महासती अनसूया: पातिव्रत्य धर्म की शक्ति और त्रिदेवों की माता
एक विस्तृत पौराणिक और आध्यात्मिक आलेख (The Power of Pativrata Dharma & Mother of Trimurti)
भारतीय ऋषि परम्परा में नारियों का स्थान सदैव पूजनीय रहा है, किन्तु माता अनसूया (Devi Anasuya) का स्थान अद्वितीय है। 'अनसूया' शब्द का अर्थ है— 'जिसमें असूया (ईर्ष्या या दोष-दृष्टि) का अभाव हो'। वे सप्तर्षियों में से एक महर्षि अत्रि की धर्मपत्नी थीं। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि एक गृहिणी का 'पातिव्रत्य धर्म' (पति के प्रति पूर्ण समर्पण और निष्ठा) किसी भी कठोर तपस्या या यज्ञ से अधिक शक्तिशाली हो सकता है। उनकी शक्ति के आगे देवताओं को भी नतमस्तक होना पड़ा था।
| पति | महर्षि अत्रि (सप्तर्षियों में से एक) |
| पिता | कर्दम ऋषि |
| माता | देवहूति |
| पुत्र (त्रिदेव अंश) | दत्तात्रेय (विष्णु), दुर्वासा (शिव), चन्द्रमा (ब्रह्मा) |
| मुख्य तपस्थली | चित्रकूट (अत्रि-अनसूया आश्रम) |
| आध्यात्मिक शक्ति | सर्वोच्च पातिव्रत्य बल |
1. त्रिदेवों की परीक्षा: दत्तात्रेय का जन्म
यह माता अनसूया के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रिदेवों की पत्नियों (सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती) को अपने पातिव्रत्य पर अभिमान हो गया था। नारद जी ने उनका अभिमान तोड़ने के लिए अनसूया की प्रशंसा की। ईर्ष्यावश देवियों ने अपने पतियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) को अनसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने भेजा।
- कठोर परीक्षा: तीनों देव साधु वेष में आए और भिक्षा मांगने लगे, लेकिन शर्त रखी कि अनसूया उन्हें निवस्त्र होकर भोजन परोसें। यह एक असंभव माँग थी।
- पातिव्रत्य का चमत्कार: अनसूया ने अपने पति का स्मरण किया और अपने तपोबल से उन तीनों महाशक्तिशाली देवताओं को तुरंत 'नवजात शिशु' बना दिया। फिर उन्होंने माता भाव से उन्हें स्तनपान कराया और पालने में झुलाया।
- त्रिदेवों का वरदान: अंततः देवियों की प्रार्थना पर अनसूया ने उन्हें पुनः उनका रूप लौटाया। उनकी शक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उनके गर्भ से जन्म लेने का वरदान दिया। ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा, शिव के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।
2. तप का प्रभाव: चित्रकूट में मंदाकिनी का अवतरण
जब महर्षि अत्रि और अनसूया चित्रकूट में निवास कर रहे थे, तब वहां भीषण अकाल पड़ा। जीव-जंतु पानी के लिए तड़पने लगे। महर्षि अत्रि तपस्या में लीन थे। तब माता अनसूया ने अपने कठोर तप के बल से, जीवों की रक्षा के लिए, चित्रकूट की सूखी धरती पर गंगा की धारा को प्रकट किया। यह धारा आज 'मंदाकिनी' नदी के नाम से जानी जाती है, जो चित्रकूट की जीवन रेखा है। यह घटना सिद्ध करती है कि उनका तप प्रकृति के तत्वों को भी नियंत्रित कर सकता था।
3. रामायण काल: माता सीता की शिक्षिका
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में वर्णन है कि वनवास के दौरान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अत्रि मुनि के आश्रम पहुंचे। वहाँ वृद्ध तपस्विनी अनसूया ने सीता जी का मातृवत स्वागत किया।
- उपदेश: अनसूया ने सीता को 'स्त्री धर्म' और विषम परिस्थितियों में पति का साथ निभाने के महत्व पर उपदेश दिया, जो आगे चलकर सीता के जीवन का आधार बना।
- दिव्य भेंट: अनसूया ने सीता को अपनी तपस्या से उत्पन्न दिव्य वस्त्र, आभूषण और अंगराग (उबटन) भेंट किए, जिनकी चमक वनवास के 14 वर्षों तक कभी फीकी नहीं पड़ी।
4. निष्कर्ष
महासती अनसूया का चरित्र भारतीय संस्कृति का एक उज्ज्वल नक्षत्र है। वे सिखाती हैं कि शक्ति केवल शस्त्रों या राजसिंहासन में नहीं होती, बल्कि एक निश्छल हृदय और समर्पित जीवन (पातिव्रत्य) में इतनी ऊर्जा होती है कि वह सृष्टि के सर्वोच्च नियमों को भी बदल सकती है। वे मातृत्व, तपस्या और स्त्री-शक्ति की शाश्वत प्रतिमान हैं।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- श्रीमद्भागवत पुराण (चतुर्थ स्कन्ध - अत्रि-अनसूया प्रसंग)।
- वाल्मीकि रामायण (अयोध्या काण्ड, सर्ग 117-119)।
- महाभारत (वन पर्व)।
- मार्कण्डेय पुराण।
