॥ महर्षि वेदव्यास: जन्म का पौराणिक रहस्य ॥
वेदों के विभाजक और महाभारत के रचयिता के प्राकट्य की अद्भुत एवं अलौकिक गाथा
॥ १. राजा सुधन्वा और पक्षियों का युद्ध
प्राचीन काल की बात है, महाराज सुधन्वा नाम के एक प्रतापी राजा थे. एक बार वे आखेट (शिकार) के उद्देश्य से घने वन में गए. उनके जाने के पश्चात उनकी पत्नी रजस्वला हो गईं और उन्होंने यह संदेश एक शिकारी पक्षी के माध्यम से राजा तक भिजवाया.
राजा ने अपनी वंश परंपरा को ध्यान में रखते हुए अपना वीर्य एक पात्र (दोने) में निकाला और पक्षी को सौंप दिया ताकि वह उसे रानी तक पहुँचा सके. किंतु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। जब पक्षी आकाश मार्ग से जा रहा था, तब उसकी भेंट एक अन्य शिकारी पक्षी से हुई और दोनों के मध्य भीषण युद्ध छिड़ गया. इस संघर्ष के दौरान वह पात्र पक्षी के पंजों से छूटकर नीचे बहती हुई यमुना नदी के जल में जा गिरा.
॥ २. अद्रिका अप्सरा और मत्स्यगंधा का जन्म
यमुना के उसी शीतल जल में ब्रह्मा जी के शाप से मछली बनी एक अप्सरा (अद्रिका) निवास करती थी. उसने उस बहते हुए पात्र को निगल लिया और उसके प्रभाव से वह गर्भवती हो गई. जब एक निषाद (मछुआरे) ने उस विशाल मछली को अपने जाल में फँसाया और उसे चीरा, तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही.
मछली के पेट से एक तेजस्वी बालक और एक अत्यंत सुंदर कन्या निकली. राजा सुधन्वा ने बालक को अपना लिया, जिसका नाम 'मत्स्यराज' हुआ. किंतु कन्या के शरीर से मछली की गंध आने के कारण राजा ने उसे निषाद को ही सौंप दिया, जिसे 'मत्स्यगंधा' या 'सत्यवती' के नाम से पुकारा जाने लगा.
॥ ३. ऋषि पराशर का आगमन और दिव्य मिलन
सत्यवती बड़ी होकर यमुना में नाव खेने का कार्य करने लगी. एक दिन महान तेजस्वी ऋषि पराशर को नदी पार करनी थी. सत्यवती के सौंदर्य और पवित्रता को देखकर मुनि उस पर आसक्त हो गए और अपनी इच्छा प्रकट की. सत्यवती ने धर्म और समाज का भय दिखाते हुए कहा कि एक निषाद कन्या और एक महान ऋषि का मिलन कैसे संभव है?
मुनि के आशीर्वाद से सत्यवती के शरीर की दुर्गंध एक ऐसी सुगंध में बदल गई जो मीलों दूर तक अनुभव की जा सकती थी. इस दिव्य संयोग से एक महापुरुष का प्राकट्य होने वाला था।
॥ ४. वेदव्यास का प्राकट्य और उनकी प्रतिज्ञा
समय आने पर सत्यवती ने एक पुत्र को जन्म दिया जो जन्म लेते ही पूर्ण विकसित हो गया और वेदों के ज्ञान में पारंगत था. उस बालक ने अपनी माता को प्रणाम किया और वचन दिया कि जब भी वह किसी संकट में उन्हें स्मरण करेंगी, वे तत्काल उपस्थित हो जाएँगे.
इसके पश्चात वे घोर तपस्या के लिए यमुना के एक द्वीप (टापू) पर चले गए. द्वीप पर जन्म लेने और सांवले रंग के कारण उनका नाम 'कृष्ण द्वैपायन' पड़ा. आगे चलकर उन्होंने वेदों का विस्तार किया और उन्हें चार संहिताओं में विभाजित किया, जिससे वे जगत में 'वेदव्यास' के नाम से विख्यात हुए.
| नाम | कारण |
|---|---|
| कृष्ण | उनके शरीर का रंग काला (सांवला) होने के कारण. |
| द्वैपायन | उनका जन्म और तपस्या यमुना के एक द्वीप पर होने के कारण. |
| वेदव्यास | वेदों का भाष्य और उनका चार भागों में विभाजन करने के कारण. |

