक्तों पर उनके अर्थ और व्याख्याएँ आज भी विद्वानों के लिए अत्यंत प्रमाणिक मानी जाती हैं।

उद्गीथ ने मंत्रों के अर्थ को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके पीछे छिपे दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों को भी उजागर किया। सायणाचार्य ने भी अपने भाष्यों में कई स्थानों पर उद्गीथ के मतों का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया है।

2. उद्गीथ विद्या: छान्दोग्य उपनिषद का रहस्य

छान्दोग्य उपनिषद का प्रारंभ ही 'उद्गीथ विद्या' से होता है। यहाँ 'उद्गीथ' का अर्थ केवल संगीत नहीं, बल्कि वह ब्रह्म नाद (Sound of Universe) है जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है।

  • ओंकार और उद्गीथ: उपनिषद के अनुसार, ओंकार ही उद्गीथ है। जो ओंकार की उपासना करता है, वह सीधे परमात्मा से जुड़ जाता है।
  • प्राण और वाणी: उद्गीथ को 'प्राण' का स्वरूप माना गया है। जैसे शरीर में प्राण श्रेष्ठ है, वैसे ही वाणी में उद्गीथ (ओंकार) श्रेष्ठ है।
  • उद्गीथ का प्रभाव: महर्षि उद्गीथ ने सिखाया कि जब मंत्र को सही लय और ओंकार के साथ जोड़ा जाता है, तो वह साधक की सोई हुई ऊर्जा को जागृत कर देता है।

3. सामवेदीय गान में उद्गीथ का स्थान

यज्ञों के समय सामवेद के मंत्रों का गान पाँच भागों में किया जाता है। इनमें से द्वितीय और सबसे प्रमुख भाग 'उद्गीथ' कहलाता है।

  • प्रस्ताव: गान का प्रारंभ।
  • उद्गीथ: मुख्य गान, जिसे 'उद्गाता' (सामवेदी पुरोहित) ओंकार के साथ ऊँचे स्वर में गाता है।
  • प्रतिहार: गान का मध्य भाग।
  • उपद्रव और निधन: गान की समाप्ति और उपसंहार।

महर्षि उद्गीथ इसी मुख्य गायन पद्धति के मर्मज्ञ थे, इसलिए उनका नाम इस विद्या के साथ सदैव के लिए जुड़ गया।

4. निष्कर्ष

महर्षि उद्गीथ का व्यक्तित्व हमें 'नाद ब्रह्म' (Sound as God) की महत्ता सिखाता है। वे केवल शब्दों के अर्थ बताने वाले विद्वान नहीं थे, बल्कि वे ध्वनि की उस शक्ति के ज्ञाता थे जो मनुष्य के भीतर और बाहर शांति स्थापित कर सकती है। चाहे वह ऋग्वेद की व्याख्या हो या सामवेद का दिव्य गान, उद्गीथ ऋषि का योगदान सनातन धर्म की जड़ों को सिंचित करने वाला है।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • छान्दोग्य उपनिषद (प्रथम अध्याय - उद्गीथ प्रकरण)।
  • ऋग्वेद भाष्य - महर्षि उद्गीथ (खण्डित अंश)।
  • वैदिक साहित्य एवं संस्कृति - आचार्य बलदेव उपाध्याय।
  • Sama Veda Chanting Traditions.

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