महर्षि जैमिनि: पूर्व मीमांसा के प्रवर्तक, धर्म के व्याख्याता और वेदों के परम संरक्षक
एक विस्तृत दार्शनिक और ऐतिहासिक मीमांसा: जिन्होंने 'कर्म' (Action) को सर्वोच्च सत्ता मानकर वैदिक यज्ञों को पुनर्जीवित किया (The Architect of Vedic Ritualism)
- 1. प्रस्तावना: मीमांसा का अर्थ और महत्व
- 2. जीवन परिचय: वेद व्यास के शिष्य और सामवेद के आचार्य
- 3. मीमांसा सूत्र: 12 अध्यायों का विशाल प्रासाद
- 4. धर्म क्या है? (What is Dharma?)
- 5. वेद अपौरुषेय हैं: शब्द की नित्यता का सिद्धांत
- 6. 'अपूर्व' का सिद्धांत: कर्म और फल का अदृश्य सेतु
- 7. जैमिनि और बादरायण (वेदांत): कर्म बनाम ज्ञान
- 8. निष्कर्ष: भारतीय विधि (Law) और संस्कृति पर प्रभाव
भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) में मीमांसा (Mimamsa) का स्थान आधारभूत है। 'मीमांसा' शब्द का अर्थ है—"किसी विषय का पूज्य विचार" या "गहन अन्वेषण" (Profound Inquiry)। जब वेदों के कर्मकांड भाग (यज्ञ, विधि-निषेध) पर प्रश्न उठने लगे, तब उनकी तर्कपूर्ण रक्षा और व्याख्या करने के लिए एक महान ऋषि का उदय हुआ—वे थे महर्षि जैमिनि (Maharshi Jaimini)।
जैमिनि का दर्शन 'पूर्व मीमांसा' कहलाता है (क्योंकि यह वेदों के पूर्व भाग अर्थात कर्मकांड से संबंधित है), जबकि बादरायण का दर्शन 'उत्तर मीमांसा' (वेदांत) कहलाता है। जैमिनि ने दुनिया को बताया कि 'धर्म' कोई विश्वास नहीं, बल्कि एक निश्चित 'क्रिया' (Action/Karma) है। उन्होंने वेदों के अर्थ निकालने के ऐसे वैज्ञानिक नियम (Rules of Interpretation) बनाए जो आज भी भारतीय और पाश्चात्य कानून (Law) की व्याख्या में उपयोग किए जाते हैं।
| पूरा नाम | महर्षि जैमिनि (Maharshi Jaimini) |
| गुरु | महर्षि वेद व्यास (Krishna Dwaipayana Vyasa) |
| वेद दायित्व | सामवेद के प्रचारक (Propagator of Samaveda) |
| प्रमुख ग्रंथ | मीमांसा सूत्र (Jaiminiya Sutras), जैमिनि भारत (महाभारत का एक संस्करण), संकर्षण काण्ड |
| दर्शन | पूर्व मीमांसा (Ritualistic Realism) |
| मुख्य सिद्धांत | वेद अपौरुषेय हैं (Vedas are eternal), कर्म प्रधान है, अपूर्व (Apurva) |
| काल | महाभारत कालीन (लगभग 3000 ई.पू. - परंपरानुसार), 200 ई.पू. (आधुनिक मतानुसार) |
| पुत्र/शिष्य | सुमन्तु (पुत्र/शिष्य) |
2. जीवन परिचय: वेद व्यास के शिष्य और सामवेद के आचार्य
महर्षि जैमिनि का जीवन गुरु-भक्ति और विद्या के प्रसार का उदाहरण है। पुराणों के अनुसार, वे भगवान वेद व्यास के प्रधान शिष्यों में से एक थे।
- वेदों का विभाजन: जब वेद व्यास ने वेदों को चार भागों में बांटा, तो उन्होंने सामवेद की जिम्मेदारी जैमिनि को सौंपी। जैमिनि ने सामवेद की परंपरा को आगे बढ़ाया, जिसमें 'तलवकार' और 'जैमिनीय' शाखाएं प्रमुख हैं।
- जैमिनि भारत: यह कम ही लोग जानते हैं कि जैमिनि ने भी एक 'महाभारत' लिखा था, जिसे 'जैमिनि भारत' कहते हैं। इसमें विशेष रूप से 'अश्वमेध पर्व' का वर्णन बहुत विस्तार और भक्ति भाव से किया गया है।
- बादरायण से संबंध: ब्रह्मसूत्र के रचयिता बादरायण (व्यास) और जैमिनि समकालीन थे। ब्रह्मसूत्र में जैमिनि का नाम आदर के साथ कई बार आता है, और मीमांसा सूत्र में बादरायण का। यह दर्शाता है कि उनमें मतभेद होते हुए भी गहरा प्रेम था।
3. मीमांसा सूत्र: 12 अध्यायों का विशाल प्रासाद
जैमिनि का सबसे महान योगदान 'मीमांसा सूत्र' है। यह ग्रंथ आकार में बहुत विशाल है। इसमें **12 अध्याय** और लगभग **2700 सूत्र** हैं (जो अन्य दर्शनों के सूत्रों से कहीं अधिक हैं)।
इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य वेदों के उन वाक्यों में समन्वय स्थापित करना है जो आपस में विरोधी लगते हैं। इसे **'वाक्य-शास्त्र'** भी कहा जाता है।
- अध्याय 1: प्रमाण लक्षण (धर्म क्या है? वेद प्रमाण क्यों हैं?)।
- अध्याय 2: कर्म भेद (यज्ञों के प्रकार)।
- अध्याय 3: शेष-शेषी भाव (कौन सा अंग किसके लिए है)।
- अध्याय 4-12: यज्ञों के अतिदेश (Transfer of rules), ऊह (Modification), और तंत्र (Common actions) जैसे अत्यंत तकनीकी विषय।
4. धर्म क्या है? (What is Dharma?)
मीमांसा सूत्र का पहला ही सूत्र एक उद्घोषणा है:
"अथातो धर्मजिज्ञासा" (अब, अतः धर्म की जिज्ञासा की जाती है)।
जैमिनि के लिए 'धर्म' का अर्थ पूजा-पाठ या नैतिकता मात्र नहीं है। वे धर्म को परिभाषित करते हैं:
सरल शब्दों में: "वेद जो करने को कहे, वह धर्म है; और जो न करने को कहे, वह अधर्म है।"
उदाहरण के लिए, "स्वर्गकामो यजेत" (स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे)। यहाँ यज्ञ करना 'धर्म' है क्योंकि यह वेद का आदेश है। जैमिनि कहते हैं कि मनुष्य की बुद्धि सीमित है, वह नहीं जान सकती कि मृत्यु के बाद क्या होगा। इसलिए, केवल वेद ही अलौकिक विषयों में प्रमाण हैं।
5. वेद अपौरुषेय हैं: शब्द की नित्यता का सिद्धांत
जैमिनि का सबसे क्रांतिकारी और विवादास्पद सिद्धांत यह है कि **वेद अपौरुषेय (Authorless) हैं।**
- न तो मनुष्य ने लिखे, न ईश्वर ने: न्याय दर्शन मानता है कि वेद ईश्वर ने बनाए हैं। लेकिन जैमिनि कहते हैं, "यदि वेद ईश्वर ने बनाए, तो ईश्वर को किसने बनाया?" अनवस्था दोष से बचने के लिए, वे मानते हैं कि वेद **अनादि** और **नित्य** हैं।
- शब्द-नित्यवाद: शब्द (Sound) कभी नष्ट नहीं होता। जब हम 'ग' बोलते हैं, तो हम उसे उत्पन्न नहीं करते, बल्कि आकाश में पहले से मौजूद ध्वनि को व्यक्त (Manifest) करते हैं। वेद इसी नित्य शब्द-राशि का समूह हैं।
- ऋषि केवल द्रष्टा हैं: ऋषियों ने मंत्र बनाए नहीं, उन्होंने मंत्रों को 'देखा' (Realized/Heard)। इसलिए वे 'मंत्र-द्रष्टा' हैं, 'मंत्र-कर्ता' नहीं।
इस सिद्धांत का उद्देश्य वेदों को किसी भी मानवीय दोष (भ्रम, झूठ, अज्ञान) से मुक्त रखना था।
6. 'अपूर्व' का सिद्धांत: कर्म और फल का अदृश्य सेतु
जैमिनि के सामने एक दार्शनिक समस्या थी: "यज्ञ तो कुछ घंटों में समाप्त हो जाता है, और उसका फल (स्वर्ग) मृत्यु के बाद मिलता है। नष्ट हो चुका कर्म फल कैसे देगा?"
इस गुत्थी को सुलझाने के लिए उन्होंने 'अपूर्व' (Apurva - The Unique/Unseen Force) का सिद्धांत दिया।
जब यजमान यज्ञ करता है, तो क्रिया नष्ट हो जाती है, लेकिन वह यजमान की आत्मा में एक सूक्ष्म शक्ति (Potency) उत्पन्न कर देती है, जिसे 'अपूर्व' कहते हैं। यह अपूर्व आत्मा में संचित रहता है और सही समय आने पर (मृत्यु के बाद या अगले जन्म में) फल देता है।
यह सिद्धांत आधुनिक 'कर्म के नियम' (Law of Karma) और 'ऊर्जा संरक्षण' (Conservation of Energy) के बहुत निकट है।
7. जैमिनि और बादरायण (वेदांत): कर्म बनाम ज्ञान
भारतीय दर्शन का सबसे रोचक संवाद जैमिनि (मीमांसा) और बादरायण (वेदांत) के बीच है।
| विषय | जैमिनि (मीमांसा) | बादरायण (वेदांत) |
|---|---|---|
| मुख्य लक्ष्य | स्वर्ग (Happiness in Heaven). | मोक्ष (Liberation form cycle). |
| साधन | कर्म (Action/Rituals). | ज्ञान (Knowledge). |
| वेद का सार | विधि-निषेध (Commands). | उपनिषद् (Philosophy). |
| संन्यास | अस्वीकार (कर्म छोड़ना पाप है)। | आवश्यक (ज्ञान के लिए)। |
| ईश्वर | गौण (कर्मफल अपूर्व देता है, ईश्वर नहीं)। | सर्वोपरि (कर्मफल दाता ईश्वर है)। |
जैमिनि का मत था कि "ज्ञान" केवल कर्म को बेहतर बनाने के लिए है, स्वतंत्र नहीं। जबकि बादरायण ने कहा कि कर्म केवल चित्त-शुद्धि के लिए है, अंतिम लक्ष्य ज्ञान है। शंकराचार्य ने बाद में इन दोनों का समन्वय किया।
8. निष्कर्ष: भारतीय विधि (Law) और संस्कृति पर प्रभाव
महर्षि जैमिनि का प्रभाव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा।
- न्याय प्रणाली (Legal System): जैमिनि ने व्याख्या के जो नियम (Nyayas) बनाए, जैसे 'लिंग-वाक्य न्याय', 'श्रुति-लिंग न्याय', उनका उपयोग आज भी हिंदू कानून (Hindu Law) और यहां तक कि आधुनिक न्यायपालिका में कानूनों की व्याख्या (Interpretation of Statutes) के लिए किया जाता है।
- भाष्यों की परंपरा: जैमिनि के सूत्रों पर **शबर स्वामी** ने भाष्य लिखा, और बाद में **कुमारिल भट्ट** और **प्रभाकर** ने इस परंपरा को तार्किक ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
- व्यावहारिकता: जैमिनि ने भारतीयों को "कर्मठ" बनाया। उन्होंने सिखाया कि जीवन केवल बैठकर सोचने के लिए नहीं, बल्कि वैदिक अनुशासन में रहकर कार्य करने के लिए है।
महर्षि जैमिनि वेदों के 'शरीर' (कर्मकांड) के रक्षक हैं। यदि वेद आज भी जीवित हैं, तो इसलिए क्योंकि जैमिनि ने उन्हें 'अनुष्ठान' का रूप दे दिया। उनका दर्शन हमें सिखाता है कि अनुशासन और कर्तव्य-पालन ही सर्वोच्च धर्म है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- मीमांसा दर्शन (शबर भाष्य सहित) - चौखम्बा प्रकाशन।
- जैमिनीय न्यायमाला - माधवाचार्य।
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Vol I).
- Introduction to Purva Mimamsa - Dr. G.N. Jha.
- The Karma-Mimamsa - A.B. Keith.
