महामहोपाध्याय वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर: आधुनिक काल के 'दर्शन-मार्तण्ड', नव्य-न्याय के धुरीण और अद्वैत के रक्षक
परंपरा और आधुनिकता के सेतु-पुरुष का तार्किक और दार्शनिक मूल्यांकन (A Scholarly Treatise on M.M. Vasudev Shastri Abhyankar)
- 1. प्रस्तावना: पुणे की विद्वत् परंपरा का सूर्य
- 2. जीवन परिचय: गुरु-शिष्य परंपरा और फर्ग्यूसन कॉलेज
- 3. 'अद्वैतमोद': विशिष्टाद्वैत और द्वैत का तार्किक खंडन
- 4. धर्मतत्वनिर्णय: समाज सुधार का शास्त्र-सम्मत तर्क
- 5. टीका साहित्य: सूत्रभाष्य और सर्वदर्शनसंग्रह की नवीन दृष्टि
- 6. तिलक बनाम अभ्यंकर: कर्मयोग और संन्यास का शास्त्रार्थ
- 7. प्रभाव और निष्कर्ष: संस्कृत पांडित्य का अंतिम अध्याय
19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में, जब भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार हो रहा था और प्राचीन 'शास्त्रीय परंपरा' (Traditional Scholarship) लुप्त होने के कगार पर थी, तब पुणे में एक ऐसे विद्वान का उदय हुआ जो ज्ञान के हिमालय थे। वे थे—महामहोपाध्याय वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर (Vasudev Shastri Abhyankar)।
वे केवल एक 'पंडित' नहीं थे, बल्कि एक गंभीर दार्शनिक (Philosopher) थे जिन्होंने नव्य-न्याय (Navya-Nyaya) की कठिनतम शब्दावली का प्रयोग करके अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) की रक्षा की। उनका ग्रंथ 'अद्वैतमोद' (Advaitamoda) आधुनिक काल में लिखा गया संस्कृत का एक ऐसा मौलिक ग्रंथ है जो प्राचीन आचार्यों (जैसे श्रीहर्ष या चित्सुख) की याद दिलाता है।
| पूरा नाम | वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर (Vasudev Shastri Abhyankar) |
| उपाधि | महामहोपाध्याय (ब्रिटिश सरकार द्वारा, 1921), विद्वद्रत्न |
| काल | 1863 – 1942 ईस्वी (पुणे, महाराष्ट्र) |
| गुरु परंपरा | राम शास्त्री आप्टे (न्याय), बाल शास्त्री रानडे, भास्कर शास्त्री ओक |
| दार्शनिक मत | केवलाद्वैत वेदांत (शांकर मत) और नव्य-न्याय |
| प्रमुख ग्रंथ (मौलिक) | अद्वैतमोद (Advaitamoda), धर्मतत्वनिर्णय, कायशुद्धि |
| प्रमुख टीकाएँ | श्रीभाष्य (रामानुज) की समीक्षा, सर्वदर्शनसंग्रह, मीमांसान्यायप्रकाश, सिद्धांतबिन्दु |
2. जीवन परिचय: गुरु-शिष्य परंपरा और फर्ग्यूसन कॉलेज
वासुदेव शास्त्री का जन्म सतारा (महाराष्ट्र) के एक कुलीन कोकणस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा पुणे की पारंपरिक पाठशालाओं में हुई। उनके गुरु राम शास्त्री आप्टे उस समय के 'न्याय-पंचानन' माने जाते थे। वासुदेव शास्त्री ने उनसे 'गदाधरी' और 'जागदीशी' (नव्य-न्याय के अत्यंत कठिन ग्रंथ) का अध्ययन किया।
उनकी विद्वता इतनी प्रसिद्ध थी कि लोकमान्य तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेता उनका सम्मान करते थे। बिना अंग्रेजी शिक्षा के भी, उन्हें प्रतिष्ठित फर्ग्यूसन कॉलेज (Fergusson College) में संस्कृत का प्रोफेसर नियुक्त किया गया। वे कक्षा में पारंपरिक वेशभूषा (पगड़ी, अंगरखा) में जाते थे और छात्रों को पाणिनी और शंकराचार्य के सूत्रों का ऐसा तार्किक विश्लेषण देते थे कि आधुनिक छात्र मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
3. 'अद्वैतमोद': विशिष्टाद्वैत और द्वैत का तार्किक खंडन
वासुदेव शास्त्री का सबसे महान दार्शनिक योगदान उनका ग्रंथ 'अद्वैतमोद' (Advaitamoda - Delight of Non-dualism) है। यह ग्रंथ उन्होंने रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत) और मध्वाचार्य (द्वैत) के उन तर्कों का उत्तर देने के लिए लिखा था जो उन्होंने शंकराचार्य के 'मायावाद' के विरुद्ध दिए थे।
माया का तार्किक समर्थन (Defense of Maya)
रामानुज आदि आचार्यों का तर्क था कि "ब्रह्म (सत्य) में माया (मिथ्या) कैसे रह सकती है? और यदि माया है, तो ब्रह्म अद्वैत कैसे रहा?"
वासुदेव शास्त्री ने 'सदसदविलक्षण' (Indeterminable as Real or Unreal) के तर्क का प्रयोग किया।
अनिर्वचनीया सा तु, ज्ञाननाशे ततिक्षयः॥" अर्थ: (सिद्धांत) माया न तो 'सत्' (Real - ब्रह्म की तरह) है, न ही 'असत्' (Unreal - खरगोश के सींग की तरह)। वह इन दोनों से विलक्षण (अनिर्वचनीय) है। वह केवल अज्ञान दशा में प्रतीत होती है और ज्ञान होते ही नष्ट हो जाती है। अतः वह ब्रह्म की 'अद्वैतता' को खंडित नहीं करती।
उन्होंने नव्य-न्याय की भाषा (अवच्छेदक-अवच्छेद्य भाव) का प्रयोग करके सिद्ध किया कि 'भेद' (Difference) वास्तविक नहीं हो सकता, क्योंकि भेद को सिद्ध करने के लिए भी 'अभेद' (Identity) का आश्रय लेना पड़ता है।
4. धर्मतत्वनिर्णय: समाज सुधार का शास्त्र-सम्मत तर्क
वासुदेव शास्त्री केवल शुष्क तार्किक नहीं थे, वे एक समाज सुधारक भी थे, लेकिन 'शास्त्र' के दायरे में रहकर। उनका ग्रंथ 'धर्मतत्वनिर्णय' इसका प्रमाण है।
- समुद्र-यात्रा (Sea Voyage): उस समय समुद्र पार करने को धर्म-विरुद्ध माना जाता था। शास्त्री जी ने 'बौधायन धर्मसूत्र' और अन्य स्मृतियों का हवाला देकर सिद्ध किया कि यह निषेध केवल 'कलिवर्ज्य' (कलयुग के लिए विशेष निषेध) नहीं, बल्कि देश-काल के अनुसार बदल सकता है।
- शुद्धि आंदोलन: उन्होंने धर्म-परिवर्तित लोगों को वापस हिंदू धर्म में लेने के लिए 'प्रायश्चित' के तार्किक विधान बताए।
- अस्पृश्यता: उन्होंने सिद्ध किया कि जन्मना अस्पृश्यता का वेदों में कोई दृढ़ आधार नहीं है।
5. टीका साहित्य: सूत्रभाष्य और सर्वदर्शनसंग्रह की नवीन दृष्टि
शास्त्री जी ने माधवाचार्य के 'सर्वदर्शनसंग्रह' (Compendium of All Philosophies) पर एक विद्वतापूर्ण टीका लिखी।
योगदान:
इस टीका में उन्होंने 'लोकायत' (चार्वाक) से लेकर 'शांकर वेदांत' तक के 16 दर्शनों की गुत्थियों को सुलझाया। विशेष रूप से, उन्होंने 'शून्यवाद' (बौद्ध) और 'अद्वैत' के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट किया, जिसे लेकर अक्सर भ्रम रहता था।
\27A4 "बौद्धों का शून्य 'निषेध-मुख' (Negative) है, जबकि वेदांत का ब्रह्म 'विधि-मुख' (Positive - सत्-चित्-आनंद) है।"
6. तिलक बनाम अभ्यंकर: कर्मयोग और संन्यास का शास्त्रार्थ
यह 20वीं सदी की शुरुआत का सबसे प्रसिद्ध बौद्धिक द्वंद्व था।
लोकमान्य तिलक ने 'गीतारहस्य' में सिद्ध किया कि गीता का मुख्य संदेश 'कर्मयोग' है और ज्ञानी को भी मृत्युपर्यंत कर्म करना चाहिए।
वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर (कट्टर शांकर वेदांती) का मत था कि कर्म केवल 'चित्त-शुद्धि' के लिए है। ज्ञान प्राप्ति के बाद 'सर्व-कर्म-संन्यास' ही एकमात्र मार्ग है।
बावजूद इस मतभेद के, तिलक जब भी किसी संस्कृत श्लोक के अर्थ में अटकते थे, तो वे वासुदेव शास्त्री के पास ही मार्गदर्शन के लिए जाते थे। यह उस युग की बौद्धिक ईमानदारी (Intellectual Honesty) थी।
7. प्रभाव और निष्कर्ष: संस्कृत पांडित्य का अंतिम अध्याय
1942 में जब महामहोपाध्याय वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर का निधन हुआ, तो विद्वानों ने कहा—"नव्य-न्याय का सूर्य अस्त हो गया।"
उनके पुत्र काशीनाथ वासुदेव अभ्यंकर (K.V. Abhyankar) ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया और 'महाभाष्य' का संपादन किया।
अभ्यंकराचार्य का जीवन सिद्ध करता है कि तर्कशास्त्र (Logic) का उपयोग केवल वितंडा (बहस) के लिए नहीं, बल्कि सत्य की स्थापना और समाज के मार्गदर्शन के लिए होना चाहिए। वे उस परंपरा की अंतिम कड़ी थे जहाँ एक विद्वान एक साथ व्याकरण, न्याय, मीमांसा और वेदांत—चारों में पारंगत होता था। उनका 'अद्वैतमोद' आज भी संस्कृत के छात्रों के लिए तर्क का आदर्श ग्रंथ है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- अद्वैतमोद - म.म. वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर (आनंदाश्रम मुद्रणालय, पुणे)।
- सर्वदर्शनसंग्रह (अभ्यंकर कृत टीका सहित) - भण्डारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट।
- धर्मतत्वनिर्णय - वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर।
- Studies in Indian Philosophy - (Edited works by K.V. Abhyankar).
- पुणे की विद्वत परंपरा - एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण।
