श्री कृष्ण की माखन चोरी लीला का रहस्य: जानिए इसका आध्यात्मिक अर्थ | Secret of Krishna Makhan Chori Leela

Sooraj Krishna Shastri
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श्रीकृष्ण की माखन चोरी लीला का रहस्य

एक आध्यात्मिक और दार्शनिक विवेचन

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध को 'भागवत का हृदय' कहा जाता है और इस हृदय की धड़कन है—भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएँ। इन लीलाओं में 'माखन चोरी' की घटना न केवल एक मधुर प्रसंग है, बल्कि यह वेदान्त के गूढ़ रहस्यों, भक्त के समर्पण और ईश्वर की जीव के प्रति व्याकुलता का एक जीवंत दस्तावेज है।

प्रस्तुत लेख इस दिव्य घटना के विभिन्न आयामों को श्रीमद्भागवत के श्लोकों के सन्दर्भ के साथ सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करता है।

1. भूमिका: ब्रह्म का 'चोर' बनना

सृष्टि का वह अधिपति, जिसके एक इशारे पर ब्रह्मांडों की उत्पत्ति और प्रलय होती है, वह गोकुल की गलियों में नंगे पैर दौड़ रहा है और गोपियों के घरों से माखन चुरा रहा है। यह दृश्य तर्क से परे है। श्रीमद्भागवत में शुकदेव जी कहते हैं कि भगवान 'पूर्णकाम' हैं, उन्हें किसी वस्तु की भूख नहीं है। फिर भी वे चोरी करते हैं। यह 'चोरी' वास्तव में जीव के अहंकार की चोरी है।

2. लीला का सन्दर्भ: दशम स्कंध का महात्म्य

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के आठवें और नौवें अध्याय में भगवान की इन लीलाओं का वर्णन है। जब गर्गाचार्य जी ने नंद भवन में आकर कृष्ण का नामकरण किया, उसके कुछ ही समय बाद कृष्ण की बाल-सुलभ चपलताएँ मुखर होने लगीं।

कालेन व्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ।
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिङ्गमाणौ विजह्रतुः॥ (श्रीमद्भागवत 10.8.21)
अर्थात्: अल्प समय में ही राम और कृष्ण गोकुल में घुटनों और हाथों के बल चलते हुए विहार करने लगे। यही विहार धीरे-धीरे 'माखन चोरी' के रूप में विकसित हुआ।

3. माखन का आध्यात्मिक अर्थ: हृदय का सार

भगवान कृष्ण पत्थर या सोना नहीं चुराते, वे 'माखन' (नवनीत) ही क्यों चुनते हैं? इसके पीछे तीन प्रमुख रहस्य हैं:

  • निर्मलता का प्रतीक: दूध से दही बनता है, और दही को मथने पर माखन निकलता है। दूध 'संसार' है, दही 'साधना' है और माखन 'शुद्ध प्रेम' है। भगवान केवल उस प्रेम को स्वीकार करते हैं जो संसार की मथनी में मथकर शुद्ध हो चुका हो।
  • कोमलता: माखन कठोर नहीं होता। यह उस भक्त के हृदय का प्रतीक है जो 'द्रवीभूत' हो चुका है। भगवान पत्थर जैसे कठोर हृदय में प्रवेश नहीं करते, वे तो माखन जैसे कोमल चित्त में बसते हैं।
  • सार-तत्व: जैसे दूध के कण-कण में घी व्याप्त है पर दिखाई नहीं देता, वैसे ही कण-कण में परमात्मा व्याप्त है। मथने (भक्ति) के बाद जो सार निकलता है, वही परमात्मा का आहार है।

4. गोपियों का उलाहना: प्रेम की विचित्र अभिव्यक्ति

श्रीमद्भागवत महापुराण में शुकदेव गोस्वामी जी महाराज परीक्षित को कथा सुनाते हुए कहते हैं कि गोपियाँ नित्य प्रति माता यशोदा के पास उलाहना (शिकायत) लेकर आती थीं। इन शिकायतों में क्रोध कम और कृष्ण के दर्शन की लालसा अधिक होती थी।

अपराधों की सूची

गोपियाँ यशोदा मैया के सामने श्रीकृष्ण की 'चोरी' का वर्णन बड़े विस्तार से करती हैं। दशम स्कंध के आठवें अध्याय का यह श्लोक माखन चोरी के दृश्य को जीवंत कर देता है:

वत्सान् मुञ्चन् क्वचिदसमये क्रोशसंजातहास:
स्तेयं स्वाद्वत्त्यथ दधि पय: कल्पितै: स्तेययोगै: ।
मर्कान् भोक्ष्यन् विभजति स चेन्नात्ति भाण्डं भिन्नत्ति
द्रव्यालाभे सगृहकुपितो यात्युपक्रोश्य तोकान् ॥ (श्रीमद्भागवत 10.8.29)
भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं: "हे यशोदा! तुम्हारा यह लाला कभी-कभी असमये (दुहने के समय से पहले ही) बछड़ों को खोल देता है। जब हम क्रोध करती हैं, तो यह हंसने लगता है (जिससे हमारा क्रोध पानी हो जाता है)। यह चोरी के नए-नए उपाय (स्तेययोगै:) रचकर मीठे-मीठे दूध-दही को चुराकर खा जाता है। केवल स्वयं ही नहीं खाता, बल्कि वानरों (मर्कान्) को भी बाँट देता है। और यदि इसे माखन अच्छा न लगे या न मिले, तो यह क्रोधित होकर मटकी ही फोड़ देता है और घर के छोटे बच्चों को रुलाकर भाग जाता है।"

तात्विक विवेचन:

  • असमये वत्सान् मुञ्चन्: यह संकेत है कि भगवान वेदों और कर्मकांडों के निर्धारित 'समय' के बंधन में नहीं बंधते। वे प्रेम के वशीभूत होकर मर्यादाओं का उल्लंघन (बछड़ों को खोलना) भी कर देते हैं।
  • मर्कान् भोक्ष्यन् (वानरों को खिलाना): यह भगवान की समदृष्टि है। वे यह संदेश देते हैं कि जिस अन्न और रस पर तुम मनुष्यों ने अपना अधिकार जमा रखा है, उस पर इन वनचरों का भी अधिकार है। यह 'यज्ञशिष्टामृतभुजो' की भावना है।
  • मटकी फोड़ना: यदि माखन न मिले या बासी हो, तो कृष्ण मटकी फोड़ देते हैं। मटकी 'देह' (शरीर) का प्रतीक है। भगवान संदेश देते हैं कि यदि इस शरीर में 'प्रेम' नहीं है, तो इस 'मिट्टी के पात्र' का कोई मूल्य नहीं है।

5. अंधेरे में प्रकाश: चोरी की चतुर विधियाँ

मैया यशोदा तर्क देती हैं कि "तुम लोग माखन को ऊपर छींके पर क्यों नहीं रखतीं?" इस पर गोपियाँ उत्तर देती हैं कि तुम्हारा पुत्र सर्वज्ञ और सर्वसमर्थ है, उसके लिए कोई ऊँचाई बाधा नहीं है।

हस्ताग्राह्ये रचयति विधिं पीठकोलूखलाद्यै-
श्छिद्रं ह्यन्तर्निहितवयुन: शिक्यभाण्डेषु तद्वित् ।
ध्वान्तागारे धृतमणितमं स्वांगमर्थप्रदीपं
काले गोप्यो यर्ह्य गृहकृत्येसु व्यग्रचित्ता: ॥ (श्रीमद्भागवत 10.8.30)
भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं: "यदि हम छींके पर दूध-दही रखती हैं और वह हाथ से नहीं पहुँचता, तो यह पीढ़ा (चौकी) या ओखल रखकर उस पर चढ़ जाता है। यदि फिर भी हाथ न पहुँचे, तो यह मटकी में छेद कर देता है क्योंकि इसे यह भी पता है कि किस बर्तन में क्या रखा है (तद्वित्)। यदि हम अँधेरे कमरे में माखन छिपाती हैं, तो यह अपने अंगों की मणियों के प्रकाश (स्वांगमर्थप्रदीपं) से उसे ढूँढ लेता है।"

तात्विक विवेचन:

  • स्वांगमर्थप्रदीपं (अपने अंगों का प्रकाश): यह अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक संकेत है। गोपियाँ अनजाने में स्वीकार कर रही हैं कि कृष्ण 'स्वयंप्रकाश' हैं। जिस हृदय रूपी अँधेरे कमरे में अज्ञान छाया है, वहाँ परमात्मा अपने ही ज्ञान के प्रकाश से प्रवेश करते हैं और भक्ति रूपी माखन को ढूँढ निकालते हैं।
  • मटकी में छेद: शरीर रूपी घट जब तक अभेद्य (अहंकार से बंद) है, तब तक रस (परमात्मा) का प्रवेश नहीं होता। भगवान उसमें 'छेद' करते हैं ताकि जीवात्मा का संबंध परमात्मा से जुड़ सके।

6. 'चोर' संबोधन का दार्शनिक पक्ष

भगवान को 'चोर-जार-शिखामणि' कहा गया है। संसार में चोरी पाप है, लेकिन कृष्ण की चोरी पुण्य है। क्यों?

  • अधिकार की चोरी: संसार कहता है "यह मेरा है", कृष्ण कहते हैं "सब मेरा है"। जब वे किसी गोपी के घर से माखन चुराते हैं, तो वे वास्तव में उस गोपी को उसके 'ममत्व' (मेरापन) के बंधन से मुक्त कर रहे होते हैं।
  • चित्त-चोर: भगवान केवल माखन नहीं चुराते, वे भक्त का 'चित्त' (चेतना) चुरा लेते हैं। एक बार जब कृष्ण चित्त चुरा लेते हैं, तो जीव संसार के दुखों से मुक्त हो जाता है।

7. मैया यशोदा की प्रतिक्रिया: वात्सल्य और मोह

इतनी शिकायतों के बाद यशोदा मैया को क्रोध आना चाहिए था, लेकिन परिणाम विपरीत होता है।

एवं धार्ष्ट्यान्युशति कुरुते मेहनादीनि वास्तौ
स्तेयोपायैर्विरचितकृति: सुप्रतीको यथास्ते ।
इत्थं स्त्रीभि: स भय नयन श्रीमुखालोकनीभि-
र्व्याख्यातार्था प्रहसितमुखी न ह्युपालब्धुमैच्छत् ॥ (श्रीमद्भागवत 10.8.31)
भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं: "देखो यशोदा! यह तुम्हारे सामने कैसा सुप्रतीक (साधु/भोला) बनकर बैठा है, जैसे इसने कुछ किया ही न हो।" शुकदेव जी कहते हैं कि गोपियों के ऐसे वचन सुनकर और भयभीत नेत्रों से अपनी ओर देखते हुए अपने सुंदर पुत्र के मुख को निहारकर, यशोदा जी का मुख हँसी से खिल उठता (प्रहसितमुखी)। वे उसे डांटने की इच्छा ही नहीं कर पातीं।

विवेचन: यह 'वात्सल्य रस' की पराकाष्ठा है। भगवान का ऐश्वर्य (ब्रह्मांड नायक होना) यहाँ यशोदा के वात्सल्य (पुत्र प्रेम) से हार जाता है। यशोदा जी की हँसी यह बताती है कि वे जानती हैं कि उनका पुत्र नटखट है, लेकिन वह नटखटपन ही तो उसका सौंदर्य है।

8. सामाजिक एवं व्यावहारिक संदेश

माखन चोरी लीला के माध्यम से भगवान ने कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक मूल्य स्थापित किए:

तत्व संदेश
मंडली (सखा) ईश्वर अकेले आनंद नहीं लेते। वे 'सामूहिकता' में विश्वास रखते हैं। वे अपने ग्वाल-बालों के साथ मिलकर 'प्रसाद' ग्रहण करते हैं।
समता वे ऊंच-नीच का भेद नहीं करते। वे गरीब-अमीर हर गोपी के घर जाते हैं, जो उन्हें प्रेम से पुकारती है।
भय मुक्ति वे यशोदा मैया के सामने डरने का अभिनय करते हैं, यह दर्शाने के लिए कि 'प्रेम' के सामने 'ऐश्वर्य' और 'शक्ति' झुक जाती है।

9. उलूखल बंधन (दामोदर लीला): चोरी का परिणाम

माखन चोरी लीला का चरमोत्कर्ष 'दामोदर लीला' में होता है। जब यशोदा माता कृष्ण को चोरी करते पकड़ लेती हैं और उन्हें ओखल से बांधने का प्रयास करती हैं।

रहस्य: भगवान की कमर को बांधने वाली रस्सी हमेशा 'दो अंगुल' छोटी पड़ जाती थी।

  • पहला अंगुल: भक्त का 'परिश्रम' (साधना)।
  • दूसरा अंगुल: भगवान की 'कृपा'।

जब तक जीव में थोड़ा भी अहंकार रहता है कि "मैं भगवान को बांध लूँगा", तब तक वे नहीं बंधते। जैसे ही यशोदा मैया थक गईं (अहंकार शून्य हुआ), कृष्ण कृपावश बंध गए।

निष्कर्ष: माखन चोरी का परम रहस्य

श्रीमद्भागवत के इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण साधारण चोर नहीं, बल्कि 'नवनीत-चोर' और 'चित्त-चोर' हैं। वे चुराकर संग्रह नहीं करते, बल्कि वानरों (भक्तों) में बाँट देते हैं।

यह लीला सिखाती है कि संसार (दूध-दही) को मथने के बाद जो सार (माखन) निकलता है, ईश्वर केवल उसी का भोग करते हैं। यह सार है—भक्त का शुद्ध प्रेम।

इस प्रकार, श्रीमद्भागवत की यह कथा केवल बाल-क्रीड़ा नहीं, अपितु "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" का बाल-सुलभ संस्करण है, जहाँ भगवान जबरदस्ती भक्त के हृदय में घुसकर उसके 'मैं' और 'मेरे' (अहंकार रूपी माखन) को चुरा लेते हैं।

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