महर्षि कणाद: वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक, परमाणु वाद के जनक और प्राचीन भौतिक विज्ञानी | Maharshi Kanada

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि कणाद: परमाणु विज्ञान के आदि-ऋषि और वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक

महर्षि कणाद: वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक, परमाणु वाद के जनक और प्राचीन भौतिक विज्ञानी

एक विस्तृत वैज्ञानिक और दार्शनिक मीमांसा: जिन्होंने ग्रीक दार्शनिकों और डाल्टन से सदियों पहले 'परमाणु' (Atom) की खोज की (The Father of Ancient Physics)

प्रायः यह माना जाता है कि 'परमाणु सिद्धांत' (Atomic Theory) पश्चिम की देन है, जिसकी खोज डेमोक्रिटस या जॉन डाल्टन ने की। परन्तु, उनसे हजारों वर्ष पूर्व भारत की धरती पर एक ऐसे वैज्ञानिक ऋषि का जन्म हुआ था, जिन्होंने न केवल परमाणु की खोज की थी, बल्कि उसके गुण, गति और संयोजन (Combination) के नियमों को भी परिभाषित किया था। वे थे—महर्षि कणाद (Maharshi Kanada)।

उनका दर्शन 'वैशेषिक' (Vaisheshika) कहलाता है। यह भारतीय दर्शन की वह शाखा है जो 'भौतिकी' (Physics) और 'तत्वमीमांसा' (Metaphysics) का मिश्रण है। कणाद ने सिखाया कि इस ब्रह्मांड को समझने के लिए उसे छोटे से छोटे घटकों में तोड़कर (Analyze) देखना होगा। उनका प्रसिद्ध सूत्र "यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः" (जिससे भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक मोक्ष दोनों सिद्ध हों, वही धर्म है) विज्ञान और अध्यात्म के संतुलन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

📌 महर्षि कणाद: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
मूल नाम कश्यप (Kashyapa)
प्रचलित नाम कणाद (Kanada), उलूक (Uluka), कणभुक्
काल 600 ई.पू. - 200 ई.पू. (बौद्ध काल से पूर्व)
स्थान प्रभास क्षेत्र (द्वारका के निकट, गुजरात) / प्रयाग
प्रमुख ग्रंथ वैशेषिक सूत्र (Vaisheshika Sutras - 10 अध्याय, 370 सूत्र)
दर्शन वैशेषिक (Vaisheshika - Atomic Realism)
मुख्य खोज परमाणु सिद्धांत (Atomic Theory), गुरुत्वाकर्षण के संकेत
संबद्ध दर्शन न्याय दर्शन (Nyaya - Sister School)

2. जीवन परिचय: कण-कण बीनने वाला ऋषि

महर्षि कणाद के जीवन के विषय में कई रोचक किंवदंतियां प्रचलित हैं जो उनके नाम के अर्थ को स्पष्ट करती हैं। उनका गोत्र **'कश्यप'** था।

नामकरण: कणाद और उलूक

1. कणाद (कण + अद्): 'कण' का अर्थ है 'अनाज का दाना' या 'परमाणु', और 'अद्' का अर्थ है 'खाना'। वे खेतों से अनाज के बचे हुए दानों (कणों) को बीनकर अपना जीवन यापन करते थे। उनका मानना था कि अन्न का एक भी दाना व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। इसी वृत्ति ने उन्हें पदार्थ के सूक्ष्मतम कण (परमाणु) के चिंतन की ओर मोड़ा।

2. उलूक (Owl): कहा जाता है कि वे दिन भर भिक्षाटन और अध्ययन करते थे और रात में (उल्लू की तरह) ध्यान और चिंतन करते थे। भगवान शिव ने उन्हें 'उलूक' (उल्लू) के रूप में दर्शन देकर परमाणु विज्ञान का ज्ञान दिया था, इसलिए उनके दर्शन को **'औलूक्य दर्शन'** भी कहा जाता है।

3. वैशेषिक दर्शन: 'विशेष' का विज्ञान

'वैशेषिक' शब्द **'विशेष'** (Vishesha) पदार्थ से बना है। यह दर्शन **'बहुलवादी यथार्थवाद'** (Pluralistic Realism) है। इसका अर्थ है कि यह संसार केवल एक ब्रह्म का सपना नहीं है, बल्कि अनेक स्वतंत्र द्रव्यों (परमाणुओं और आत्माओं) से मिलकर बना एक वास्तविक जगत है।

जहाँ 'न्याय दर्शन' (गौतम) मुख्य रूप से **प्रमाण** (Logic/Epistemology) पर जोर देता है, वहीं 'वैशेषिक दर्शन' (कणाद) **प्रमेय** (Metaphysics/Physics) पर जोर देता है। अर्थात, "दुनिया किन चीजों से बनी है?"—यह कणाद का मुख्य प्रश्न था।

4. सप्त पदार्थ: ब्रह्मांड का वर्गीकरण (Classification of Universe)

महर्षि कणाद ने संपूर्ण ब्रह्मांड की वस्तुओं को (चाहे वे भौतिक हों या अभौतिक) 6 (बाद में 7) श्रेणियों में बांटा, जिन्हें **'पदार्थ'** (Padartha) कहते हैं।

पदार्थ विवरण
1. द्रव्य (Substance) वह आधार जिसमें गुण और कर्म रहते हैं। ये 9 हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश (Ether), काल (Time), दिक् (Space), आत्मा और मन।
2. गुण (Quality) द्रव्य की विशेषता (जैसे रूप, रस, गंध, संख्या)। कुल 24 गुण हैं।
3. कर्म (Action/Motion) गतिशीलता (जैसे ऊपर जाना, नीचे आना, सिकुड़ना)।
4. सामान्य (Generality) जाति (Genus) - जैसे सभी गायों में 'गोत्व'।
5. विशेष (Particularity) वह तत्व जो एक परमाणु को दूसरे परमाणु से अलग करता है। यह वैशेषिक की अनूठी खोज है।
6. समवाय (Inherence) अटूट संबंध (जैसे धागे और कपड़े का संबंध, जिसे अलग नहीं किया जा सकता)।
7. अभाव (Non-existence) किसी चीज का न होना (बाद के आचार्यों द्वारा जोड़ा गया)।

5. परमाणु वाद: सृष्टि निर्माण का भौतिक विज्ञान

कणाद का सबसे क्रांतिकारी विचार उनका **'परमाणु वाद'** (Atomism) है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि हम किसी पदार्थ (जैसे घड़ा) को तोड़ते जाएं, तो एक स्थिति ऐसी आएगी जब उसे और नहीं तोड़ा जा सकेगा। उस अंतिम, अविभाज्य (Indivisible) कण को उन्होंने **'परमाणु'** (Paramanu) कहा।

कणाद के परमाणु की विशेषताएं
  • अविभाज्य: इसे और तोड़ा नहीं जा सकता।
  • नित्य (Eternal): परमाणु न पैदा होता है, न मरता है। प्रलय में भी परमाणु नष्ट नहीं होते, केवल अलग हो जाते हैं।
  • अतीन्द्रिय (Supersensible): इसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता।
  • गोलाकार (Spherical): यह परिमंडल (Round) होता है।
  • विशिष्ट गुण: पृथ्वी के परमाणु में गंध, जल में रस, अग्नि में रूप और वायु में स्पर्श होता है।

6. द्वयणुक और त्रसरेणु: अणुओं का संयोजन

कणाद ने बताया कि अकेले परमाणु निष्क्रिय होते हैं। जब सृष्टि का निर्माण होना होता है, तो 'अदृष्ट' (Ishwara's Will or Cosmic Force) के कारण परमाणुओं में गति (Motion) उत्पन्न होती है।

संयोजन प्रक्रिया (Chemical Combination):
1. द्वयणुक (Diatom): दो समान परमाणु मिलकर एक 'द्वयणुक' बनाते हैं।
2. त्रसरेणु (Triatom): तीन 'द्वयणुक' मिलकर एक 'त्रसरेणु' बनाते हैं।
महर्षि कणाद कहते हैं कि 'त्रसरेणु' वह सबसे छोटा कण है जो दृश्यमान होता है (जैसे सूर्य की किरण में उड़ता हुआ धूल का कण - जालांतर्गत भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः)।

यह सिद्धांत आधुनिक रसायन विज्ञान (Chemistry) के अणुओं (Molecules) के निर्माण जैसा ही है।

7. पीलुपाक वाद: रासायनिक परिवर्तन का सिद्धांत

वैशेषिक दर्शन ने रासायनिक परिवर्तनों (Chemical Changes) को समझाने के लिए **'पीलुपाक'** (Pilu-paka) का सिद्धांत दिया।

  • पाक (Heat/Fire): कणाद मानते हैं कि सभी परिवर्तन 'तेज' (Heat) के कारण होते हैं।
  • पीलुपाक प्रक्रिया: जब कच्चे घड़े (काली मिट्टी) को आग में पकाया जाता है, तो आग की गर्मी मिट्टी के परमाणुओं के बीच घुस जाती है। पुराने 'द्वयणुक' टूट जाते हैं, और गर्मी के कारण परमाणुओं का रंग बदल जाता है (काला से लाल)। फिर नए 'द्वयणुक' बनते हैं।
  • अर्थात: परिवर्तन पूरे घड़े में एक साथ नहीं होता, बल्कि परमाणु स्तर (Atomic Level) पर होता है।

इसके विपरीत, न्याय दर्शन **'पिठरपाक'** (Pithara-paka) मानता है, जिसका अर्थ है कि पूरा घड़ा एक साथ पकता है। कणाद का दृष्टिकोण अधिक वैज्ञानिक (Microscopic) था।

8. निष्कर्ष: आधुनिक विज्ञान और कणाद

महर्षि कणाद ने केवल पदार्थ विज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि उन्होंने **गति के नियम** (Laws of Motion) भी सूत्रों में दिए, जो न्यूटन के नियमों से मेल खाते हैं।
"वेगः निमित्तविशेषात् कर्मणो जायते।" (वेग विशेष निमित्त से उत्पन्न होता है - Force causes Motion).

दुर्भाग्यवश, मध्यकाल में भारत में प्रायोगिक विज्ञान (Experimental Science) की जगह तार्किक और व्याकरणिक बहसों ने ले ली, जिससे कणाद का परमाणु विज्ञान केवल दर्शन बनकर रह गया।
परन्तु आज, जब हम 'क्वांटम मैकेनिक्स' और 'गॉड पार्टिकल' की बात करते हैं, तो हमें नतमस्तक होना पड़ता है कि हजारों साल पहले, बिना किसी प्रयोगशाला के, केवल अपनी चेतना और तर्क के बल पर महर्षि कणाद ने ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्य—**परमाणु**—को देख लिया था। वे सच्चे अर्थों में विश्व के प्रथम भौतिक विज्ञानी थे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वैशेषिक सूत्र (प्रशस्तपाद भाष्य सहित) - चौखम्बा प्रकाशन।
  • Indian Logic and Atomism - A.B. Keith.
  • History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Vol I).
  • Physics in Ancient India - Narayan Gopal Dongre.

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