महर्षि पतंजलि: योगसूत्र के रचयिता, अष्टांग योग के जनक और मन के महान चिकित्सक
एक विस्तृत दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक मीमांसा: जिन्होंने 'योग' को मात्र व्यायाम से ऊपर उठाकर 'चित्त के निरोध' का विज्ञान बनाया (The Father of Yoga Psychology)
- 1. प्रस्तावना: योग की आधुनिक भ्रांति और पतंजलि का सत्य
- 2. जीवन परिचय: शेषावतार और तीन रूपों का रहस्य
- 3. योगसूत्र: 196 सूत्रों में समाया ब्रह्मांड
- 4. योग की परिभाषा: चित्त वृत्ति निरोध
- 5. अष्टांग योग: जीवन जीने की कला (The 8 Limbs)
- 6. क्रिया योग और क्लेश: दुखों का मनोवैज्ञानिक कारण
- 7. विभूति पाद: सिद्धियां और चेतावनी
- 8. कैवल्य और समाधि: जीवन का अंतिम लक्ष्य
- 9. निष्कर्ष: आज के युग में पतंजलि की प्रासंगिकता
संपूर्ण विश्व को भारत की जो सबसे अमूल्य भेंट मिली है, वह है—'योग'। लेकिन आज जिसे हम योग कहते हैं (हाथ-पैर मोड़ना, आसन, व्यायाम), वह महर्षि पतंजलि के विशाल दर्शन का मात्र एक छोटा सा हिस्सा है। महर्षि पतंजलि (Maharshi Patanjali) ने दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में 'योगसूत्र' (Yoga Sutras) की रचना करके योग को एक व्यवस्थित विज्ञान (Systematic Science) का रूप दिया।
पतंजलि ने धर्म, आस्था और पूजा-पाठ से ऊपर उठकर मानव मन (Human Mind) का जैसा सूक्ष्म विश्लेषण (Psycho-analysis) किया है, वैसा आधुनिक मनोविज्ञान (Psychology) भी आज तक नहीं कर पाया है। उनका दर्शन 'राजयोग' (Raja Yoga) कहलाता है, जिसका उद्देश्य शरीर को स्वस्थ रखना नहीं, बल्कि 'कैवल्य' (Ultimate Freedom) प्राप्त करना है।
| नाम | महर्षि पतंजलि (Maharshi Patanjali) |
| अवतार | शेषनाग के अंशावतार (Shesha Naga Avatar) |
| काल | 2री शताब्दी ई.पू. (शुंग वंश, पुष्यमित्र शुंग के समकालीन) |
| स्थान | गो नर्द (संभवतः गोंडा, उत्तर प्रदेश) या कश्मीर |
| प्रमुख ग्रंथ | 1. योगसूत्र (दर्शन) 2. महाभाष्य (व्याकरण) 3. चरक संहिता (आयुर्वेद - चरक प्रतिसंस्कर) |
| दर्शन | योग दर्शन (द्वैतवादी - सेश्वर सांख्य) |
| मुख्य सिद्धांत | अष्टांग योग (Ashtanga Yoga), चित्त वृत्ति निरोध |
2. जीवन परिचय: शेषावतार और तीन रूपों का रहस्य
महर्षि पतंजलि के जीवन के बारे में कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। उन्हें भगवान विष्णु के शैया-रूप शेषनाग का अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि वे धरती पर मनुष्य के कष्टों को दूर करने के लिए तीन रूपों में अवतरित हुए:
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां, पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥" अर्थ: मैं उन मुनिश्रेष्ठ पतंजलि को नमन करता हूँ, जिन्होंने 'योग' से चित्त (मन) के मल को, 'व्याकरण' (महाभाष्य) से वाणी के मल को, और 'वैद्यक' (चिकित्सा) से शरीर के मल को दूर किया।
जन्म कथा: 'पतंजलि' शब्द का अर्थ है—"अंजलि (हथेली) में गिरा हुआ" (पतत् + अंजलि)। कहा जाता है कि एक योगिनी 'गोनिका' सूर्य को अर्घ्य दे रही थीं, तभी एक छोटा सा सर्प उनकी अंजलि में गिरा और बालक बन गया।
3. योगसूत्र: 196 सूत्रों में समाया ब्रह्मांड
पतंजलि ने योग का आविष्कार नहीं किया (योग वेदों में पहले से था), उन्होंने इसे सूत्रबद्ध (Codified) किया। 'सूत्र' का अर्थ है—कम से कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहना। योगसूत्र में कुल **196 सूत्र** हैं, जो 4 अध्यायों (पादों) में बंटे हैं:
- समाधि पाद (51 सूत्र): यह भाग योग के उच्च स्तर के साधकों के लिए है। इसमें योग की परिभाषा और समाधि के भेदों का वर्णन है।
- साधन पाद (55 सूत्र): इसमें अभ्यास (Practice), अष्टांग योग और क्रिया योग का वर्णन है। यह शुरुआती साधकों के लिए है।
- विभूति पाद (55 सूत्र): इसमें योग से प्राप्त होने वाली सिद्धियों (Powers) का वर्णन है।
- कैवल्य पाद (34 सूत्र): इसमें मुक्ति (Liberation) का दार्शनिक स्वरूप और चित्त की अंतिम स्थिति बताई गई है।
4. योग की परिभाषा: चित्त वृत्ति निरोध
योग क्या है? पतंजलि पहले ही अध्याय के दूसरे सूत्र में इसकी विश्व-प्रसिद्ध परिभाषा देते हैं:
जब तालाब का पानी हिलता है, तो हम अपना चेहरा नहीं देख पाते। वैसे ही, जब तक मन में विचारों की हलचल है, हम अपनी आत्मा (Self) को नहीं देख सकते।
पतंजलि कहते हैं: "तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्" (जब मन शांत होता है, तब द्रष्टा/आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है)। अन्यथा, हम खुद को अपने विचार ही मानते रहते हैं।
5. अष्टांग योग: जीवन जीने की कला (The 8 Limbs)
चित्त को शांत कैसे करें? इसके लिए पतंजलि ने एक वैज्ञानिक सीढ़ी (Step-by-step method) दी, जिसे **अष्टांग योग** कहते हैं।
- 1. यम (Yama): सामाजिक अनुशासन (Social Ethics)।
- अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (संग्रह न करना)। - 2. नियम (Niyama): व्यक्तिगत अनुशासन (Personal Observances)।
- शौच (पवित्रता), संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान (समर्पण)। - 3. आसन (Asana): "स्थिरसुखमासनम्" - शरीर की वह स्थिति जो स्थिर और आरामदायक हो। (ध्यान के लिए बैठना)।
- 4. प्राणायाम (Pranayama): श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना। इससे मन नियंत्रित होता है।
- 5. प्रत्याहार (Pratyahara): इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर मोड़ना (Withdrawal of senses)।
- 6. धारणा (Dharana): चित्त को किसी एक स्थान पर एकाग्र करना (Concentration)।
- 7. ध्यान (Dhyana): धारणा का लगातार बने रहना (Meditation - Flow of consciousness)।
- 8. समाधि (Samadhi): जब ध्याता (meditator) और ध्येय (object) एक हो जाएं। स्वयं का भान भूल जाना (Absorption)।
धारणा, ध्यान और समाधि—इन तीनों को मिलाकर **'संयम'** (Samyama) कहा जाता है।
6. क्रिया योग और क्लेश: दुखों का मनोवैज्ञानिक कारण
साधन पाद में पतंजलि **'क्रिया योग'** की बात करते हैं: "तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः।" (तप, स्वाध्याय और ईश्वर-समर्पण—यह क्रिया योग है)।
पंच क्लेश (Five Afflictions): पतंजलि बताते हैं कि मनुष्य दुखी क्यों है?
- अविद्या (Ignorance): नश्वर को अनश्वर समझना। (जड़)।
- अस्मिता (Egoism): "मैं हूँ" का भाव।
- राग (Attachment): सुख के पीछे भागना।
- द्वेष (Aversion): दुख से भागना।
- अभिनिवेश (Fear of Death): जीवन से चिपके रहने की चाह।
इन क्लेशों को दूर करने के लिए उन्होंने 'क्रिया योग' का सुझाव दिया है।
7. विभूति पाद: सिद्धियां और चेतावनी
तीसरे अध्याय में पतंजलि बताते हैं कि जब योगी संयम करता है, तो उसे अलौकिक शक्तियां (Siddhis) प्राप्त होती हैं।
- अतीत और भविष्य का ज्ञान।
- दूसरों के मन को पढ़ना।
- अदृश्य होना।
- हाथी जैसा बल प्राप्त करना।
चेतावनी: पतंजलि स्पष्ट चेतावनी देते हैं: "ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः।" (ये सिद्धियां समाधि के मार्ग में बाधा/विघ्न हैं)। जो योगी इनमें फंस जाता है, वह मोक्ष तक नहीं पहुँच पाता।
8. कैवल्य: मोक्ष का स्वरूप
पतंजलि के दर्शन में मोक्ष को **'कैवल्य'** (Isolation/Aloneness) कहा गया है। यह सांख्य दर्शन के समान है।
- कैवल्य क्या है? जब 'पुरुष' (आत्मा) यह समझ लेता है कि वह 'प्रकृति' (मन/बुद्धि) से पूरी तरह अलग है। वह अपने शुद्ध स्वरूप में 'अकेला' (केवल) स्थित हो जाता है।
- धर्ममेघ समाधि: यह समाधि की सर्वोच्च अवस्था है, जहाँ ज्ञान की वर्षा होती है और सभी कर्म-संस्कार नष्ट हो जाते हैं।
ईश्वर का स्थान: सांख्य (कपिल) में ईश्वर नहीं है, लेकिन पतंजलि ने योग में **ईश्वर** को जोड़ा। उनके अनुसार, ईश्वर एक **'विशेष पुरुष'** (Purusha Vishesha) है जो कर्म, क्लेश और फल से मुक्त है। ईश्वर का वाचक शब्द **'ॐ'** (प्रणव) है।
9. निष्कर्ष: आधुनिक युग में पतंजलि की प्रासंगिकता
महर्षि पतंजलि का योगदान अकल्पनीय है। उन्होंने धर्म को 'कर्मकांड' से निकालकर 'मनोविज्ञान' के धरातल पर ला खड़ा किया।
- वैज्ञानिकता: उन्होंने यह नहीं कहा कि "ईश्वर पर विश्वास करो तो मोक्ष मिलेगा", बल्कि उन्होंने कहा "ये 8 सीढ़ियां हैं, इन पर चढ़ो, तुम्हें अनुभव खुद हो जाएगा।" यह प्रयोगात्मक (Experimental) विधि है।
- सार्वभौमिकता: योग किसी धर्म (हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई) का नहीं है। यह मानव मात्र के चित्त का विज्ञान है।
आज जब हम 'स्ट्रेस मैनेजमेंट', 'माइंडफुलनेस' (Mindfulness) या 'मेडिटेशन' की बात करते हैं, तो हम अनजाने में पतंजलि के सूत्रों का ही उपयोग कर रहे होते हैं। पतंजलि ने हमें सिखाया कि सबसे बड़ी विजय बाहर की दुनिया पर नहीं, बल्कि अपने मन पर विजय है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- योगदर्शन - व्यास भाष्य सहित (गीताप्रेस गोरखपुर)।
- पतंजलि योग सूत्र - स्वामी विवेकानंद (राजयोग)।
- भारतीय दर्शन की रूपरेखा - डॉ. राधाकृष्णन।
- Light on the Yoga Sutras of Patanjali - B.K.S. Iyengar.
