Apahij Major General Ka Hashr: एक सत्य घटना जो रूह कंपा दे (True Story)

Sooraj Krishna Shastri
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अपाहिज बूढ़े मेजर जनरल का हश्र

"एक सत्य घटना जो आपकी रूह कंपा देगी"

यह कहानी एक रिटायर्ड मेजर जनरल की है, जो बुढ़ापे में चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हो चुके थे। बेटों ने पिता की सुविधा के नाम पर घर के एक कमरे में फर्श पर गद्दा लगवा दिया और उनकी देखभाल के लिए एक नौकर रख दिया।

बेटों की नई-नई शादियां हुई थीं। सभी ने गर्मी की छुट्टियाँ विदेश में बिताने का प्लान बनाया। किसी ने फ्रांस, किसी ने लंदन तो किसी ने पेरिस। हर जगह वे अपना परिचय बड़े गर्व से देते थे—"हम मेजर जनरल के बेटे हैं।"

जाते समय बेटों ने नौकर को चेतावनी दी:
"हम तीन महीने बाद वापस आएंगे। तुम बाबा का पूरा ख्याल रखना, वक्त पर खाना देना। हमें कोई शिकायत नहीं मिलनी चाहिए।"
नौकर: "जी साहब! आप बेफिक्र रहें।"

एक ताला और तीन महीने की सजा

बेटे और बहुएँ चले गए। वह बूढ़ा पिता कमरे में अकेला लेटा छत को निहारता रहा। न वह खुद उठ सकता था, न अपनी मर्जी से पानी मांग सकता था।

कुछ दिन बाद, नौकर ने घर के मुख्य दरवाजे को ताला लगाया और मेजर साहब के कमरे को भी बाहर से लॉक कर दिया। उसने सोचा कि वह बाजार से ब्रेड लेकर अभी वापस आ जाएगा, इसलिए चाबी साथ ले गया।

तक़दीर का क्रूर खेल:
बाजार जाते वक्त नौकर का भयानक एक्सीडेंट हो गया। लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया, जहाँ वह कोमा (Coma) में चला गया। दुर्भाग्यवश, वह कभी होश में नहीं आ सका।

बेटे नौकर को सिर्फ 'बाप के कमरे' की चाबी देकर गए थे और बाकी पूरे घर की चाबियाँ अपने साथ ले गए थे। अब वह नौकर भी कोमा में था और उसकी जेब में उस कमरे की चाबी थी, जहाँ एक लाचार पिता बंद था।

बंद कमरे का खौफनाक मंज़र

सोचिए उस मंज़र के बारे में... वह बूढ़ा मेजर जनरल, जो देश की रक्षा के लिए कभी सीना तान कर खड़ा रहता था, आज अपने ही घर में कैद था।

न कोई आवाज सुनने वाला, न कोई पानी देने वाला। भूख और प्यास से तड़पते हुए, बिस्तर पर ही मलमूत्र त्यागते हुए, उस पिता ने घुट-घुट कर दम तोड़ दिया। तीन महीने तक वह बंद कमरा एक कब्रगाह बना रहा।

तीन महीने बाद जब बेटे वापस लौटे और ताला तोड़ा गया, तो अंदर का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था। पिता की लाश सड़ चुकी थी और कंकाल में बदल गई थी।

समाज के लिए एक चेतावनी

यह घटना हमें आईना दिखा रही है। हम अपनी संतानों के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। नेकी और बदी की परवाह किए बिना धन-दौलत जमा करते हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके।

हम उन्हें बेहतरीन स्कूलों में महँगी 'भौतिक शिक्षा' तो दिलवाते हैं, लेकिन जीवन जीने के 'नैतिक संस्कार' देना भूल जाते हैं। हम मानवता, धर्म और सेवा भाव को समय की बर्बादी समझते हैं।


याद रखें: इंसान जो बोता है, वही काटता है।

सोचिए, कहीं हम भी अपनी औलाद को वही शिक्षा तो नहीं दे रहे, जो कल हमें उस मेजर जनरल जैसी स्थिति में पहुँचा दे? ईश्वर न करे किसी को यह दिन देखना पड़े।

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