महर्षि विभांडक (Maharishi Vibhandaka)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि विभांडक: कठोर तपस्वी और ऋष्यशृंग के पिता

महर्षि विभांडक: महान तपस्वी और ऋष्यशृंग के विलक्षण पिता

(The Austere Sage of Kashyapa Lineage)

"विभाण्डकसुतः श्रीमानृष्यशृङ्गः प्रतापवान्।" अर्थ: महर्षि विभांडक के पुत्र श्रीमान और प्रतापी ऋष्यशृंग हैं। — (वाल्मीकि रामायण)

भारतीय ऋषि परंपरा में महर्षि विभांडक (Maharishi Vibhandaka) एक ऐसे ऋषि के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिनका तपोबल देवताओं को भी विस्मित कर देता था। वे महर्षि कश्यप के वंशज थे। विभांडक ऋषि का नाम मुख्य रूप से उनके पुत्र ऋष्यशृंग के साथ जुड़ा हुआ है, जिन्होंने अयोध्या के राजा दशरथ के लिए वह यज्ञ संपन्न किया था जिससे भगवान राम का प्राकट्य हुआ। विभांडक मुनि अपने क्रोध और अपनी वैराग्यमयी जीवनशैली के लिए जाने जाते थे।

📌 महर्षि विभांडक: एक दृष्टि में
कुल / वंश कश्यप वंश (Kashyapa Lineage)
पिता महर्षि कश्यप
पुत्र महर्षि ऋष्यशृंग (Rishyasringa)
प्रमुख स्थान भिंड (मध्य प्रदेश), श्रृंगेरी (कर्नाटक)
विशेषता कठोर तप और ब्रह्मचर्य के रक्षक
सम्बन्धित नदी तुंगभद्रा (Tungabhadra)
⏳ काल निर्धारण एवं वंशावली
युग
त्रेता युग (Treta Yuga)भगवान राम के जन्म से पूर्व की घटनाओं के साक्षी।
वंशावली संरचना
कश्यप → विभांडक → ऋष्यशृंगयह वंश रेखा भारतीय मेधा और तपस्या की निरंतरता को दर्शाती है।

1. ऋष्यशृंग का जन्म: एक अलौकिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि विभांडक एक सरोवर के तट पर घोर तपस्या कर रहे थे। उसी समय वहां उर्वशी (कुछ ग्रंथों के अनुसार एक मृगी) का आगमन हुआ। विभांडक ऋषि के तेज से एक बालक का जन्म हुआ, जिसके माथे पर एक सींग (शृंग) था। इसी कारण बालक का नाम 'ऋष्यशृंग' पड़ा। विभांडक ने उस बालक को अपनी गोद में ले लिया और संसार की समस्त बुराइयों से दूर रखने का संकल्प किया।

2. अनूठा लालन-पालन: संसार से दूर एक आश्रम

महर्षि विभांडक ने अपने पुत्र को वन के एकांत में पाल-पोसकर बड़ा किया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनके पुत्र को यह भी पता न चले कि 'स्त्री' नाम का कोई जीव इस संसार में होता है। ऋष्यशृंग ने केवल अपने पिता और वन के पशु-पक्षियों को ही देखा था। यह उनके पिता के संकल्प की पराकाष्ठा थी कि उनका पुत्र पूर्णतः निष्पाप और दिव्य तपोबल से युक्त रहे।

3. रामायण प्रसंग: पुत्रकामेष्टि यज्ञ और विभांडक

जब अंग देश के राजा रोमपाद के राज्य में भयंकर अकाल पड़ा, तब ऋषियों ने बताया कि यदि ऋष्यशृंग वहां कदम रखेंगे तो वर्षा होगी। बाद में, राजा दशरथ ने अपनी संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ (Putrakameshti Yajna) करने का निर्णय लिया। इस यज्ञ के लिए विभांडक के पुत्र ऋष्यशृंग को ही मुख्य पुरोहित के रूप में बुलाया गया। प्रारंभ में विभांडक ऋषि क्रोधित हुए, लेकिन अंततः उन्होंने इसे नियति मानकर स्वीकार किया।

4. भौगोलिक पहचान: भिंड और तुंगभद्रा का संगम

महर्षि विभांडक के नाम पर ही मध्य प्रदेश के 'भिंड' जिले का नाम पड़ा है। मान्यता है कि वहां उनका प्राचीन आश्रम था। वहीं, दक्षिण भारत के कर्नाटक में स्थित शृंगेरी (Sringeri) का नाम भी उनके पुत्र ऋष्यशृंग के नाम पर है, जहाँ तुंगभद्रा नदी के तट पर विभांडक ऋषि का ऐतिहासिक मंदिर और तपस्थली स्थित है।

5. निष्कर्ष

महर्षि विभांडक का जीवन हमें एकाग्रता और संरक्षण की शक्ति सिखाता है। वे एक ऐसे पिता थे जिन्होंने अपने पुत्र के भीतर वह आध्यात्मिक ऊर्जा संचित की, जिसने अंततः अयोध्या के राजवंश को श्रीराम जैसा पुत्र प्रदान किया। उनका कठोर व्यक्तित्व और गहन साधना आज भी साधकों के लिए प्रेरणा का केंद्र है। वे सिद्ध करते हैं कि पिता का तप पुत्र के यश का आधार बनता है।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • वाल्मीकि रामायण (बालकांड - अध्याय 9-10)।
  • श्रीमद्भागवत पुराण (नवम स्कन्ध)।
  • महाभारत (वन पर्व - ऋष्यशृंग उपाख्यान)।
  • स्थानीय पुराण और क्षेत्रीय इतिहास (भिंड एवं शृंगेरी)।

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