संसार के लोग व्यक्ति का सम्मान उसकी संपत्ति, पद, और प्रतिष्ठा को देखकर करते हैं। परंतु ईश्वर का मापदंड इस संसार से सर्वथा भिन्न है। भगवान के नेत्रों में महलों का राजसी वैभव और एक टूटी हुई झोपड़ी का फूस दोनों समान हैं, यदि वहाँ 'भक्ति' का निवास है। विदेहराज जनक की पवित्र नगरी 'मिथिला' में दो ऐसे महान भक्त रहते थे, जिनकी बाहरी अवस्था एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत थी, परंतु उनके हृदय का भाव एक समान था। इनमें से एक थे मिथिला के परम ऐश्वर्यशाली चक्रवर्ती सम्राट 'बहुलाश्व' और दूसरे थे अत्यंत निर्धन, भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने वाले ब्राह्मण 'श्रुतदेव'। इन दोनों भक्तों की लालसा पूरी करने के लिए द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत अलौकिक लीला रची।
विदेह वंश के राजा बहुलाश्व अत्यंत धर्मनिष्ठ और ज्ञानी थे। उनके पास अपार धन, वैभव, विशाल सेना और महलों का सुख था, परंतु वे इस सबसे अनासक्त (Detached) थे। उनका मन राजकाज में कम और भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में अधिक रमता था।
उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहते थे, जिनका नाम था श्रुतदेव। श्रुतदेव इतने निर्धन थे कि उनके पास कल के लिए भोजन का प्रबंध भी नहीं होता था। वे केवल उतनी ही भिक्षा लेते थे, जिससे दिनभर का काम चल जाए। यदि किसी दिन भिक्षा न मिलती, तो वे जल पीकर ही भगवान के भजन में मग्न रहते। उनके पास रहने के लिए एक फूस की झोपड़ी थी, परंतु उनका हृदय भगवान की भक्ति से इतना भरा हुआ था कि उन्हें इस संसार में किसी और वस्तु की कामना ही नहीं थी। राजा बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव— दोनों ही दिन-रात इसी प्रार्थना में लगे रहते थे कि "हे द्वारकाधीश! कभी तो हमारे घर पधारिए।"
भगवान श्रीकृष्ण सर्वज्ञ हैं। वे द्वारका में बैठे-बैठे अपने इन दोनों अनन्य भक्तों की पुकार सुन रहे थे। उन्होंने इन दोनों पर एक साथ कृपा करने और संसार को संतों की महिमा दिखाने का निश्चय किया।
भगवान श्रीकृष्ण अपने रथ पर सवार हुए और उन्होंने अपने साथ महर्षि वेदव्यास, देवर्षि नारद, परशुराम, शुकदेव जी, असित, देवल और अत्रि जैसे परम ज्ञानी और तपस्वी महर्षियों को भी बिठा लिया। भगवान का यह विशाल काफिला द्वारका से मिथिला की ओर चल पड़ा। मार्ग में जहाँ-जहाँ से यह मंडली गुज़रती, वहाँ के नर-नारी भगवान और संतों के दर्शन पाकर धन्य हो जाते।
जब भगवान श्रीकृष्ण संतों की मंडली के साथ मिथिला की सीमा में पहुँचे, तो पूरे नगर में आनंद की लहर दौड़ गई। नागरिक अपने हाथों में पूजा की थालियां लेकर भगवान के स्वागत के लिए दौड़ पड़े।
राजा बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव, दोनों भागते हुए भगवान के रथ के पास पहुँचे और दोनों ने एक ही समय पर भगवान के चरणों में गिरकर साष्टांग प्रणाम किया। दोनों के नेत्रों से प्रेम के अश्रु बह रहे थे। दोनों ने एक साथ हाथ जोड़कर प्रार्थना की— "हे प्रभो! हे कृपानिधान! आज मेरे घर पधारकर मुझे कृतार्थ कीजिए।"
उभाभ्यां सह तद्गेहान् विवेश पृथगेव हि ॥
(श्रीमद्भागवत 10.86.26)
राजा बहुलाश्व के महल में प्रवेश करते ही मानो उत्सव शुरू हो गया। राजा ने भगवान और सभी ऋषि-मुनियों को स्वर्ण और मणियों से जड़े हुए अत्यंत कीमती सिंहासनों पर विराजमान किया। राजा बहुलाश्व ने स्वयं अपने हाथों से भगवान श्रीकृष्ण और सभी संतों के चरण धोए और उस चरणामृत को अपने पूरे परिवार सहित सिर पर धारण किया।
राजा ने चंदन, पुष्प, सुगंधित धूप, दीप और नाना प्रकार के रत्नों से भगवान की आरती उतारी। छप्पन भोग और अनेक प्रकार के अमृत-समान व्यंजन परोसे गए। राजा बहुलाश्व ने भगवान के चरणों को अपने हाथों से दबाते हुए गदगद कंठ से स्तुति की— "हे सर्वेश्वर! आप तो केवल प्रेम के वशीभूत होकर ही दर्शन देते हैं। आज मेरा यह राज्य, मेरा जीवन और यह देह सब पवित्र हो गए। हे प्रभो! मुझे और मेरे इस राज्य को आप अपने दासों का भी दास स्वीकार कर लें।"
उसी क्षण, भगवान का दूसरा स्वरूप महर्षियों के साथ निर्धन ब्राह्मण श्रुतदेव की फूस की झोपड़ी में पहुँच चुका था। जब श्रुतदेव ने देखा कि साक्षात त्रिलोकीनाथ और ब्रह्मांड के सबसे बड़े महर्षि उनकी छोटी सी झोपड़ी में पधारे हैं, तो वे खुशी के मारे सुध-बुध खो बैठे।
उनके पास संतों को बैठाने के लिए सिंहासन तो क्या, एक ढंग का कपड़ा भी नहीं था। उन्होंने अपनी झोपड़ी से घास-फूस की पुरानी चटाइयाँ निकालीं और उन्हें ही बिछाकर भगवान और संतों को बैठाया। वे আনন্দে इतने विभोर हो गए कि अपना फटा हुआ उत्तरीय (कंधे का कपड़ा) हवा में घुमाते हुए भगवान के सामने पागलों की तरह नाचने लगे।
श्रुतदेव की पत्नी ने एक मिट्टी के बर्तन (कलश) में जल लाकर दिया। श्रुतदेव ने उसी मिट्टी के बर्तन से भगवान और संतों के चरण धोए और उस जल से अपनी झोपड़ी को नहला दिया। उनके पास छप्पन भोग नहीं थे; वे जंगल से थोड़े से कंद-मूल, जंगली फल और तुलसी दल लेकर आए थे। उन्होंने वही सूखे फल और एक लोटा जल अत्यंत श्रद्धा से भगवान को अर्पित कर दिया।
भगवान ने उन सूखे फलों को ऐसे स्वाद से खाया मानो वे देवलोक का अमृत हों। श्रुतदेव ने भगवान के चरणों में गिरकर कहा— "प्रभो! मैं आपको क्या दूँ? मेरा तो यह मन भी मेरा नहीं है, यह भी आपका ही है। आज आपने इस निर्धन की कुटिया को वैकुंठ बना दिया।"
भगवान श्रीकृष्ण ने राजा बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव दोनों को ही एक अत्यंत गूढ़ उपदेश दिया। भगवान ने कहा— "हे श्रुतदेव! हे बहुलाश्व! ये जो महर्षि मेरे साथ आए हैं, ये स्वयं चलते-फिरते तीर्थ हैं। तुम इन ब्राह्मणों और संतों की सेवा करो, क्योंकि संतों के हृदय में ही मेरा वास्तविक निवास होता है। जो मनुष्य इन संतों और ब्राह्मणों को मेरा ही स्वरूप मानकर पूजता है, वह मुझे ही प्राप्त कर लेता है।"
कुछ दिन तक भगवान अपनी योगमाया के प्रभाव से दोनों घरों में एक साथ निवास करते रहे। उन्होंने राजा को उसके राजसी वैभव के बीच अनासक्ति (Detachment) का ज्ञान दिया और ब्राह्मण श्रुतदेव को उसकी निर्धनता के बीच पूर्ण संतोष का आशीर्वाद दिया। जाते समय भगवान ने दोनों को अपनी 'सायुज्य मुक्ति' (परम धाम) का वरदान दिया और दोनों को ही एक समान आनंद से भर दिया।
श्रीमद्भागवत की यह 'मिथिला यात्रा' की कथा वेदांत दर्शन के 'समभाव' (Equanimity) को सिद्ध करती है। ईश्वर के दरबार में 'पदार्थ' (Matter) की कोई कीमत नहीं है, वहाँ केवल 'परमार्थ' (Spiritual Love) देखा जाता है। बहुलाश्व ने स्वर्ण के सिंहासन दिए और श्रुतदेव ने घास की चटाई दी, परंतु दोनों में जो 'प्रेम का तत्व' था, वह बिल्कुल बराबर था। इसलिए भगवान ने दोनों के लिए स्वयं को दो रूपों में बांट लिया, ताकि किसी का भी प्रेम अधूरा न रहे। यह कथा सिखाती है कि हम जिस भी स्थिति (अमीर या गरीब) में हैं, यदि हमारा हृदय निष्कपट है, तो भगवान वहाँ आने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

