महर्षि वाचस्पति मिश्र: 'सर्वतन्त्रस्वतन्त्र' आचार्य और भारतीय दर्शन के महान समन्वयकारी
एक ऐसी मेधा जिन्होंने दर्शन के सभी छह संप्रदायों पर 'प्रामाणिक' भाष्य लिखे और अपनी पत्नी के त्याग को 'भामती' ग्रंथ के माध्यम से अमर कर दिया।
- 1. वाचस्पति मिश्र: दर्शन की दुनिया के विलक्षण सूर्य
- 2. जीवन परिचय और मिथिला की विद्वत परंपरा
- 3. 'सर्वतन्त्रस्वतन्त्र': एक उपाधि जो स्वयं में इतिहास है
- 4. प्रमुख कृतियाँ: षड्दर्शनों की कुंजी
- 5. 'भामती' की अमर कथा: ज्ञान और समर्पण का संगम
- 6. दार्शनिक दृष्टिकोण: समन्वय और स्पष्टता
- 7. उपसंहार: वाचस्पति मिश्र का चिरस्थायी प्रभाव
भारतीय दर्शन की यात्रा में वाचस्पति मिश्र (Vachaspati Mishra) एक ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बिना षड्दर्शनों (Six Schools of Thought) की व्याख्या अधूरी है। वे 9वीं-10वीं शताब्दी के महान दार्शनिक थे, जिन्होंने वेदान्त, न्याय, सांख्य, योग और मीमांसा जैसे गहन विषयों पर ऐसी टीकाएँ लिखीं, जिन्हें आज भी अंतिम प्रमाण माना जाता है।
आमतौर पर एक दार्शनिक किसी एक विचारधारा का अनुयायी होता है, लेकिन वाचस्पति मिश्र की विशेषता यह थी कि उन्होंने जिस दर्शन पर लिखा, उसी के रंग में रंग कर लिखा। जब वे सांख्य पर लिखते हैं, तो वे पूर्णतः सांख्य-वादी लगते हैं, और जब वेदान्त पर लिखते हैं, तो अद्वैत के प्रखर ध्वजवाहक।
| जन्म स्थान | मिथिला (वर्तमान बिहार), भारत |
| समय | लगभग 841 ईस्वी (9वीं-10वीं शताब्दी) |
| उपाधि | सर्वतन्त्रस्वतन्त्र, द्वादशदर्शनटीकाकार |
| प्रमुख ग्रंथ | भामती (वेदान्त), तत्त्वकौमुदी (सांख्य), तत्त्ववैशारदी (योग) |
| दार्शनिक मत | अद्वैत वेदान्त (भामती प्रस्थान के जनक) |
| विशिष्ट पहचान | षड्दर्शनों के तटस्थ व्याख्याता |
2. जीवन परिचय और मिथिला की विद्वत परंपरा
वाचस्पति मिश्र का जन्म विद्वानों की भूमि मिथिला में हुआ था। उनके समय के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है, किंतु उनकी कृति 'न्यायसूची निबंध' के अनुसार उन्होंने इसे 'वसू-अंक-वसु' (898) संवत में लिखा था, जो ईस्वी सन् 841 के आसपास ठहरता है।
वे मिथिला के नरेश के संरक्षण में रहे, किंतु उनका जीवन पूर्णतः सरस्वती की साधना को समर्पित था। कहा जाता है कि वे अपनी लेखन साधना में इतने लीन रहते थे कि उन्हें सांसारिक सुखों और अपने परिवार तक का भान नहीं रहता था।
3. 'सर्वतन्त्रस्वतन्त्र': एक उपाधि जो स्वयं में इतिहास है
भारतीय विद्वत परंपरा में वाचस्पति मिश्र को 'सर्वतन्त्रस्वतन्त्र' कहा जाता है। इसका अर्थ है—"वह जो सभी शास्त्रों (तन्त्रों) में समान रूप से निष्णात और स्वतंत्र हो।"
- द्वादशदर्शनटीकाकार: उन्होंने केवल अद्वैत वेदान्त पर ही नहीं, बल्कि न्याय, सांख्य, योग और मीमांसा पर भी ऐसी टीकाएँ लिखीं जो मूल ग्रंथों के समान ही पूज्य हो गईं।
- तटस्थ व्याख्या: उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे जिस संप्रदाय की व्याख्या करते थे, उसके सिद्धांतों के प्रति पूर्ण न्याय करते थे, चाहे वह उनके निजी वेदान्ती मत से मेल खाती हो या नहीं।
4. प्रमुख कृतियाँ: षड्दर्शनों की कुंजी
वाचस्पति मिश्र ने भारतीय दर्शन के लगभग हर अंग को अपनी लेखनी से स्पर्श किया। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं:
| दर्शन (School) | ग्रंथ/टीका का नाम |
|---|---|
| अद्वैत वेदान्त | भामती (शारीरिक भाष्य पर टीका) |
| सांख्य दर्शन | सांख्यतत्त्वकौमुदी (सांख्यकारिका पर टीका) |
| योग दर्शन | तत्त्ववैशारदी (व्यास भाष्य पर टीका) |
| न्याय दर्शन | न्यायवार्त्तिकतात्पर्यटीका |
| मीमांसा दर्शन | तत्त्वबिन्दु और न्याय कणिका |
5. 'भामती' की अमर कथा: ज्ञान और समर्पण का संगम
प्रचलित कथा के अनुसार, वाचस्पति मिश्र कई वर्षों तक आदि शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्र भाष्य पर अपनी टीका लिखने में मग्न थे। एक रात जब वे अपनी रचना पूरी कर रहे थे, तो दीपक की लौ कम होने लगी। तभी एक स्त्री ने आकर दीपक में तेल डाला। वाचस्पति ने जब उसे गौर से देखा तो चकित होकर पूछा—"देवी, आप कौन हैं?"
उस स्त्री ने आंखों में आंसू भरकर कहा—"स्वामी! मैं आपकी पत्नी भामती हूँ।" वाचस्पति को तब अहसास हुआ कि ग्रंथ लेखन की धुन में वे इतने खो गए थे कि उन्हें विवाह के बाद अपनी पत्नी तक का ध्यान नहीं रहा। वे ग्लानि से भर गए क्योंकि अब उनका अंत समय निकट था और वे उसे संतान या सुख नहीं दे सकते थे। तब उन्होंने अपनी उस कालजयी रचना का नाम अपनी पत्नी के नाम पर 'भामती' रखा ताकि जब तक यह दर्शन जीवित रहे, भामती का नाम अमर रहे।
आज अद्वैत वेदान्त में दो प्रमुख प्रस्थान (Schools) माने जाते हैं—'विवरण प्रस्थान' और 'भामती प्रस्थान'। वाचस्पति मिश्र द्वारा प्रवर्तित 'भामती प्रस्थान' आज भी वेदान्त के छात्रों के लिए अनिवार्य है।
6. दार्शनिक दृष्टिकोण: समन्वय और स्पष्टता
वाचस्पति मिश्र ने केवल व्याख्या नहीं की, बल्कि दर्शनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में प्रस्तुत किया।
- शब्द और अर्थ का संबंध: उनके अनुसार, भाषा सत्य को समझने का माध्यम है, लेकिन वह अंतिम सत्य नहीं है।
- अविद्या का आशय: उन्होंने वेदान्त में यह स्थापित किया कि अविद्या (अज्ञान) का आशय 'जीव' है, न कि 'ब्रह्म'। यह उनके दर्शन की एक बहुत महत्वपूर्ण स्थापना है।
- प्रमाण शास्त्र: न्याय दर्शन में उन्होंने 'तात्पर्य' की अवधारणा को बहुत मजबूती से स्पष्ट किया, जिससे वाक्यों के सही अर्थ निकालने में सुगमता हुई।
7. उपसंहार: वाचस्पति मिश्र का चिरस्थायी प्रभाव
महर्षि वाचस्पति मिश्र भारतीय मेधा के उस शिखर का नाम है जहाँ तर्क और श्रद्धा का मिलन होता है। उन्होंने सिद्ध किया कि बिना किसी संप्रदाय के प्रति दुराग्रह रखे, सत्य का निष्पक्ष अन्वेषण कैसे किया जाता है। यदि वाचस्पति मिश्र न होते, तो आज सांख्यकारिका या व्यास भाष्य की कई गुत्थियाँ अनसुलझी ही रह जातीं।
उनकी स्मृति में आज भी मिथिला में और पूरे भारत के दार्शनिक समाज में उन्हें श्रद्धा से याद किया जाता है। उनका 'भामती' ग्रंथ न केवल ज्ञान का भंडार है, बल्कि एक मूक त्याग और प्रेम का प्रतीक भी है।
सन्दर्भ एवं महत्वपूर्ण लिंक (References)
- भामती (अद्वैत वेदान्त टीका) - वाचस्पति मिश्र।
- सांख्यतत्त्वकौमुदी - व्याख्या सहित।
- भारतीय दर्शन का इतिहास - डॉ. राधाकृष्णन।
- मिथिला का सांस्कृतिक इतिहास - विभिन्न शोध पत्र।
