डॉ. उमेश चंद्र पांडेय: वैदिक गृह्य सूत्रों और धर्मशास्त्रों के महान अनुवादक एवं टीकाकार | Dr. Umesh Chandra Pandey

Sooraj Krishna Shastri
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डॉ. उमेश चंद्र पांडेय: वैदिक गृह्य सूत्रों और धर्मशास्त्रों के आधुनिक भाष्यकार

डॉ. उमेश चंद्र पांडेय: वैदिक गृह्य सूत्रों और धर्मशास्त्रों के महान अनुवादक एवं शोधकर्ता

एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: गोरखपुर विश्वविद्यालय के वह मूर्धन्य आचार्य जिन्होंने वेदों के 'गृहस्थ' और 'सामाजिक' विधानों (कल्पसूत्रों) को अत्यंत क्लिष्ट संस्कृत से निकालकर आम हिंदी पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ बनाया। (The Pioneer of Grihya Sutra Translation)

जब हम 'वेदों' की बात करते हैं, तो आम तौर पर हमारा ध्यान ऋग्वेद के देवताओं, उपनिषदों के गंभीर दर्शन, या ब्राह्मण ग्रंथों के विशाल 'श्रौत' यज्ञों (जैसे राजसूय या अश्वमेध) की ओर जाता है। लेकिन प्राचीन भारत का एक सामान्य मनुष्य अपना दैनिक जीवन कैसे जीता था? उसका विवाह कैसे होता था? बच्चों का नामकरण कैसे होता था? घर का निर्माण और अतिथियों का स्वागत कैसे किया जाता था?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर वेदों के जिस अंग में छिपा है, उसे 'गृह्य सूत्र' (Grihya Sutras) कहा जाता है। 20वीं सदी में इन अत्यंत प्राचीन और तकनीकी ग्रंथों का सबसे प्रामाणिक, विस्तृत और सुगम हिंदी अनुवाद करने वाले विद्वानों में डॉ. उमेश चंद्र पांडेय (Dr. Umesh Chandra Pandey) का नाम सर्वोच्च है। वाराणसी के प्रसिद्ध 'चौखम्बा प्रकाशन' (Chaukhamba Sanskrit Series) से प्रकाशित उनके ग्रंथों के बिना आज भारत के किसी भी विश्वविद्यालय में संस्कृत या प्राचीन इतिहास की पढ़ाई अधूरी मानी जाती है।

📌 डॉ. उमेश चंद्र पांडेय: एक अकादमिक प्रोफाइल
पूरा नाम डॉ. उमेश चंद्र पांडेय (Dr. Umesh Chandra Pandey)
सक्रिय जीवन काल (काल निर्धारण) सक्रिय काल: 20वीं सदी का मध्य एवं उत्तरार्ध (लगभग 1920-30 के दशक में जन्म)। उनके सर्वाधिक प्रामाणिक शोध ग्रंथ 1960 के दशक (जैसे 1966, 1969) से 1980 के दशक के बीच प्रकाशित हुए। वे एक संस्थागत प्राध्यापक थे जिन्होंने अपना जीवन लेखन को समर्पित किया।
अकादमिक पद प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (DDU), गोरखपुर।
विशेषज्ञता का क्षेत्र गृह्य सूत्र (Domestic Rituals), धर्मसूत्र (Ancient Indian Law), स्मृतियाँ और वैदिक व्याकरण।
मुख्य टीकाएँ/भाष्य 'विद्योतिनी' एवं 'विवरण' नाम से संस्कृत और हिंदी व्याख्याएँ।
प्रकाशक चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ (Chaukhamba Sanskrit Sansthan, Varanasi)।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: गोरखपुर का अकादमिक गौरव

डॉ. उमेश चंद्र पांडेय का नाम भारत के उन समर्पित प्राध्यापकों में गिना जाता है, जिन्होंने प्रसिद्धि की चकाचौंध से दूर रहकर एक तपस्वी की तरह साहित्य सृजन किया। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में उनका अकादमिक जीवन अपने चरम पर था।

उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा (M.A., Ph.D.) संस्कृत साहित्य और वैदिक दर्शन में प्राप्त की। उनका अधिकांश व्यावसायिक जीवन गोरखपुर विश्वविद्यालय (Gorakhpur University) के संस्कृत विभाग में एक वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में बीता। उनके द्वारा संपादित और अनुदित पुस्तकें आज भी UPSC (सिविल सेवा), UGC-NET और विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर (M.A.) पाठ्यक्रमों में 'संदर्भ ग्रंथों' (Reference Books) के रूप में अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाती हैं।

3. गृह्य सूत्र (Grihya Sutras) क्या हैं?

वेदों के छह अंगों (वेदांगों) में से एक है—'कल्प'। कल्प के चार भाग होते हैं: श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र, धर्म सूत्र और शुल्ब सूत्र।

गृह्य सूत्रों का महत्व

'गृह्य' का अर्थ है जो 'गृह' (घर) या 'गृहस्थ' से संबंधित हो। डॉ. पांडेय ने अपने शोध में स्पष्ट किया कि श्रौत सूत्र जहाँ राजाओं और बड़े पुरोहितों के सार्वजनिक यज्ञों की बात करते हैं, वहीं गृह्य सूत्र एक आम आदमी (Common Man) के दैनिक जीवन का संविधान हैं

इन ग्रंथों में एक व्यक्ति के गर्भाधान (Conception) से लेकर अंत्येष्टि (Death rites) तक के सभी 16 संस्कारों (Samskaras) का अत्यंत सूक्ष्म विवरण है। इसके अलावा इनमें कृषि (Farming), पशुपालन, गृह-निर्माण (House building), और दैनिक महायज्ञों का वर्णन है।

4. अनुवाद की पद्धति: 'विद्योतिनी' और 'विवरण' टीकाएँ

'सूत्र' साहित्य की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे बहुत छोटे होते हैं ("अल्पाक्षरम् असन्दिग्धम्" - कम से कम शब्दों में बड़ी बात कहना)। बिना किसी टीका (Commentary) के एक साधारण पाठक सूत्र का अर्थ नहीं समझ सकता।

डॉ. उमेश चंद्र पांडेय ने गौतम धर्मसूत्र, बौधायन धर्मसूत्र और विभिन्न गृह्य सूत्रों पर 'विवरण' (विस्तृत व्याख्या) और 'विद्योतिनी' (प्रकाश डालने वाली) नाम से हिंदी टीकाएँ लिखीं।
उनकी पद्धति की विशेषता यह थी कि वे पहले मूल संस्कृत सूत्र देते थे, फिर उसका शब्दार्थ (Word-to-word meaning) लिखते थे, और अंत में एक लंबी टिप्पणी (Note) देते थे जिसमें वे बताते थे कि इस विशेष सूत्र का आधुनिक समाज या प्राचीन स्मृतियों (जैसे मनुस्मृति) के साथ क्या संबंध है।

5. 16 संस्कारों का वैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण

डॉ. पांडेय ने पारस्कर गृह्यसूत्र और आश्वलायन गृह्यसूत्र का जो संपादन किया, उसमें उन्होंने 16 संस्कारों के पीछे छिपे मनोविज्ञान (Psychology) और समाजशास्त्र (Sociology) को उजागर किया।

  • उपनयन (शिक्षा का आरंभ): उन्होंने दिखाया कि कैसे प्राचीन काल में शिक्षा केवल किताबी नहीं थी, बल्कि गुरु के पास जाकर जीवन के कठोर नियम सीखने की प्रक्रिया थी।
  • विवाह संस्कार: विवाह के विभिन्न प्रकार (ब्रह्म, दैव, आर्ष आदि) और 'सप्तपदी' (Seven steps) के मंत्रों का उन्होंने जो हिंदी अनुवाद किया है, वह आज भी कर्मकांडी पंडितों द्वारा विवाह मंडपों में उपयोग किया जाता है। उन्होंने बताया कि 'सप्तपदी' केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच जीवन भर के लिए लिया गया एक 'कानूनी और भावनात्मक अनुबंध' (Legal and emotional contract) है।

6. धर्मशास्त्र और स्मृतियों पर अभूतपूर्व कार्य

गृह्य सूत्रों के साथ-साथ डॉ. पांडेय ने प्राचीन भारत के 'संविधानों' (Law Books) पर भी व्यापक शोध किया।

याज्ञवल्क्य स्मृति और धर्मसूत्र

- उन्होंने 'गौतम धर्मसूत्र' (जिस पर हरदत्त की मिताक्षरा टीका है) का 1966 में और 'बौधायन धर्मसूत्र' का 1969 में ऐतिहासिक संपादन किया।
- उन्होंने 'याज्ञवल्क्य स्मृति' (विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका सहित) का अनुवाद किया। यह ग्रंथ हिंदू कानून (Hindu Law), विशेषकर संपत्ति के बंटवारे (Property inheritance) का मूल आधार है। डॉ. पांडेय के अनुवाद ने इन कानूनी ग्रंथों को वकीलों और न्यायविदों (Jurists) के लिए भी सुलभ बना दिया।

7. 'वैदिक व्याकरण' और भाषाशास्त्रीय योगदान

कर्मकांडों के अलावा, डॉ. पांडेय एक उच्च कोटि के वैयाकरण (Grammarian) भी थे। उनकी पुस्तक 'वैदिक व्याकरण' (Vaidik Vyakaran) और 'लघु-सिद्धांत-कौमुदी' पर उनकी टीका संस्कृत के छात्रों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हैं।

जहाँ मैकडोनेल जैसे विदेशी विद्वानों ने अंग्रेजी में वैदिक व्याकरण लिखा, वहीं डॉ. उमेश चंद्र पांडेय ने हिंदी भाषी छात्रों के लिए वैदिक संस्कृत की जटिल संधियों, शब्द-रूपों और स्वर-प्रक्रिया (Accents) को अत्यंत सरल और गणितीय रूप में प्रस्तुत किया।

8. समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के लिए एक 'खजाना'

डॉ. उमेश चंद्र पांडेय का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने संस्कृत को 'इतिहास' से जोड़ दिया

आज जब कोई समाजशास्त्री (Sociologist) प्राचीन भारत में 'महिलाओं की स्थिति', 'वर्ण व्यवस्था', 'खान-पान', या 'कृषि तकनीक' पर शोध करता है, तो उसे डॉ. पांडेय द्वारा अनूदित गृह्य सूत्रों और धर्मसूत्रों का ही सहारा लेना पड़ता है। उन्होंने अपने व्याख्यानों में यह स्पष्ट किया कि वैदिक समाज कोई स्थिर (Static) समाज नहीं था, बल्कि वह देश, काल और परिस्थिति के अनुसार निरंतर विकसित होने वाला (Dynamic) समाज था।

9. निष्कर्ष: भारतीय संस्कृति के व्यावहारिक रक्षक

डॉ. उमेश चंद्र पांडेय एक ऐसे 'सांस्कृतिक सेतु' (Cultural Bridge) थे जिन्होंने प्राचीन काल के ऋषियों (गौतम, बौधायन, पारस्कर) के विचारों को 20वीं सदी के आधुनिक समाज से जोड़ दिया।

उन्होंने वेदों को केवल स्वर्ग या मोक्ष प्राप्ति का साधन नहीं माना, बल्कि 'इस जीवन' (Ihaloka) को सुंदर, व्यवस्थित और सुसंस्कृत बनाने का विज्ञान माना। आज बनारस (वाराणसी) के चौखम्बा प्रकाशन से छपी हुई डॉ. उमेश चंद्र पांडेय की लाल-पीले कवर वाली अनगिनत किताबें इस बात की गवाही देती हैं कि जब तक भारत में संस्कृत और भारतीय संस्कृति का अध्ययन होगा, डॉ. पांडेय का नाम अत्यंत कृतज्ञता और आदर के साथ लिया जाता रहेगा।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • पारस्कर गृह्यसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित) - डॉ. उमेश चंद्र पांडेय (चौखम्बा संस्कृत संस्थान)।
  • गौतम धर्मसूत्रम् (मिताक्षरा संस्कृत-हिन्दी टीका) - डॉ. उमेश चंद्र पांडेय (1966)।
  • बौधायन-धर्मसूत्रम् (विवरण हिन्दी टीका) - डॉ. उमेश चंद्र पांडेय (1969)।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका सहित) - डॉ. उमेश चंद्र पांडेय।
  • वैदिक व्याकरण - डॉ. उमेश चंद्र पांडेय (चौखम्बा विद्या भवन)।

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