प्रो. एच.डी. वेलणकर: ऋग्वेद के काव्यशास्त्रीय व्याख्याता और छन्दशास्त्र के आधुनिक मुनि
एक विस्तृत अकादमिक और साहित्यिक विश्लेषण: वह विद्वान जिसने वेदों को 'नीरस कर्मकांड' के आवरण से बाहर निकालकर, वैदिक ऋषियों को 'महान कवियों' (Poets) के रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया (The Explorer of Vedic Poetics and Prosody)
- 1. प्रस्तावना: वैदिक मंत्रों में काव्य की खोज
- 2. जीवन परिचय: विल्सन कॉलेज से भारतीय विद्या भवन तक
- 3. ऋग्वेद का काव्यशास्त्रीय अध्ययन (Vedic Poetics)
- 4. वेदों में अलंकार: उपमा और रूपक का सौंदर्य
- 5. 'छन्दशास्त्र' पर महाशोध: वैदिक से अपभ्रंश तक
- 6. ऋग्वेद में 'भक्ति' के बीज (The Devotional Aspect)
- 7. ऋग्वेद के मंडलों का आलोचनात्मक अनुवाद
- 8. निष्कर्ष: शब्दों की लय के रक्षक
इंडोलॉजी (भारतीय प्राच्य विद्या) के विशाल परिदृश्य में, अधिकांश विद्वानों ने वेदों का अध्ययन या तो ऐतिहासिक (Historical) दृष्टि से किया (जैसे माइकल विट्जेल), या भाषाशास्त्रीय (Philological) दृष्टि से किया (जैसे जन गोंडा)। लेकिन प्रोफेसर हरि दामोदर वेलणकर (H.D. Velankar) का दृष्टिकोण अत्यंत अनूठा और कलात्मक था।
प्रो. वेलणकर ने ऋग्वेद को विश्व साहित्य की एक उत्कृष्ट 'काव्यात्मक कृति' (Poetic Masterpiece) माना। उन्होंने सिद्ध किया कि वैदिक ऋषि केवल पुरोहित नहीं थे; वे उच्च कोटि के 'कवि' थे जो अपनी भावनाओं और आध्यात्मिक अनुभूतियों को छन्दों (Meters) और अलंकारों (Figures of speech) के सांचे में ढालते थे।
| पूरा नाम | प्रो. हरि दामोदर वेलणकर (Prof. Hari Damodar Velankar) |
| काल | 1893 – 1967 |
| कर्मभूमि | विल्सन कॉलेज (मुंबई), भारतीय विद्या भवन, मुंबई विश्वविद्यालय |
| विशेषज्ञता | वैदिक काव्यशास्त्र (Vedic Poetics), छन्दशास्त्र (Prosody), प्राकृत साहित्य |
| महानतम कृति (छन्द) | जयदामन (Jayadaman - A collection of texts on Sanskrit Metres) |
| महानतम कृति (वेद) | ऋग्वेद के मंडल II, III, VII का अनुवाद और समीक्षात्मक नोट्स |
| मुख्य सिद्धांत | वैदिक ऋषियों का 'कवि' स्वरूप और वेदों में 'भक्ति' का उद्भव |
2. जीवन परिचय: विल्सन कॉलेज से भारतीय विद्या भवन तक
हरि दामोदर वेलणकर का जन्म 1893 में महाराष्ट्र में हुआ था। उन्होंने मुंबई में शिक्षा प्राप्त की और अपने जीवन के कई दशक विल्सन कॉलेज, मुंबई में संस्कृत के प्राध्यापक के रूप में बिताए।
वे केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि एक समर्पित शोधकर्ता थे। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के.एम. मुंशी) द्वारा स्थापित 'भारतीय विद्या भवन' के विकास में प्रो. वेलणकर का बहुत बड़ा योगदान रहा। वे इसके 'मुंबादेवी संस्कृत विद्यापीठ' के निदेशक भी रहे। उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र था, लेकिन वैदिक व्याकरण और छन्दशास्त्र पर उनका अधिकार निर्विवाद था।
3. ऋग्वेद का काव्यशास्त्रीय अध्ययन (Vedic Poetics)
प्रो. वेलणकर की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने ऋग्वेद के सूक्तों का 'काव्यशास्त्रीय' (Aesthetic/Poetic) विश्लेषण किया।
ऋग्वेद में ऋषि स्वयं को 'कारु' (कारीगर) और 'विप्र' (प्रेरित कवि) कहते हैं। वेलणकर ने दिखाया कि जैसे एक बढ़ई (Carpenter) बहुत मेहनत और कला से रथ का निर्माण करता है, वैसे ही वैदिक ऋषि शब्दों को तराश कर मंत्र रूपी रथ बनाते थे ("इमा ब्रह्म... अतक्षम्")।
उन्होंने बताया कि वैदिक मंत्र कोई 'जंगली आदिवासियों' के गीत नहीं हैं, बल्कि यह एक 'सचेत कला' (Conscious Art) है, जिसमें लय, तुकबंदी और शब्दों के चयन पर बहुत ध्यान दिया गया है।
4. वेदों में अलंकार: उपमा और रूपक का सौंदर्य
काव्यशास्त्र का आधार 'अलंकार' (Figures of Speech) होते हैं। वेलणकर ने ऋग्वेद में प्रयुक्त अलंकारों पर गहन शोध पत्र लिखे (विशेषकर Similes in the Rigveda)।
- उपमा (Simile): उन्होंने विश्लेषण किया कि वैदिक ऋषि कैसे प्रकृति की तुलना मानव जीवन से करते हैं। जैसे—उषा (Dawn) का वर्णन करते हुए ऋषि उसे "एक सुंदर सजी-धजी वधू" या "समुद्र से नहाकर निकलती हुई युवती" के समान बताते हैं।
- रूपक (Metaphor): अग्नि को 'अतिथि', 'दूत' और 'पुरोहित' के रूप में चित्रित करना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि उच्च कोटि की काव्यात्मक कल्पना है।
5. 'छन्दशास्त्र' पर महाशोध: वैदिक से अपभ्रंश तक
भारतीय साहित्य में 'छन्द' (Meter/Rhythm) को वेदों का 'पैर' (छन्दः पादौ तु वेदस्य) कहा गया है। प्रो. वेलणकर आधुनिक भारत के सबसे बड़े छन्द-विशेषज्ञ (Metrician) थे।
1. छन्दों का विकास: उन्होंने ऋग्वेद के अक्षरात्मक छन्दों (Syllabic meters जैसे गायत्री, त्रिष्टुभ, जगती) से लेकर लौकिक संस्कृत के वर्ण-वृत्तों (जैसे मंदाक्रांता, शिखरिणी) और अंततः प्राकृत तथा अपभ्रंश के मात्रा-वृत्तों (जैसे दोहा, चौपाई) तक के क्रमिक विकास का नक्शा तैयार किया।
2. उन्होंने हेमचंद्राचार्य कृत 'छन्दोनुशासन' और अन्य दुर्लभ ग्रंथों का संपादन किया। उनकी पुस्तक "Jayadaman" (1949) संस्कृत छन्दशास्त्र के चार प्राचीन ग्रंथों का एक अनमोल संग्रह है, जिसके बिना पिंगल मुनि के शास्त्र को समझना कठिन है।
6. ऋग्वेद में 'भक्ति' के बीज (The Devotional Aspect)
प्रायः पश्चिमी विद्वान मानते थे कि 'भक्ति' (Devotion) का उदय भारत में बहुत बाद (पुराणों के काल) में हुआ। प्रो. वेलणकर ने इसका प्रबल खंडन किया।
उन्होंने ऋग्वेद के सातवें मंडल (वसिष्ठ मंडल) का अध्ययन करते हुए 'वरुण' देवता के प्रति महर्षि वसिष्ठ के सूक्तों का विश्लेषण किया। उन्होंने सिद्ध किया कि वसिष्ठ के सूक्तों में जो 'पाप-बोध', 'पश्चाताप', 'क्षमा-याचना' और भगवान के साथ 'सखा-भाव' (मैत्री) का वर्णन है, वह विशुद्ध 'भक्ति रस' है। वेलणकर के अनुसार, मध्यकालीन संतों (जैसे तुकाराम, तुलसीदास) की भक्ति का मूल स्रोत ऋग्वेद के इन्ही काव्यात्मक सूक्तों में विद्यमान है।
7. ऋग्वेद के मंडलों का आलोचनात्मक अनुवाद
वेलणकर ने ऋग्वेद के विशिष्ट मंडलों का अत्यंत प्रामाणिक अनुवाद और भाष्य तैयार किया, जो बॉम्बे विश्वविद्यालय और भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित हुआ।
- मंडल 2 (गृत्समद ऋषि): 'Hymns to Indra' का संपादन, जिसमें उन्होंने इंद्र को एक शक्ति-प्रतीक के साथ-साथ एक 'कृपालु रक्षक' के रूप में दर्शाया।
- मंडल 3 (विश्वामित्र ऋषि): 'Hymns to Agni'।
- मंडल 7 (वसिष्ठ ऋषि): इस मंडल के अनुवाद में उन्होंने व्याकरण और छन्द दोनों की अत्यंत सूक्ष्म टिप्पणियां (Notes) दीं, जो सायण की सीमाओं को पार करती हैं।
8. निष्कर्ष: शब्दों की लय के रक्षक
प्रो. एच.डी. वेलणकर का 1967 में देहावसान हो गया। उनका जीवन 'सरस्वती की लय' (Rhythm of Saraswati) को खोजने में समर्पित था।
जहाँ अन्य विद्वान वेदों को केवल 'ज्ञान' या 'कर्म' के स्रोत के रूप में देख रहे थे, प्रो. वेलणकर ने दुनिया को याद दिलाया कि वेद सबसे पहले 'कविता' (Poetry) हैं। उन्होंने भारतीय विद्या के छात्रों को यह दृष्टि दी कि बिना 'छन्दशास्त्र' और 'अलंकार शास्त्र' के ज्ञान के, वैदिक ऋषियों के हृदय को नहीं समझा जा सकता। वे सही मायनों में आधुनिक युग के पिंगल मुनि थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Rgveda Mandala VII - Translated and annotated by H.D. Velankar (Bharatiya Vidya Bhavan).
- Jayadaman (A collection of four texts on Sanskrit Metres) - H.D. Velankar.
- Similes in the Atharvaveda & Rigveda - Articles by H.D. Velankar (JBRAS).
- Chandonushasana of Hemachandra - Edited by H.D. Velankar.
