प्रो. वी.के. राजवाड़े (वैजनाथ): ऋग्वेद निरुक्त के आधुनिक संपादक, वैदिक भाषाविद् | Prof. V K Rajwade

Sooraj Krishna Shastri
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प्रो. वी.के. राजवाड़े: निरुक्त और वैदिक भाषा के शिखर पुरुष

प्रो. वी.के. राजवाड़े (वैजनाथ): ऋग्वेद 'निरुक्त' के आधुनिक व्याख्याता और वैदिक भाषाविद्

एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह विद्वान जिसने यास्क मुनि के 'निरुक्त' को आधुनिक शोध के लिए सुलभ बनाया और 'वैदिक संशोधन मंडल' की नींव रखकर ऋग्वेद के शुद्धतम पाठ (Critical Edition) का निर्माण किया (The Philologist of the Veda)

भारतीय इतिहास और प्राच्य विद्या (Indology) के पन्नों में "वी.के. राजवाड़े" नाम एक अनूठा स्थान रखता है। महाराष्ट्र के एक ही परिवार में दो "वी.के. राजवाड़े" हुए। छोटे भाई विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े ने मराठा इतिहास खोजा, जबकि बड़े भाई प्रोफेसर वैजनाथ काशीनाथ राजवाड़े (Vaijanath Kashinath Rajwade) ने अपना संपूर्ण जीवन भारत की सबसे प्राचीन धरोहर—'ऋग्वेद' और 'निरुक्त'—के भाषाशास्त्रीय शोध में खपा दिया।

प्रो. वैजनाथ काशीनाथ राजवाड़े एक अत्यंत कड़क अनुशासन वाले प्राध्यापक, अंग्रेजी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान, और 'वैदिक संशोधन मंडल' (पुणे) के संस्थापक सदस्य थे। उनका जीवन वेदों के शब्दों (Vedic Vocables) की व्युत्पत्ति और उनके वास्तविक अर्थों को खोजने की एक अनवरत तपस्या थी।

📌 प्रो. वी.के. राजवाड़े (वैजनाथ): एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम प्रो. वैजनाथ काशीनाथ राजवाड़े (Prof. Vaijanath Kashinath Rajwade)
जीवन काल 1860 – 1944
संबंध महान इतिहासकार वि.का. राजवाड़े के बड़े भाई
अकादमिक पद प्राध्यापक (संस्कृत एवं अंग्रेजी), फर्ग्यूसन कॉलेज (पुणे) और प्रिंसिपल, एम.टी.बी. कॉलेज (सूरत)
संस्थापक सदस्य वैदिक संशोधन मंडल (Vaidika Samshodhana Mandala), पुणे (1928)
महानतम कृति (संपादन) यास्काचार्य प्रणीत 'निरुक्त' (दुर्गाचार्य की टीका सहित) - BORI / आनंद आश्रम
महानतम कृति (वैदिक) ऋग्वेद संहिता का सायण भाष्य सहित आलोचनात्मक संस्करण (मुख्य संपादक)
भाषाशास्त्रीय ग्रंथ Words in Rigveda (ऋग्वेद के शब्दों का विश्लेषण)

2. जीवन परिचय: डेक्कन कॉलेज से एम.टी.बी. सूरत तक की यात्रा

वैजनाथ काशीनाथ राजवाड़े का जन्म 1860 में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के वारसई गाँव में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में ही पिता का साया उठ जाने के कारण उनका और उनके छोटे भाई का लालन-पालन अत्यंत संघर्षों में हुआ।

शिक्षा और अध्यापन: वे एक अत्यंत कुशाग्र छात्र थे। उन्होंने डेक्कन कॉलेज (पुणे) से उच्च शिक्षा प्राप्त की और वहीं 'फेलो' नियुक्त हुए। बाद में उन्होंने कराची (सिंध कॉलेज), पुणे के प्रसिद्ध फर्ग्यूसन कॉलेज (Fergusson College) और सूरत के एम.टी.बी. (M.T.B.) कॉलेज में एक प्राध्यापक और प्रिंसिपल के रूप में कार्य किया। वे अपने कड़क अनुशासन के लिए जाने जाते थे। कहा जाता है कि वे कक्षा में कभी नहीं हंसते थे, लेकिन उनका पढ़ाया हुआ संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य छात्रों के मस्तिष्क में हमेशा के लिए छप जाता था।

3. 'निरुक्त' पर शोध: यास्क मुनि और दुर्गाचार्य का आलोचनात्मक संपादन

प्रो. राजवाड़े की सबसे अमर कीर्ति यास्क मुनि के 'निरुक्त' (Nirukta) पर उनका शोध कार्य है। निरुक्त, छह वेदांगों में से एक है जो 'शब्द-व्युत्पत्ति' (Etymology) से संबंधित है। यह बताता है कि वैदिक शब्दों का निर्माण किन धातुओं (Roots) से हुआ है।

राजवाड़े जी का संपादन कार्य

निरुक्त पर सबसे प्रामाणिक प्राचीन टीका दुर्गाचार्य की मानी जाती है। प्रो. राजवाड़े ने देश भर से निरुक्त की दर्जनों हस्तलिखित पांडुलिपियों (Manuscripts) को एकत्रित किया।

- उन्होंने भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) और आनंद आश्रम (पुणे) के माध्यम से "यास्काचार्यप्रणीतं निरुक्तम्" का एक शुद्ध और आलोचनात्मक संस्करण (Critical Edition) तैयार किया।
- उन्होंने इस कठिन संस्कृत ग्रंथ का मराठी और अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिससे यह ग्रंथ आधुनिक शोधकर्ताओं के लिए सुलभ हो सका।

4. निघण्टु और निरुक्त के रचयिता का विवाद

वैदिक काल के कठिन शब्दों की एक सूची है जिसे 'निघण्टु' (Nighantu) कहा जाता है, और इसी सूची की व्याख्या 'निरुक्त' में की गई है।

अकादमिक जगत में एक बड़ा विवाद था कि क्या निघण्टु (शब्द-सूची) और निरुक्त (उसकी व्याख्या) दोनों को एक ही व्यक्ति (यास्क) ने लिखा है?
प्रो. वी.के. राजवाड़े ने अपने गहरे भाषाई विश्लेषण के आधार पर तर्क दिया कि निघण्टु यास्क से बहुत प्राचीन है और यह कई पीढ़ियों के आचार्यों का सम्मिलित प्रयास है। उन्होंने दिखाया कि यास्क ने अपने निरुक्त में निघण्टु के शब्दों के क्रम को कई जगह बदल दिया है, जो यह सिद्ध करता है कि यास्क केवल व्याख्याकार (Commentator) थे, मूल संकलनकर्ता नहीं। इस शोध ने वैदिक साहित्य के इतिहास लेखन (Chronology) को एक नई दिशा दी।

5. 'वैदिक संशोधन मंडल' की स्थापना और ऋग्वेद महायज्ञ

19वीं सदी में मैक्स मूलर ने ऋग्वेद का सायण भाष्य छापा था, लेकिन वह भारत के बाहर था और उसमें कुछ त्रुटियां भी थीं।

1 अगस्त 1928 को, प्रो. वी.के. राजवाड़े, सी.वी. वैद्य और एन.सी. केलकर जैसे दिग्गजों ने पुणे में 'वैदिक संशोधन मंडल' (Vaidika Samshodhana Mandala - VSM) की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य ऋग्वेद का एक ऐसा राष्ट्रीय और पूर्णतः शुद्ध संस्करण तैयार करना था जो मैक्स मूलर के संस्करण से भी बेहतर हो।

ऋग्वेद का आलोचनात्मक संस्करण

प्रो. राजवाड़े को इस महाप्रोजेक्ट का मुख्य संपादक (General Editor) नियुक्त किया गया। उन्होंने सी.जी. काशीकर और पंडित सोनटक्के के साथ मिलकर:
1. देश भर से ऋग्वेद की अप्रकाशित पांडुलिपियों को मंगाया।
2. सायण भाष्य में सदियों से चली आ रही लिपिकीय अशुद्धियों (Scribal Errors) को सुधारा।
3. यह ग्रंथ 5 विशाल खंडों (Volumes) में प्रकाशित हुआ (पहला खंड 1933 में आया)। आज भी दुनिया भर के विश्वविद्यालय वी.के. राजवाड़े के निर्देशन में छपे इसी 'पुणे संस्करण' को ऋग्वेद का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ मानते हैं।

6. वैदिक भाषाशास्त्र: 'Words in Rigveda' और 'असुर' शब्द का विश्लेषण

प्रो. राजवाड़े की रुचि केवल ग्रंथों को छापने में नहीं थी, बल्कि वे 'शब्दों के वैज्ञानिक' (Philologist) थे।

  • 'असुर' (Asura) शब्द पर शोध: 1919 में पुणे में हुए 'प्रथम ओरिएंटल सम्मेलन' (First Oriental Conference) में उन्होंने "Asura" नामक एक प्रसिद्ध शोध-पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ऋग्वेद के प्राचीनतम अंशों में 'असुर' का अर्थ 'राक्षस' नहीं, बल्कि 'प्राणवान', 'शक्तिशाली' और 'देवता' (जैसे वरुण और इंद्र के लिए) था। अर्थ में यह गिरावट (Semantic shift) बाद के काल में कैसे आई, इसका उन्होंने व्याकरणिक खाका खींचा।
  • उन्होंने "Words in Rigveda" नामक कार्य के माध्यम से वैदिक शब्दों के बदलते अर्थों का ऐसा गहन अध्ययन किया जो पश्चिमी डिक्शनरी (जैसे रोथ और बोथलिंक की सेंट पीटर्सबर्ग डिक्शनरी) में मौजूद त्रुटियों को चुनौती देता था।

7. शोध पद्धति: व्याकरण और व्युत्पत्ति का गणित

प्रो. राजवाड़े की शोध पद्धति पश्चिमी 'तुलनात्मक भाषाविज्ञान' (Comparative Philology) और भारतीय 'निरुक्त-पद्धति' का एक उत्कृष्ट मिश्रण थी।

वे मानते थे कि किसी भी वैदिक शब्द का अर्थ निकालने के लिए केवल 'परंपरा' पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उस शब्द को ऋग्वेद के उन सभी प्रसंगों में रखकर देखना चाहिए जहाँ-जहाँ उसका प्रयोग हुआ है। उन्होंने यास्क मुनि की 'धातु-सिद्धांत' (Root Theory) का प्रबल समर्थन किया—जिसके अनुसार दुनिया का हर शब्द किसी न किसी 'क्रिया' (Action/Root) से पैदा हुआ है।

8. निष्कर्ष: पुणे की अकादमिक परंपरा के पुरोधा

1944 में प्रो. वैजनाथ काशीनाथ राजवाड़े का निधन हो गया। उनके छोटे भाई (वि.का. राजवाड़े) ने जहाँ भारत को उसका 'मराठा इतिहास' लौटाया, वहीं प्रो. वैजनाथ ने भारत को उसका 'वैदिक मूल' (Vedic Roots) शुद्ध रूप में वापस किया।

आज पुणे में भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) और वैदिक संशोधन मंडल (VSM) जैसी संस्थाएं जो विश्वस्तरीय वैदिक शोध कर रही हैं, वे प्रो. वी.के. राजवाड़े द्वारा बोए गए बीजों का ही फल हैं। वे सही मायनों में आधुनिक भारत के उन पहले 'शब्द-ऋषियों' में से थे, जिन्होंने विदेशी विद्वानों के सामने भारतीय भाषाशास्त्र (Indian Philology) की श्रेष्ठता सिद्ध की।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • यास्काचार्यप्रणीतं निरुक्तम् (दुर्गाचार्य टीका सहित) - संपा. वैजनाथ काशीनाथ राजवाडे (आनंद आश्रम, पुणे)।
  • ऋग्वेद-संहिता (सायण भाष्य सहित) - संपा. वी.के. राजवाडे एवं अन्य (वैदिक संशोधन मंडल, 1933)।
  • Yāska's Nirukta: Introduction, Full Texts... - V.K. Rajwade (BORI, 1940).
  • Proceedings of the First Oriental Conference, Poona (1919) - V.K. Rajwade's paper on 'Asura'.

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