॥ माँ गंगा अवतरण का विस्तृत वृतांत ॥
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड से उद्धृत ऋषि विश्वामित्र द्वारा श्री राम को सुनाई गई दिव्य कथा
१. पर्वतराज की दो लावण्यमयी कन्याएँ
सिद्धश्रम की ओर बढ़ते हुए ऋषि विश्वामित्र ने श्री राम और लक्ष्मण को वह कथा सुनाई जो इक्ष्वाकु वंश के गौरव से जुड़ी थी। हिमालय और मेरु पर्वत की पुत्री मैना की दो कन्याएँ थीं। बड़ी पुत्री गंगा, जो साक्षात् शक्ति का स्वरूप थीं, और दूसरी पुत्री उमा, जो अत्यंत तपस्विनी थीं।
गंगा का वेग और उनकी कांति इतनी असाधारण थी कि देवताओं ने विश्व-कल्याण के निमित्त उन्हें पर्वतराज से माँग लिया। गंगा ने स्वर्ग में रहकर देवताओं को पावन किया, जबकि उमा ने कठोर साधना से देवाधिदेव महादेव को प्राप्त किया। राम के मन में जिज्ञासा उठी कि यदि गंगा स्वर्ग में थीं, तो वे 'त्रिपथगा' (तीनों लोकों में बहने वाली) कैसे बनीं? तब ऋषि ने महाराज सगर का वृतांत आरम्भ किया।
२. महाराज सगर और साठ हजार पुत्रों का अहंकार
अयोध्या के न्यायप्रिय राजा सगर की दो रानियाँ थीं। महर्षि भृगु के आशीर्वाद से रानी केशिनी को एक पुत्र 'असमंजस' प्राप्त हुआ, जबकि रानी सुमति को ६०,००० बलशाली पुत्रों का वरदान मिला। असमंजस स्वभाव से दुष्ट था और नगर के बालकों को सरयू में डुबा देता था, जिसके कारण सगर ने उसे निर्वासित कर दिया। असमंजस का पुत्र "अंशुमान" अत्यंत गुणी और आज्ञाकारी था।
पृथ्वी को खोदते हुए वे पाताल तक जा पहुँचे, जहाँ उन्होंने परम तेजस्वी कपिल मुनि के समीप घोड़े को बँधा देखा। मुनि को चोर समझकर उन्होंने उन पर प्रहार करना चाहा, तब कपिल मुनि ने केवल एक हुंकार भरी और उनकी क्रोधाग्नि ने उन साठ हजार राजकुमारों को क्षण भर में भस्म कर दिया।
३. पीढ़ियों का संकल्प और भगीरथ का उदय
अपने चाचाओं की खोज में निकले अंशुमान ने पाताल में गरुड़ जी से भेंट की। गरुड़ जी ने स्पष्ट किया कि इन भस्म अवशेषों को केवल हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा के पवित्र जल से ही मुक्ति मिल सकती है। अंशुमान ने जीवन भर प्रयास किया, फिर उनके पुत्र दिलीप ने भी गंगा को लाने के लिए तपस्या की, किंतु सफलता कोसों दूर थी।
अंततः दिलीप के पुत्र "भगीरथ" ने अपनी प्रजा और पूर्वजों के प्रति कर्तव्य को सर्वोपरि माना। वे निसंतान थे और अपने वंश के उद्धार के लिए गोकर्ण तीर्थ में एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर १००० वर्षों तक ब्रह्मा जी की आराधना की।
४. ब्रह्मा का वरदान और शिव का जटाजूट
ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने गंगा के अवतरण का वरदान दिया, किंतु एक चेतावनी दी—"गंगा का वेग स्वर्ग से गिरते समय पृथ्वी को रसातल में ले जाएगा, इसे केवल महादेव ही संभाल सकते हैं।" भगीरथ ने हार नहीं मानी और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर वायु-भक्षण तप आरम्भ किया।
महादेव प्रसन्न हुए। जब गंगा ने अहंकार के साथ स्वर्ग से पृथ्वी की ओर छलांग लगाई, तो उनका विचार शिव को भी अपने साथ बहा ले जाने का था। किंतु सर्वेश्वर शिव ने अपने अनंत जटाजूट को फैला दिया। गंगा का प्रचंड वेग उन जटाओं में इस तरह उलझ गया कि उन्हें बाहर निकलने का मार्ग ही नहीं मिला। भगीरथ ने पुनः शिव की स्तुति की, तब महादेव ने प्रसन्न होकर गंगा को बिन्दुसर सरोवर में मुक्त किया।
५. गंगा की सात धाराएँ और जाह्नवी नाम का रहस्य
बिन्दुसर से मुक्त होकर गंगा की सात धाराएँ फूट पड़ीं। यह दृश्य इतना दिव्य था कि आकाश देवताओं, गंधर्वों और अप्सराओं से भर गया।
| दिशायें | धाराओं के नाम |
|---|---|
| पूर्व की ओर | ह्लादिनी, पावनी, नलिनी |
| पश्चिम की ओर | सुचक्षु, सीता, सिन्धु |
| भगीरथ के पीछे | भागीरथी (सातवीं धारा) |
भगीरथ के रथ के पीछे चलते हुए गंगा ने ऋषि जह्नु की यज्ञशाला को जलमग्न कर दिया। क्रुद्ध ऋषि ने पूरी गंगा का आचमन कर लिया। देवताओं के अनुनय-विनय पर ऋषि ने गंगा को अपने कान से बाहर निकाला, जिससे वे 'जाह्नवी' कहलाईं।
६. पूर्वजों का उद्धार और त्रिपथगा की पूर्णता
अंततः गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे समुद्र तक पहुँचीं और वहाँ से पाताल (रसातल) में प्रवेश किया। जैसे ही गंगा के शीतल और पावन जल ने सगर के पुत्रों के भस्म अवशेषों का स्पर्श किया, वे साठ हजार आत्माएँ तत्काल पापमुक्त होकर दिव्य विमानों में बैठकर स्वर्ग लोक को प्रस्थान कर गईं।
गंगा अब 'त्रिपथगा' कहलाईं, क्योंकि वे "आकाश" (स्वर्ग), "भूमि" (मृत्युलोक) और "रसातल" (पाताल)—तीनों मार्गों से प्रवाहित होकर सृष्टि का कल्याण करती हैं। ब्रह्मा जी ने भगीरथ को आशीर्वाद दिया कि जब तक पृथ्वी पर पर्वत और समुद्र रहेंगे, तब तक भगीरथ और गंगा का यश अमर रहेगा।
॥ हर हर गंगे ॥
प्रस्तुति: bhagwatdarshan.com

