Subhadra Haran Katha: Arjun Aur Subhadra Ka Vivah (Bhagwat Puran)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

सुभद्रा हरण: अर्जुन और सुभद्रा का विवाह तथा भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत कूटनीति

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 86)

महाभारत और श्रीमद्भागवत महापुराण की कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की मित्रता (नर-नारायण का संबंध) सबसे पवित्र और गहरी मानी गई है। भगवान श्रीकृष्ण के लिए अर्जुन केवल एक भक्त या सखा नहीं थे, बल्कि वे उनके हृदय का अंश थे। यही कारण है कि जब श्रीकृष्ण की छोटी बहन 'सुभद्रा' के विवाह का प्रश्न उठा, तो श्रीकृष्ण ने अपने सबसे प्रिय सखा अर्जुन को ही इस योग्य समझा। परंतु इस विवाह में एक बहुत बड़ी बाधा थी— दाऊ भैया (बलराम जी), जो सुभद्रा का विवाह अपने प्रिय शिष्य दुर्योधन से करना चाहते थे। आइए जानते हैं कि भगवान ने अर्जुन को 'संन्यासी' बनाकर और सुभद्रा का 'हरण' करवाकर यह अद्भुत लीला कैसे रची।

1. अर्जुन का वनवास और सुभद्रा के रूप की चर्चा

एक बार अर्जुन किसी नियम के उल्लंघन के कारण बारह वर्ष के लिए तीर्थयात्रा (वनवास) पर थे। अपनी इस यात्रा के दौरान वे घूमते हुए 'प्रभास क्षेत्र' (गुजरात) पहुँचे। वहाँ उन्होंने लोगों से भगवान श्रीकृष्ण की छोटी बहन 'सुभद्रा' के अलौकिक रूप, लावण्य और गुणों की बहुत प्रशंसा सुनी। लोगों के मुख से सुभद्रा की प्रशंसा सुनकर अर्जुन के मन में उन्हें अपनी जीवनसंगिनी बनाने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई।

परंतु उसी समय अर्जुन को यह भी पता चला कि बलराम जी (दाऊ भैया) सुभद्रा का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार दुर्योधन से करना चाहते हैं। यह सुनकर अर्जुन निराश हो गए, क्योंकि दाऊ भैया के निर्णय को बदलने का साहस किसी में नहीं था। तब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। सर्वज्ञ भगवान सब समझ गए और उन्होंने अर्जुन को एक गुप्त संदेश भेजा।

2. संन्यासी (यति) का वेश और द्वारका में प्रवेश

श्रीकृष्ण की सलाह के अनुसार, अर्जुन ने एक 'त्रिदण्डी संन्यासी' (यति) का वेश धारण कर लिया। उन्होंने अपने शरीर पर भस्म रमा ली, सिर पर जटाएं बांध लीं, हाथ में कमंडल और दंड ले लिया और प्रभास क्षेत्र में एक पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठ गए।

॥ अर्जुन का संन्यासी वेश ॥
तद्दिदृक्षुः प्रयुञ्जानः संन्यासाश्रमलक्षणम् ।
त्रिदण्डी द्वारकामेत्य उवास वार्षिकीः समाः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.86.4)
अर्थ: सुभद्रा के दर्शन की इच्छा से अर्जुन ने संन्यासियों (त्रिदण्डी यति) का वेश धारण कर लिया और द्वारका के निकट आकर चातुर्मास्य का व्रत करने के बहाने ध्यान मग्न होकर बैठ गए।

जब बलराम जी को पता चला कि प्रभास तीर्थ में एक अत्यंत सिद्ध और तेजस्वी संन्यासी पधारे हैं, तो वे स्वयं उनके दर्शन करने गए। अर्जुन के उस शांत और तेजस्वी रूप को देखकर सीधे-सादे दाऊ भैया अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने उस 'संन्यासी' को प्रणाम किया और अत्यंत आदरपूर्वक उन्हें द्वारका के राजमहल में चातुर्मास्य बिताने का निमंत्रण दिया। अर्जुन तो यही चाहते थे, उन्होंने मौन रहकर स्वीकृति दे दी।

3. सुभद्रा का सेवा में आना और प्रेम का अंकुरण

राजमहल में बलराम जी ने सुभद्रा को उस 'संन्यासी' की सेवा का भार सौंप दिया। सुभद्रा प्रतिदिन अर्जुन (संन्यासी) के लिए भोजन लाती और उनकी सेवा करती। सुभद्रा के उस अनिन्द्य सौंदर्य को देखकर अर्जुन मोहित हो गए।

दूसरी ओर, भगवान श्रीकृष्ण तो सारी लीला जानते थे। वे बीच-बीच में उस संन्यासी के पास आते और मुस्कुराकर रहस्यमयी बातें करते। धीरे-धीरे सुभद्रा को भी यह आभास होने लगा कि यह कोई साधारण संन्यासी नहीं, बल्कि महान धनुर्धर अर्जुन हैं (क्योंकि सुभद्रा भी अर्जुन के पराक्रम से अत्यंत प्रभावित थीं)। जब सुभद्रा को अर्जुन की वास्तविकता का पता चला, तो उनका हृदय भी अर्जुन को पति रूप में स्वीकार कर चुका था।

एक दिन एकांत पाकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा— "सखा! दाऊ भैया किसी भी कीमत पर सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करने का हठ पकड़े हुए हैं। यदि तुम सुभद्रा को चाहते हो, तो क्षत्रिय धर्म के अनुसार तुम्हें उसका 'हरण' करना होगा। मैं और मेरे माता-पिता इस कार्य में तुम्हारे साथ हैं।"
4. रैवतक पर्वत का उत्सव और सुभद्रा का 'हरण'

कुछ दिनों बाद, द्वारकावासियों ने 'रैवतक पर्वत' पर एक विशाल उत्सव (मेला) का आयोजन किया। सभी यदुवंशी उस उत्सव में गए हुए थे। सुभद्रा भी सज-धज कर भगवान शिव की पूजा करने के लिए रथ पर सवार होकर निकलीं। यही वह अवसर था जिसकी अर्जुन प्रतीक्षा कर रहे थे।

भगवान श्रीकृष्ण ने पहले से ही अपना रथ (जिसमें शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नाम के चार दिव्य घोड़े जुते थे) अर्जुन के लिए तैयार रखा था। जैसे ही सुभद्रा का रथ किले से बाहर आया, अर्जुन ने संन्यासी का वेश उतार फेंका और अपने असली क्षत्रिय रूप में आ गए। उन्होंने अपना 'गांडीव' धनुष उठाया और सुभद्रा को अपने रथ पर बैठा लिया।

एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना: जब द्वारका के सैनिकों ने देखा कि एक व्यक्ति सुभद्रा का हरण कर रहा है, तो उन्होंने अर्जुन पर आक्रमण कर दिया। उस समय सुभद्रा ने अत्यंत साहस और क्षत्राणी धर्म का परिचय दिया। सुभद्रा ने स्वयं अर्जुन के रथ की रास (लगाम) थाम ली और सारथी बन गईं, ताकि अर्जुन स्वतंत्रतापूर्वक यादव सैनिकों का सामना कर सकें। अर्जुन ने बिना किसी को मारे, खेल-खेल में द्वारका की सेना को तितर-बितर कर दिया और रथ इंद्रप्रस्थ की ओर दौड़ा दिया।

5. दाऊ भैया का भयंकर क्रोध और श्रीकृष्ण की कूटनीति

जब यह समाचार रैवतक पर्वत पर बलराम जी तक पहुँचा कि उस 'पाखंडी संन्यासी' ने सुभद्रा का हरण कर लिया है, तो वे क्रोध से आगबबूला हो गए। उन्होंने अपना हल और मूसल उठा लिया और गरजे— "पांडवों का इतना दुस्साहस! मैं अभी इंद्रप्रस्थ को उखाड़कर समुद्र में फेंक दूँगा!"

सभी यदुवंशी युद्ध के लिए तैयार हो गए। तब भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत शांति से आगे आए और उन्होंने दाऊ भैया के चरण पकड़कर उन्हें एक अत्यंत तार्किक और धर्मसम्मत बात समझाई:

॥ श्रीकृष्ण का तर्क ॥
क्षत्रियस्य हि शूरस्य हरणं धर्म उच्यते ।
प्रसह्य कन्यां यो हरेत् स वै वीरः प्रशस्यते ॥
(महाभारत और भागवत के भाव पर आधारित)
अर्थ: श्रीकृष्ण ने कहा— "हे दाऊ भैया! अर्जुन ने हमारा अपमान नहीं किया है, बल्कि क्षत्रिय धर्म का पालन किया है। क्षत्रियों में बलपूर्वक कन्या का हरण करके विवाह करना श्रेष्ठ माना गया है। अर्जुन जानता था कि हम सुभद्रा उसे दान में नहीं देंगे, और एक वीर क्षत्रिय दान में दी गई कन्या को स्वीकार नहीं करता।"

श्रीकृष्ण ने आगे समझाया— "हे भैया! अर्जुन कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। वह भरतवंश का सर्वश्रेष्ठ रत्न है, इंद्र का पुत्र है और तीनों लोकों का अजेय धनुर्धर है। हमारी बहन सुभद्रा के लिए उससे योग्य वर तीनों लोकों में नहीं है। यदि हम उससे युद्ध करेंगे और हार गए, तो हमारा ही यश कम होगा। इसलिए क्रोध त्यागिए और इस संबंध को सहर्ष स्वीकार कर लीजिए।"

6. भव्य विवाह और इंद्रप्रस्थ में स्वागत

श्रीकृष्ण के तर्कों को सुनकर और यह जानकर कि सुभद्रा स्वयं भी अर्जुन को चाहती है, बलराम जी का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा— "कान्हा! तेरी माया तू ही जाने।"

बलराम जी और अन्य यदुवंशियों ने विशाल संपत्ति, हाथी, घोड़े, रथ, बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण लेकर अर्जुन के पास भेजे। उन्होंने पूर्ण विधि-विधान और धूमधाम के साथ सुभद्रा और अर्जुन का विवाह संपन्न कराया।

जब अर्जुन सुभद्रा को लेकर इंद्रप्रस्थ पहुँचे, तो महारानी द्रौपदी को यह देखकर थोड़ा क्षोभ हुआ कि अर्जुन एक और पत्नी लेकर आए हैं। परंतु सुभद्रा अत्यंत बुद्धिमती थीं। उन्होंने राजसी वस्त्र त्याग दिए और एक साधारण दासी का वेश बनाकर द्रौपदी के पास गईं। सुभद्रा ने द्रौपदी के चरण छूकर कहा— "हे दीदी! मैं आपकी छोटी बहन और दासी बनकर आई हूँ।" सुभद्रा की इस नम्रता ने द्रौपदी का हृदय जीत लिया और उन्होंने सुभद्रा को गले लगा लिया। (इन्हीं सुभद्रा और अर्जुन से आगे चलकर परम वीर 'अभिमन्यु' का जन्म हुआ)।

कथा का संदेश

सुभद्रा हरण की यह कथा भगवान श्रीकृष्ण की उस नीति को दर्शाती है जहाँ वे 'प्रेम' और 'धर्म' की रक्षा के लिए सामाजिक नियमों को भी मोड़ देते हैं। यह कथा यह भी सिखाती है कि सुभद्रा की भांति, एक स्त्री को संकट के समय स्वयं रथ की बागडोर (नेतृत्व) संभालने का साहस रखना चाहिए, और द्रौपदी के सामने दासी बनने की विनम्रता भी होनी चाहिए। यही सुभद्रा के चरित्र की महानता है।

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