प्रो. एस.पी. सिंह (सत्य प्रकाश सिंह): वैदिक प्रतीकों और चेतना के मनोवैज्ञानिक भाष्यकार
एक विस्तृत अकादमिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: आधुनिक भारत के वह मूर्धन्य विद्वान जिन्होंने वेदों के रहस्यों को 'डेप्थ साइकोलॉजी' (Depth Psychology) और 'पूर्ण योग' (Integral Yoga) की कसौटी पर कसकर सिद्ध किया कि वैदिक देवता मनुष्य की आंतरिक 'चेतना' के ही प्रतिरूप हैं। (The Philosopher of Vedic Consciousness)
- 1. प्रस्तावना: मनोविज्ञान और वेदों का ऐतिहासिक मिलन
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: वाराणसी से अलीगढ़ तक
- 3. 'वैदिक सिम्बोलिज्म' (Vedic Symbolism): प्रतीकों का रहस्य
- 4. 'चेतना और वास्तविकता की वैदिक दृष्टि' (Vedic Vision of Consciousness)
- 5. कार्ल जंग, श्री अरविंद और वैदिक योग का तुलनात्मक अध्ययन
- 6. 'यज्ञ' का मनोवैज्ञानिक अर्थ: आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया
- 7. वेद और तंत्र का समन्वय: अभिनवगुप्त के 'तंत्रालोक' का अनुवाद
- 8. निष्कर्ष: आधुनिक विज्ञान और प्राचीन मनीषा के सेतु
जब 19वीं और 20वीं सदी के यूरोपीय विद्वान वेदों का अध्ययन कर रहे थे, तो उन्होंने 'अग्नि', 'इंद्र', 'वरुण' और 'सूर्य' को केवल प्राकृतिक शक्तियों (Natural Forces) या आदिम मनुष्यों के डर से उत्पन्न हुए देवताओं के रूप में देखा। इसे Nature Myth Theory कहा गया। लेकिन भारतीय मनीषा जानती थी कि वेद का मूल 'चेतना' (Consciousness) में छिपा है।
महर्षि अरविंद (Sri Aurobindo) ने वेदों की इसी मनोवैज्ञानिक व्याख्या (Psychological Interpretation) का सूत्रपात किया था। श्री अरविंद के इस विशाल लेकिन कुछ हद तक गूढ़ दर्शन को विशुद्ध अकादमिक (Academic) और शास्त्रीय आधार प्रदान करने का जो महानतम कार्य किया, वह प्रोफेसर सत्य प्रकाश सिंह (Prof. S.P. Singh) के हिस्से आया। उन्होंने पश्चिमी मनोविज्ञान (विशेषकर कार्ल जंग) और भारतीय योग को एक ही मंच पर लाकर वेदों के 'प्रतीकवाद' (Symbolism) को दुनिया के सामने रखा।
| पूरा नाम | प्रोफेसर सत्य प्रकाश सिंह (Prof. Satya Prakash Singh) |
| जन्म एवं जीवन काल | जन्म: 1934 ई. (वाराणसी के निकट, उत्तर प्रदेश)। (उनका अकादमिक जीवन 20वीं सदी के उत्तरार्ध और 21वीं सदी के प्रारंभिक दशकों तक अत्यंत सक्रिय रहा है)। |
| शिक्षा | पीएच.डी. (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय - BHU), डी.लिट. (अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय - AMU) |
| अकादमिक पद | पूर्व अध्यक्ष (Sanskrit Department) एवं डीन (Faculty of Arts), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय। |
| महानतम कृतियाँ | Vedic Symbolism, Vedic Vision of Consciousness and Reality, Sri Aurobindo, Jung and Vedic Yoga. |
| दार्शनिक दृष्टिकोण | डेप्थ साइकोलॉजी (Depth Psychology), वैदिक और तांत्रिक योग का समन्वय। |
| प्रमुख सम्मान | गंगानाथ झा पुरस्कार, बाणभट्ट पुरस्कार, राजर्षि साहित्य पुरस्कार, स्वामी प्रणवानंद पुरस्कार (मनोविज्ञान)। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: वाराणसी से अलीगढ़ तक
प्रोफेसर सत्य प्रकाश सिंह का जन्म वर्ष 1934 में ज्ञान की नगरी वाराणसी (बनारस) के निकट हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव संस्कृत और दर्शन की ओर था। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा (Ph.D.) बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से पूरी की और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से डी.लिट. (D.Litt.) की सर्वोच्च उपाधि प्राप्त की।
अकादमिक यात्रा: उनका अधिकांश करियर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बीता, जहाँ उन्होंने एक व्याख्याता (Lecturer) से शुरुआत की और अपनी योग्यता के बल पर संस्कृत विभाग के अध्यक्ष (Chairman) और कला संकाय के डीन (Dean) के पद तक पहुँचे। 1994 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका शोध कार्य थमा नहीं। वे नई दिल्ली स्थित 'वैदिक रिसर्च सेंटर' के निदेशक और 'धर्म हिंदुजा इंटरनेशनल सेंटर ऑफ इंडिक रिसर्च' के प्रमुख रहे।
3. 'वैदिक सिम्बोलिज्म' (Vedic Symbolism): प्रतीकों का रहस्य
प्रो. एस.पी. सिंह की सर्वाधिक चर्चित पुस्तक "Vedic Symbolism" है। इस ग्रंथ में उन्होंने पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट्स के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि वैदिक भाषा आदिम (Primitive) है।
प्रो. सिंह के अनुसार, जब कोई ऋषि अत्यंत गहन ध्यानावस्था (Samadhi) में होता है, तो वह जिन ब्रह्मांडीय सत्यों का अनुभव करता है, उन्हें सामान्य भाषा में व्यक्त करना असंभव होता है। इसलिए वे 'प्रतीकों' (Symbols) का सहारा लेते हैं।
- गाय (Go): वेद में 'गाय' केवल एक पशु नहीं है, बल्कि यह 'प्रकाश की किरण' (Ray of Light) और 'ज्ञान' (Knowledge) का प्रतीक है। जब इंद्र 'गायों को गुफा से मुक्त कराते हैं', तो इसका मनोवैज्ञानिक अर्थ है—अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश को मुक्त कराना।
- अश्व (Horse): यह जीवन की प्राण-ऊर्जा (Vital Energy) और गति का प्रतीक है।
4. 'चेतना और वास्तविकता की वैदिक दृष्टि' (Vedic Vision of Consciousness)
भारत सरकार के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'History of Science, Philosophy and Culture in Indian Civilization' के तहत प्रो. सिंह ने "Vedic Vision of Consciousness and Reality" नामक एक विशाल खंड की रचना की।
इस कार्य में उन्होंने आधुनिक 'क्वांटम फिजिक्स' (Quantum Physics) और 'न्यूरोलॉजी' (Neurology) की पृष्ठभूमि में वेदों का अध्ययन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैदिक दर्शन के अनुसार 'चेतना' (Consciousness) केवल मस्तिष्क की रासायनिक प्रक्रिया (Chemical process of the brain) नहीं है, बल्कि चेतना ही वह मूल तत्व (Fundamental Reality) है जिससे यह संपूर्ण भौतिक ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ है। ऋग्वेद का 'नासदीय सूक्त' और 'अस्यवामीय सूक्त' (दीर्घतमा ऋषि) इसी परम चेतना का आख्यान हैं।
5. कार्ल जंग, श्री अरविंद और वैदिक योग का तुलनात्मक अध्ययन
प्रो. सिंह की एक और युगांतरकारी कृति है—"Sri Aurobindo, Jung and Vedic Yoga"। इस पुस्तक पर उन्हें मनोविज्ञान का प्रतिष्ठित 'स्वामी प्रणवानंद पुरस्कार' मिला था।
स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल जंग (Carl Jung) ने 'सामूहिक अचेतन' (Collective Unconscious) और 'आर्केटाइप्स' (Archetypes) का सिद्धांत दिया था। जंग का मानना था कि मनुष्य के भीतर कुछ जन्मजात मानसिक संरचनाएं होती हैं जो सपनों और मिथकों में प्रकट होती हैं।
प्रो. एस.पी. सिंह ने जंग के इस सिद्धांत की तुलना महर्षि अरविंद के 'अतिमानस' (Supermind) और वैदिक योग से की। उन्होंने सिद्ध किया कि कार्ल जंग जहाँ पहुँचकर रुक गए थे (अचेतन मन), वैदिक ऋषियों (जैसे विश्वामित्र, वसिष्ठ) ने उससे बहुत आगे 'सुपर-कॉन्शसनेस' (Super-consciousness) की यात्रा की थी। वैदिक देवता (इंद्र, अग्नि, सोम) वास्तव में इसी सर्वोच्च चेतना के 'आर्केटाइप्स' (Archetypes) हैं, जो साधक के भीतर मनोवैज्ञानिक शक्तियों के रूप में जागृत होते हैं।
6. 'यज्ञ' का मनोवैज्ञानिक अर्थ: आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया
कर्मकांडियों के लिए 'यज्ञ' अग्नि में घी और समिधा डालना है। लेकिन प्रो. सिंह ने वेदों के आधार पर यज्ञ का मनोवैज्ञानिक (Psychological) अर्थ स्पष्ट किया:
- यजमान (Yajamana): यह मनुष्य की 'आत्मा' (Soul) है।
- अग्नि (Agni): यह मनुष्य के भीतर की 'तपस्या' या 'ईश्वरीय संकल्प' (Divine Will) है।
- आहुति (Offering): यह हमारे भीतर के दुर्गुणों, अहंकार और अज्ञान को उसी आंतरिक अग्नि में भस्म करने (Self-Purification) की प्रक्रिया है।
इस प्रकार उन्होंने 'यज्ञ' को एक बाह्य कर्मकांड से उठाकर 'आंतरिक योग' (Inner Yoga) के धरातल पर प्रतिष्ठित कर दिया।
7. वेद और तंत्र का समन्वय: अभिनवगुप्त के 'तंत्रालोक' का अनुवाद
प्रो. सिंह केवल वैदिक विद्वान नहीं थे; उनका अधिकार कश्मीर शैव दर्शन (Kashmir Shaivism) पर भी था। अक्सर ऐसा माना जाता है कि वेद (श्रुति) और तंत्र (आगम) दो विपरीत विचारधाराएं हैं।
प्रो. सिंह ने स्वामी महेश्वरानंद के साथ मिलकर आचार्य अभिनवगुप्त के महान ग्रंथ "श्री तंत्रालोक" (Sri Tantraloka) का 9 खंडों में पहली बार संपूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया। इस भगीरथ कार्य के माध्यम से उन्होंने यह स्थापित किया कि तंत्र कोई अलग मार्ग नहीं है, बल्कि वह वैदिक ज्ञान (ज्ञान-कांड) की ही प्रायोगिक (Practical) और यौगिक (Yogic) परिणति है।
8. निष्कर्ष: आधुनिक विज्ञान और प्राचीन मनीषा के सेतु
प्रोफेसर सत्य प्रकाश सिंह (1934 - ) आधुनिक भारत के उन विरले 'दार्शनिक ऋषियों' में से एक हैं, जिन्होंने पश्चिमी मनोविज्ञान (Psychology) के तर्कों का उपयोग करके ही पश्चिमी इंडोलॉजी की सीमाओं को तोड़ा।
यदि महर्षि दयानंद ने वेदों में 'विज्ञान' देखा था, और प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल ने 'संस्कृति' देखी थी, तो प्रो. एस.पी. सिंह ने वेदों में 'मानव मस्तिष्क और चेतना का सबसे गहरा मानचित्र' (Map of Human Consciousness) देखा। आज यदि आधुनिक मनोवैज्ञानिक या क्वांटम वैज्ञानिक वेदों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तो इसका बहुत बड़ा श्रेय प्रो. एस.पी. सिंह के उस अकादमिक महायज्ञ को जाता है जिसने वेदों को 'डेप्थ साइकोलॉजी' के वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Vedic Symbolism - Prof. Satya Prakash Singh.
- Vedic Vision of Consciousness and Reality - Prof. Satya Prakash Singh (Project of History of Indian Science, Philosophy and Culture).
- Sri Aurobindo, Jung and Vedic Yoga - Prof. Satya Prakash Singh.
- Upanisadic Symbolism - Prof. Satya Prakash Singh.
- Life and Vision of Vedic Seers (Visvamitra, Dirghatamas, etc.) - Prof. Satya Prakash Singh.
