गुरु द्रोणाचार्य (Guru Dronacharya)

Sooraj Krishna Shastri
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गुरु द्रोणाचार्य: कौरव-पांडवों के महान आचार्य और धनुर्वेद के स्वामी

गुरु द्रोणाचार्य: शस्त्र विद्या के महानतम आचार्य और हस्तिनापुर के मार्गदर्शक

(The Supreme Master of Archery & Divine Weapons)

"द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्।" अर्थ: द्रोणाचार्य, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य पराक्रमी योद्धाओं का समूह। — (भगवद गीता)

महाभारत की कथा में गुरु द्रोणाचार्य (Guru Dronacharya) एक ऐसा चरित्र हैं, जो ज्ञान, पराक्रम और कर्तव्य के बीच झूलते जीवन का प्रतीक हैं। वे सप्तर्षियों में से एक महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। उन्हें 'द्रोण' इसलिए कहा गया क्योंकि उनका जन्म एक 'द्रोणी' (यज्ञ कलश या पात्र) से हुआ था। द्रोणाचार्य केवल एक ब्राह्मण नहीं थे, बल्कि उन्होंने भगवान परशुराम से संपूर्ण धनुर्वेद प्राप्त कर उसे हस्तिनापुर के राजकुमारों को हस्तांतरित किया। वे आज भी दुनिया के श्रेष्ठ गुरुओं के लिए एक मानक (Standard) माने जाते हैं।

📌 गुरु द्रोणाचार्य: एक दृष्टि में
पिता महर्षि भरद्वाज (सप्तर्षियों में से एक)
पत्नी कृपी (कृपाचार्य की बहन)
पुत्र अश्वत्थामा (चिरंजीवी)
गुरु महर्षि अग्नि वेश और भगवान परशुराम
प्रमुख शिष्य अर्जुन, दुर्योधन, अश्वत्थामा, युधिष्ठिर
सेनापति काल भीष्म पितामह के बाद 5 दिनों तक
⏳ काल निर्धारण एवं स्थिति
युग
द्वापर युग (Dvapara Yuga)महाभारत युद्ध और कुरुवंश के उत्थान-पतन के काल।
वंशावली
अंगिरा कुल → भरद्वाज → द्रोणयह ब्राह्मणों का प्रखर योद्धा कुल था।

1. शिक्षा और परशुराम से मिलन

द्रोणाचार्य ने अपने पिता के आश्रम में ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन किया। किन्तु उनकी रुचि अस्त्र-शस्त्र में अधिक थी। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि भगवान परशुराम अपना समस्त धन और ज्ञान दान कर रहे हैं, तो वे उनके पास पहुँचे। परशुराम ने अपना सारा धन ब्राह्मणों को बाँट दिया था, किन्तु उनके पास अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान शेष था। द्रोण ने उसी ज्ञान की याचना की और इस प्रकार वे ब्रह्मांड के सबसे विनाशकारी अस्त्रों (ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि) के ज्ञाता बन गए।

2. गुरु-शिष्य परंपरा: अर्जुन और कौरव-पांडव

द्रुपद के अपमान का बदला लेने और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए द्रोणाचार्य हस्तिनापुर आए। भीष्म पितामह ने उन्हें कौरवों और पांडवों का गुरु नियुक्त किया।

  • अर्जुन की एकाग्रता: द्रोणाचार्य ने चिड़िया की आँख वाला परीक्षण लिया, जिसमें केवल अर्जुन ही सफल हुए।
  • अश्वत्थामा का प्रेम: पिता होने के नाते वे अश्वत्थामा को भी श्रेष्ठ बनाना चाहते थे, लेकिन योग्यता के आधार पर अर्जुन उनके प्रिय शिष्य बने।
  • धनुर्वेद का प्रसार: उन्होंने हस्तिनापुर के राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्र में इतना निपुण बनाया कि वे विश्व के अपराजेय योद्धा कहलाए।

3. एकलव्य प्रसंग: गुरुभक्ति और मर्यादा

एकलव्य की कथा द्रोणाचार्य के जीवन का सबसे विवादास्पद और भावुक प्रसंग है। द्रोण ने राजकीय मर्यादा के कारण एकलव्य को शिष्य नहीं बनाया, किन्तु एकलव्य ने उनकी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर स्वयं अभ्यास किया।

जब द्रोण ने एकलव्य की निपुणता देखी, तो उन्हें अर्जुन को दिए गए वचन (कि कोई उससे श्रेष्ठ नहीं होगा) की रक्षा करनी पड़ी। गुरु दक्षिणा में एकलव्य का दाहिने हाथ का अंगूठा मांगना आज भी त्याग और गुरुभक्ति की पराकाष्ठा मानी जाती है, यद्यपि यह द्रोणाचार्य की कठोरता को भी दर्शाता है।

4. महाभारत युद्ध: सेनापति द्रोण और चक्रव्यूह

भीष्म पितामह के शरशय्या पर जाने के बाद, युद्ध के 11वें दिन द्रोणाचार्य कौरव सेना के सेनापति बने। उन्होंने अपनी युद्ध कला से पांडव सेना में हाहाकार मचा दिया।

  • चक्रव्यूह रचना: युद्ध के 13वें दिन द्रोणाचार्य ने 'चक्रव्यूह' की रचना की, जिसमें अभिमन्यु का वध हुआ। यह व्यूह इतना जटिल था कि अर्जुन के बिना उसे कोई भेद नहीं सकता था।
  • वीरगति: 15वें दिन, कृष्ण की कूटनीति के कारण 'अश्वत्थामा हतः' (अश्वत्थामा मारा गया) का अर्द्धसत्य सुनकर द्रोणाचार्य ने अस्त्र त्याग दिए। इसी स्थिति में धृष्टद्युम्न ने उनका वध किया।

5. निष्कर्ष

गुरु द्रोणाचार्य का चरित्र हमें सिखाता है कि महान ज्ञान के साथ महान जिम्मेदारियाँ भी आती हैं। वे अधर्म की ओर से लड़े, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा और नमक के हक के कारण। उनके नाम पर आज भी भारत सरकार खेल प्रशिक्षकों को 'द्रोणाचार्य पुरस्कार' प्रदान करती है। वे भारतीय युद्ध विद्या और शिक्षा पद्धति के अमर गौरव हैं।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • महाभारत (आदि पर्व और द्रोण पर्व)।
  • श्रीमद्भगवद्गीता (प्रथम अध्याय)।
  • धनुर्वेद संहिता।
  • पुराणों की वंशावली - महर्षि भरद्वाज के वंशज।

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