पं. बुद्धदेव मीमांसक (विद्यालंकार): वैदिक यज्ञ पद्धति और मीमांसा के अप्रतिम शोधकर्ता | pt. Buddhdev mimansak

Sooraj Krishna Shastri
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पं. बुद्धदेव मीमांसक: वैदिक यज्ञ पद्धति और मीमांसा के अप्रतिम शोधकर्ता

पं. बुद्धदेव मीमांसक (विद्यालंकार): वैदिक यज्ञ पद्धति और मीमांसा के अप्रतिम शोधकर्ता

महर्षि दयानन्द सरस्वती की वैचारिक क्रांति के वह प्रखर संवाहक, जिन्होंने वैदिक यज्ञों को अन्धविश्वास और रूढ़िवादी कर्मकांडों के गर्त से निकालकर 'सामाजिक योगक्षेम', 'पर्यावरण विज्ञान' और 'राष्ट्र-निर्माण' के एक सशक्त उपकरण (Tool) के रूप में पुनर्स्थापित किया।

विस्तृत विषय सूची (Table of Contents)

1. प्रस्तावना: वैदिक कर्मकांड बनाम विशुद्ध यज्ञ मीमांसा

भारतीय वैदिक परम्परा में 'यज्ञ' (Yagya) को सृष्टि का नाभि-केंद्र (Navel of the Universe) माना गया है— "अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः"। किंतु मध्यकाल आते-आते यज्ञ का वास्तविक वैज्ञानिक और सामाजिक स्वरूप लुप्त हो गया था। यह केवल स्वार्थ-पूर्ति, पशुबलि, और एक विशेष वर्ग के एकाधिकार का साधन मात्र बनकर रह गया था। उन्नीसवीं सदी में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इस अज्ञान के अंधकार को चीरकर यज्ञ के विशुद्ध रूप को स्थापित करने का उद्घोष किया।

महर्षि दयानन्द के इसी यज्ञीय और दार्शनिक संकल्प को अकादमिक (Academic) और प्रायोगिक (Practical) धरातल पर जिस महापुरुष ने सर्वाधिक तार्किक गहराई प्रदान की, वे थे— पं. बुद्धदेव मीमांसक, जिन्हें विद्वत जगत में 'पं. बुद्धदेव विद्यालंकार' और संन्यास आश्रम ग्रहण करने के पश्चात 'स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती' के नाम से जाना जाता है। उनकी मीमांसा दृष्टि ने 'यज्ञ' शब्द को केवल अग्नि में आहुति देने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानव जीवन की 'समग्र कल्याणकारी क्रियाओं' (Holistic Welfare Actions) का पर्याय बना दिया।

📌 पं. बुद्धदेव मीमांसक (स्वामी समर्पणानन्द): एक ऐतिहासिक एवं अकादमिक प्रोफाइल
प्रसिद्ध नाम पं. बुद्धदेव विद्यालंकार / पं. बुद्धदेव मीमांसक
संन्यास का नाम स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती
शिक्षा एवं संस्कार गुरुकुल कांगड़ी (स्वामी श्रद्धानन्द जी के साक्षात् शिष्य)
मुख्य शोध/कार्य क्षेत्र यज्ञ मीमांसा, शतपथ ब्राह्मण भाष्य, पूर्व मीमांसा दर्शन, वैदिक समाजशास्त्र
यज्ञ की ऐतिहासिक परिभाषा "सामुदायिकं योगक्षेममुद्दिश्य समुदायाङ्गतया क्रियमाणं कर्म यज्ञः" (सामुदायिक योगक्षेम के लिए किया गया कर्म)
प्रमुख ग्रन्थ/टीकाएं शतपथ ब्राह्मण भाष्य, पंचयज्ञ प्रकाश, अग्निहोत्र सर्वस्व
संस्थागत योगदान गुरुकुल प्रभात आश्रम (मेरठ) के प्रेरणास्रोत एवं आर्य समाज के प्रखर शास्त्रार्थ महारथी

2. जीवन दर्शन: पं. बुद्धदेव विद्यालंकार से स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती तक

पं. बुद्धदेव जी का जन्म एक अत्यंत मेधावी और संस्कारवान परिवार में हुआ था। सात वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता पं. रामचन्द्र जी ने उन्हें हरिद्वार स्थित गुरुकुल कांगड़ी में स्वामी श्रद्धानन्द जी (महात्मा मुंशीराम) के चरणों में समर्पित कर दिया था। गुरुकुलीय शिक्षा ने उनके भीतर वेद, दर्शन और विशेषकर 'मीमांसा' (तर्क और कर्मकांड का दर्शन) के प्रति अगाध प्रेम उत्पन्न किया।

अपनी युवावस्था में ही वे एक ओजस्वी वक्ता, शास्त्रार्थ के महारथी और एक उच्च-कोटि के तार्किक के रूप में सम्पूर्ण भारत में विख्यात हो गए। ईसाई और मुस्लिम धर्म-प्रचारकों से लेकर रूढ़िवादी पौराणिक विद्वानों तक, कोई भी उनके तर्कों के समक्ष टिक नहीं पाता था। उनका 'मीमांसक' स्वरूप केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं था। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और 'स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती' के नाम से विख्यात हुए। उनका यह संन्यास समाज से पलायन नहीं था, बल्कि अपना सम्पूर्ण जीवन वैदिक यज्ञ-संस्कृति के पुनरुद्धार के लिए 'समर्पित' कर देना था।

3. यज्ञ की व्युत्पत्तिपरक और दार्शनिक मीमांसा: एक नया दृष्टिकोण

पं. बुद्धदेव मीमांसक का सबसे बड़ा और युगांतरकारी योगदान 'यज्ञ' (Yagya) शब्द की एक नवीन, अत्यंत व्यापक और पूर्णतः वैज्ञानिक परिभाषा गढ़ना है। सामान्यतः लोग समझते हैं कि वेदी बनाकर उसमें समिधा और घृत डालना ही यज्ञ है। किंतु पं. बुद्धदेव ने 'निघण्टु', 'निरुक्त' और 'मीमांसा दर्शन' का आश्रय लेकर इसकी ऐसी व्युत्पत्तिपरक (Etymological) परिभाषा दी, जिसने पाश्चात्य और मध्यकालीन दोनों व्याख्याकारों को निरुत्तर कर दिया।

"सामुदायिकं योगक्षेममुद्दिश्य समुदायाङ्गतया क्रियमाणं कर्म यज्ञः।"

(समुदाय का अंग बन कर, समुदाय के 'योगक्षेम' के लिये जो नि:स्वार्थ कार्य किये जाते हैं, वे यज्ञ कहलाते हैं।)

उपर्युक्त परिभाषा में पं. बुद्धदेव जी ने यज्ञ को एक सामाजिक अनुष्ठान (Social Institution) घोषित कर दिया।
योग (Yoga): जो अप्राप्त है (अर्थात समाज में जिस ज्ञान, बल, या सम्पत्ति की कमी है) उसे प्राप्त करना।
क्षेम (Kshema): जो प्राप्त है, उसकी रक्षा करना और उसका समान वितरण करना।
अतः, राष्ट्र की रक्षा के लिए सीमा पर खड़ा सैनिक, समाज को अज्ञान से निकालने वाला अध्यापक, और अन्न उपजाने वाला किसान— ये सभी जब 'सामुदायिक हित' के लिए अपना कर्म करते हैं, तो पं. बुद्धदेव जी की मीमांसा के अनुसार, वे एक 'महायज्ञ' ही कर रहे हैं।

4. यज्ञ के तीन मूल स्तंभ: देवपूजा, संगतिकरण और दान

संस्कृत व्याकरण के अनुसार यज्ञ शब्द 'यज्' धातु से 'नङ्' प्रत्यय लगकर बनता है। महर्षि पाणिनी के 'अष्टाध्यायी' के अनुसार 'यज्' धातु के तीन अर्थ हैं: देवपूजा, संगतिकरण और दान। पं. बुद्धदेव मीमांसक ने इन तीनों पारिभाषिक शब्दों की अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक (Psychological) मीमांसा प्रस्तुत की है।

त्रिविध यज्ञीय दर्शन (Threefold Philosophy of Yagya)
  • 1. देवपूजा (Reverence for the Divine & Noble): 'देव' का अर्थ केवल स्वर्ग में रहने वाली सत्ता नहीं है। 'दिवु क्रीडाविजिगीषा...' धातु के अनुसार जो प्रकाशमान है, जो ज्ञानवान है, वह देव है। जड़ देवों (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी) को प्रदूषण मुक्त रखना जड़-देवपूजा है। वहीं माता, पिता, आचार्य और विद्वानों का सत्कार करना, उनके गुणों को धारण करना चेतन-देवपूजा है। यज्ञ हमें 'गुण-पूजक' बनाता है, 'व्यक्ति-पूजक' नहीं।
  • 2. संगतिकरण (Social Unification & Synergy): इसका अर्थ है समाज को जोड़ना। यज्ञ कुण्ड के चारों ओर जब राजा, रंक, विद्वान और सामान्य जन एक साथ बैठकर आहुति देते हैं, तो वह 'सामाजिक समरसता' (Social Harmony) का सबसे बड़ा प्रतीक बन जाता है। पं. बुद्धदेव जी ने सिद्ध किया कि जन्मना जातिवाद (Caste by birth) का नाश केवल यज्ञ के 'संगतिकरण' सिद्धांत से ही हो सकता है।
  • 3. दान (Selfless Giving & Distribution): यज्ञ में हम जो भी आहुति देते हैं, उस पर 'इदन्न मम' (यह मेरा नहीं है) बोलते हैं। यह पूंजीवाद (Capitalism) और संपत्ति के संचय (Hoarding) पर सबसे बड़ा प्रहार है। जो कुछ भी मेरे पास है— चाहे वह विद्या हो, बल हो, या धन हो— उसे समाज के বৃহত্তর कल्याण के लिए आहुत कर देना ही सच्चा दान है।

5. शतपथ ब्राह्मण भाष्य: मीमांसक दृष्टि का चरमोत्कर्ष

वैदिक वांग्मय में यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ 'शतपथ ब्राह्मण' (Shatapatha Brahmana) को यज्ञ-विज्ञान का विश्वकोश (Encyclopedia of Yagya Science) माना जाता है। किंतु इसकी भाषा अत्यंत प्रतीकात्मक (Symbolic) और क्लिष्ट है। पाश्चात्य विद्वानों (जैसे जूलियस एगलिंग - Julius Eggeling) ने इसका अनुवाद किया, परंतु वे इसके आधिभौतिक (Physical) और आध्यात्मिक (Spiritual) रहस्यों को समझ नहीं पाए और इसे केवल कर्मकांडीय पहेलियों का पुलिंदा मान बैठे।

पं. बुद्धदेव विद्यालंकार (स्वामी समर्पणानन्द) ने शतपथ ब्राह्मण के प्रथम पौने तीन काण्डों का जो विस्तृत और वैज्ञानिक भाष्य लिखा, वह इंडोलॉजी (Indology) और आर्य समाज के इतिहास में एक मील का पत्थर है। उन्होंने सिद्ध किया कि शतपथ में वर्णित यज्ञ-वेदी का निर्माण ज्यामिति (Geometry) और खगोल शास्त्र (Astronomy) का प्रतिपादन है। उन्होंने 'दर्शपूर्णमास' (Darshapurnamasa) आदि इष्टियों की व्याख्या करते हुए बताया कि ये केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव मन की वृत्तियों (Psychological states) को शुद्ध करने की वैज्ञानिक प्रक्रियाएं हैं। उनके भाष्य के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वेदों में कितना उच्चकोटि का विज्ञान भरा हुआ है जिसे मीमांसा की सही चाबी (Key) के बिना खोला नहीं जा सकता।

6. पंचमहायज्ञ का मनोविज्ञान और व्यावहारिक दर्शन

प्रत्येक गृहस्थ के लिए महर्षि मनु और महर्षि दयानन्द ने 'पंचमहायज्ञ' (ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ, अतिथि यज्ञ) का विधान किया है। पं. बुद्धदेव जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'पंचयज्ञ प्रकाश' में इसे एक 'मज़बूरी' (Compulsion) के रूप में नहीं, बल्कि 'मानव अस्तित्व के ऋण' (Debts of Human Existence) को चुकाने की वैज्ञानिक विधि के रूप में प्रस्तुत किया।

वे लिखते हैं कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन— ये प्रवृत्तियां मनुष्य और पशु में समान हैं। किंतु मनुष्य को पशु से जो चीज़ अलग करती है, वह है 'व्रताग्नि' (Fire of Resolve) या 'दीक्षाग्नि'। मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकसेवा-रूप अग्नि में जब अपने अहंकार की आहुति देता है, तभी वह 'आर्य' (श्रेष्ठ) कहलाता है।

  • ब्रह्म यज्ञ (संध्या): यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने (Spiritual connection) का यज्ञ है। यह मानसिक तनाव (Depression/Anxiety) की सबसे उत्तम वैदिक चिकित्सा है।
  • वैश्वदेव यज्ञ (बलि-वैश्वदेव): पं. बुद्धदेव जी ने बताया कि यह यज्ञ 'पारिस्थितिकी तंत्र' (Ecology) के संतुलन के लिए है। चींटी, पक्षी, कुत्ते और समाज के सबसे निचले पायदान के जीवों को भोजन देना इस बात का प्रमाण है कि वैदिक मनुष्य पूरी सृष्टि को अपना परिवार मानता है।

7. अग्निहोत्र: पर्यावरण शुद्धि और आध्यात्मिक चिकित्सा का विज्ञान

अपनी पुस्तक 'अग्निहोत्र सर्वस्व' में पं. बुद्धदेव जी ने दैनिक हवन (Agnihotra) की केवल कर्मकांडीय नहीं, बल्कि भौतिक (Physical) और आध्यात्मिक (Spiritual) व्याख्या की है।

अग्निहोत्र का विज्ञान (Science of Agnihotra)

उन्होंने ऋग्वेद (1.6.8) का उद्धरण देते हुए बताया कि शुद्ध पदार्थों (गाय का घी, उत्तम औषधियां, मिष्टान्न) से अग्नि में किया गया होम सूर्य की किरणों और वायु के माध्यम से सूक्ष्म होकर पूरे वायुमंडल में फैल जाता है।

यह प्रक्रिया 'नैनो-टेक्नोलॉजी' (Nano-technology) के सिद्धांत पर काम करती है। अग्नि पदार्थों का नाश नहीं करती, बल्कि उन्हें 'सूक्ष्म' (Subtle) और 'व्यापक' (Widespread) बना देती है। जो औषधियां खाने पर केवल एक शरीर को लाभ पहुँचाती हैं, यज्ञ की अग्नि के माध्यम से वे श्वास-प्रश्वास के द्वारा हजारों प्राणियों के फेफड़ों तक पहुँचकर रोगों का नाश करती हैं। अतः अग्निहोत्र एक 'सामुदायिक चिकित्सा' (Community Health Care) प्रणाली है।

8. सामुदायिक यज्ञ: वैयक्तिक स्वार्थ से राष्ट्र-कल्याण तक

पं. बुद्धदेव मीमांसक इस बात के घोर विरोधी थे कि यज्ञ केवल निजी सुख, पुत्र प्राप्ति या स्वर्ग प्राप्ति (स्वर्ग कामो यजेत) के लिए किया जाए। उन्होंने यज्ञ को राष्ट्रवाद (Nationalism) से जोड़ा।

उन्होंने 'अश्वमेध यज्ञ' और 'राजसूय यज्ञ' की व्याख्या करते हुए पाश्चात्य भ्रांतियों (जैसे घोड़े की बलि) का डटकर खण्डन किया। शतपथ ब्राह्मण के आधार पर उन्होंने सिद्ध किया कि 'राष्ट्रं वा अश्वमेधः'— अश्वमेध का वास्तविक अर्थ राष्ट्र के बल (अश्व) और मेधा (ज्ञान) को बढ़ाना तथा दुष्टों का शमन करना है। यदि कोई राजा अपने राज्य में न्याय व्यवस्था स्थापित करता है, सड़कों और विश्वविद्यालयों का निर्माण करता है, और प्रजा के दुःख दूर करता है, तो वह राजा वास्तव में अपने जीवन में 'अश्वमेध यज्ञ' ही कर रहा है।

9. पूर्व मीमांसा दर्शन और पं. बुद्धदेव की तार्किक व्याख्या

महर्षि जैमिनि कृत 'पूर्व मीमांसा दर्शन' वैदिक कर्मकांड का मूल ग्रंथ है। कालान्तर में इसे केवल स्वर्ग-प्राप्ति का साधन मान लिया गया था और यहाँ तक कहा जाने लगा था कि मीमांसा में 'ईश्वर' की कोई आवश्यकता नहीं है (निरिश्वरवाद)।

एक प्रकाण्ड 'मीमांसक' होने के नाते पं. बुद्धदेव जी ने मीमांसा दर्शन पर जमी धूल को साफ़ किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मीमांसा का 'कर्म' अंधा कर्मकांड नहीं है, बल्कि वह 'धर्म-जिज्ञासा' (अथातो धर्मजिज्ञासा) है। उन्होंने बताया कि वेद के मंत्र कोई जादुई शब्द नहीं हैं, बल्कि वे जीवन जीने के 'नियम' (Directives) हैं। मीमांसा हमें सिखाती है कि कौन सा कर्म 'कब', 'कहाँ', 'किसलिए' और 'कैसे' करना चाहिए। पं. बुद्धदेव जी ने मीमांसा को पुनः वेदान्त (ज्ञान) के साथ समन्वित किया, जिससे सिद्ध हुआ कि 'ज्ञान-रहित कर्म' और 'कर्म-रहित ज्ञान' दोनों ही अपूर्ण हैं।

10. गुरुकुल प्रभात आश्रम की स्थापना: यज्ञीय जीवन का जीवंत प्रयोग

पं. बुद्धदेव मीमांसक (स्वामी समर्पणानन्द) केवल ग्रंथों के पंडित नहीं थे। उन्होंने जो दर्शन ग्रंथों में खोजा, उसे भूमि पर उतारने का प्रयास भी किया। उन्होंने मेरठ के पास 'गुरुकुल प्रभात आश्रम' की स्थापना की प्रेरणा दी।

उनका स्वप्न था कि एक ऐसा गुरुकुल हो जहाँ केवल तोते की तरह मंत्र न रटाए जाएँ, बल्कि छात्र यज्ञ के वास्तविक मर्म को समझें। आज यह गुरुकुल न केवल संस्कृत और वेद-विद्या का महान केंद्र है, बल्कि यहाँ के छात्र आधुनिक विद्याओं और अंतर्राष्ट्रीय तीरंदाजी (Archery) जैसे खेलों में भी भारत का नाम रौशन कर रहे हैं। यह पं. बुद्धदेव जी के 'योगक्षेम' वाले यज्ञीय सिद्धांत का ही प्रत्यक्ष और जीवंत उदाहरण है, जहाँ शारीरिक बल और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों का यज्ञ एक साथ चल रहा है।

11. साहित्यिक अवदान एवं वैदिक वांग्मय पर प्रभाव

पं. बुद्धदेव जी ने अपना अधिकांश जीवन वैदिक ग्रंथों के प्रणयन, व्याख्यानों और शास्त्रार्थों में व्यतीत किया। यद्यपि वे एक महान वक्ता थे (जिनकी वाणी में जादू था और श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे), फिर भी उन्होंने साहित्य जगत को अत्यंत महत्वपूर्ण कृतियां प्रदान की हैं:

  • शतपथ ब्राह्मण भाष्य: यज्ञ के आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक रहस्यों का विश्वकोश।
  • पंचयज्ञ प्रकाश: दैनिक जीवन में गृहस्थों के लिए 5 यज्ञों की वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या।
  • अग्निहोत्र सर्वस्व: होम (Agnihotra) की रासायनिक (Chemical), सामाजिक और आध्यात्मिक मीमांसा।
  • विभिन्न ट्रैक्ट्स और शास्त्रार्थ संग्रह: जिन्होंने वैदिक धर्म पर आक्षेप करने वाले ईसाई और मुस्लिम विद्वानों का अकाट्य तर्कों से मुँह बंद किया।

12. निष्कर्ष: एक युगदृष्टा मीमांसक का अमर संदेश

पं. बुद्धदेव मीमांसक (स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती) का संपूर्ण जीवन एक प्रज्वलित यज्ञ-कुण्ड के समान था, जिसमें उन्होंने अज्ञान, पाखंड, जन्मना जातिवाद और अविद्या की आहुति दे दी।

आज जब विश्व भीषण युद्धों, जलवायु परिवर्तन (Climate Change), पर्यावरण प्रदूषण और मानसिक अवसाद (Depression) जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे में पं. बुद्धदेव विद्यालंकार द्वारा प्रतिपादित 'यज्ञ का दर्शन' मानव जाति के लिए एक संजीवनी बूटी है। वे हमें सिखाते हैं कि जब तक मनुष्य 'स्वार्थ' (Self-interest) की संकीर्ण परिधि से बाहर निकलकर 'परमार्थ' (Universal Welfare) और 'सामुदायिक योगक्षेम' की ओर नहीं बढ़ेगा, तब तक शांति संभव नहीं है। उनका यज्ञ केवल लकड़ी जलाना नहीं है; उनका यज्ञ है— स्वयं को तपाकर समाज को प्रकाशित करना।

आधुनिक आर्य समाज और सम्पूर्ण वैदिक जगत उनका सदैव ऋणी रहेगा, जिन्होंने 'मीमांसा' को शुष्क तर्कों से निकालकर एक 'जीवंत जीवन-पद्धति' (Living Lifestyle) में बदल दिया।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • शतपथ ब्राह्मण (प्रथम खण्ड) - पं. बुद्धदेव विद्यालंकार भाष्य (प्रकाशक: दयानन्द संस्थान)।
  • पंचयज्ञ प्रकाश - स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती।
  • अग्निहोत्र सर्वस्व - स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती।
  • यज्ञ दर्शन और मीमांसा के विभिन्न शोध-पत्र एवं आर्य समाज के ऐतिहासिक दस्तावेज़।
  • गुरुकुल कांगड़ी और गुरुकुल प्रभात आश्रम के ऐतिहासिक संस्मरण।

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