आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति: वैदिक संस्कृति, शिक्षा और दर्शन के मूर्धन्य शोधकर्ता
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वह सुप्रसिद्ध कुलपति और वैदिक ऋषि, जिन्होंने अपने विपुल शोध-ग्रंथों के माध्यम से 'वेदों में नारी अधिकार', 'वैदिक राष्ट्रवाद', और 'लोक-कल्याण' के विशुद्ध वैज्ञानिक और मानवीय स्वरूप को आधुनिक विश्व के समक्ष पुनर्स्थापित किया।
- 1. प्रस्तावना: वैदिक पुनर्जागरण का स्वर्ण युग और आचार्य प्रियव्रत
- 2. गुरुकुल कांगड़ी की तपोभूमि और एक 'वैदिक ऋषि' का निर्माण
- 3. 'मेरा धर्म' (Mera Dharma): वैदिक नारी विमर्श और पुरुष-सत्तात्मक रूढ़ियों का खण्डन
- 4. 'वेदोद्यान के चुने हुए फूल': वैदिक ऋचाओं का काव्यात्मक और आध्यात्मिक दर्शन
- 5. 'वेदों में इन्द्र': पाश्चात्य बहुदेववाद का खण्डन और विशुद्ध एकेश्वरवाद
- 6. 'वेद का राष्ट्रिय गीत': राष्ट्रवाद, राजनीति और भूमि-सूक्त का अमर सन्देश
- 7. 'वेदों में लोक कल्याण': वैदिक अर्थशास्त्र और सामाजिक समरसता का मॉडल
- 8. इतिहास-लेखन व सम्पादन: 'आर्य समाज का इतिहास' का संरक्षण
- 9. शैक्षणिक दर्शन: आधुनिकता और प्राच्य-विद्या का अद्भुत समन्वय
- 10. निष्कर्ष: इक्कीसवीं सदी में आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति की प्रासंगिकता
1. प्रस्तावना: वैदिक पुनर्जागरण का स्वर्ण युग और आचार्य प्रियव्रत
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी का संधिकाल भारतीय इतिहास में 'वैदिक पुनर्जागरण' (Vedic Renaissance) का सबसे स्वर्णिम युग माना जाता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेदों पर जमी हुई मध्यकालीन रूढ़ियों, अंधविश्वासों और पाश्चात्य भ्रांतियों की धूल को हटाकर जिस शुद्ध 'आर्ष पद्धति' (यौगिक व्याख्या) का शंखनाद किया था, उसे अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए अत्यंत मेधावी और तपस्वी विद्वानों की आवश्यकता थी। इसी महान शृंखला में एक अत्यंत देदीप्यमान नक्षत्र का नाम है— आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति।
आचार्य प्रियव्रत केवल एक संस्कृत के प्रकांड पंडित नहीं थे, बल्कि वे एक 'दृष्टा' (Visionary) और 'समीक्षक' (Critic) थे। जहाँ पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट (Indologists) वेदों को 'गड़रियों के गीत' (Songs of shepherds) और प्रकृति-पूजा का आदिम ग्रन्थ सिद्ध करने में लगे थे, वहीं भारतीय पौराणिक वर्ग वेदों को केवल जन्मना ब्राह्मणों और पुरुषों की बपौती मानकर बैठा था। आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति ने अपने अकाट्य तर्कों, वैदिक प्रमाणों और दर्जनों शोधपरक पुस्तकों के माध्यम से इन दोनों ही अतिवादी विचारधाराओं का तार्किक खण्डन किया और 'सार्वभौमिक वैदिक धर्म' (Universal Vedic Religion) की स्थापना की।
| पूरा नाम | आचार्य पण्डित प्रियव्रत वेदवाचस्पति |
| काल निर्धारण (Chronology) | 20वीं शताब्दी (आधुनिक वैदिक पुनर्जागरण काल) |
| उपाधि / सम्मान | गुरुकुल धरा के वैदिक ऋषि, वेदवाचस्पति |
| प्रमुख संस्थान | गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार |
| धारित पद | भूतपूर्व कुलपति (Vice-Chancellor) एवं प्रोफेसर, वैदिक साहित्य विभाग |
| मुख्य शोध क्षेत्र | वैदिक साहित्य, नारी अधिकार, वैदिक राष्ट्रवाद, एकेश्वरवाद (Monotheism) |
| प्रमुख रचित ग्रंथ | मेरा धर्म, वेदोद्यान के चुने हुए फूल, वेदों में इन्द्र, वेद का राष्ट्रिय गीत, वेदों में लोक कल्याण |
| वैचारिक दृष्टिकोण | नारी शिक्षा और यज्ञाधिकार के प्रबल समर्थक, पाश्चात्य भाष्यकारों के तार्किक आलोचक |
2. गुरुकुल कांगड़ी की तपोभूमि और एक 'वैदिक ऋषि' का निर्माण
आचार्य प्रियव्रत का सम्पूर्ण जीवन और व्यक्तित्व स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा स्थापित 'गुरुकुल कांगड़ी' (हरिद्वार) की पावन तपोभूमि पर गढ़ा गया। वे गुरुकुल के उन सुप्रसिद्ध और प्रथम पंक्ति के स्नातकों की शृंखला में सिरमौर स्थान रखते थे, जिन्होंने गुरुकुल के यश एवं उसकी कीर्ति-पताका को न केवल भारत में अपितु सम्पूर्ण विश्व में फहराया।
एक ब्रह्मचारी के रूप में गुरुकुल में प्रवेश करने से लेकर उसी महान विश्वविद्यालय के 'कुलपति' (Vice-Chancellor) और 'वैदिक साहित्य के प्रोफेसर' बनने तक की उनकी यात्रा उनके अगाध पाण्डित्य और तपस्या का प्रमाण है। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का मुख्य उद्देश्य केवल 'पुस्तकीय ज्ञान' देना नहीं था, बल्कि चरित्र-निर्माण और सत्य के प्रति अडिग निष्ठा पैदा करना था। आचार्य प्रियव्रत ने इसी निष्ठा के वशीभूत होकर अपना पूरा जीवन वेदों के सत्य अर्थों को लोक-भाषा (हिंदी) में आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें आदरपूर्वक "गुरुकुल धरा का वैदिक ऋषि" कहा जाता था।
3. 'मेरा धर्म' (Mera Dharma): वैदिक नारी विमर्श और पुरुष-सत्तात्मक रूढ़ियों का खण्डन
आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति की सबसे क्रान्तिकारी और समाज-सुधारक पुस्तक का नाम है "मेरा धर्म"। इस ग्रन्थ में उन्होंने उस समय के सबसे ज्वलंत विषय— 'धर्मग्रंथों में नारी का अधिकार' पर अत्यंत मुखर होकर लिखा है।
मध्यकाल में धर्म-व्यापारियों और रूढ़िवादी पंडितों ने नारियों को वेदाध्ययन, उपनयन (यज्ञोपवीत) और यज्ञ करने মোহ अधिकार से वंचित कर दिया था। "स्त्री-शूद्रौ नाधीयाताम्" (स्त्री और शूद्र वेद न पढ़ें) जैसी मनगढ़ंत व्यवस्थाओं को धर्म का अंग मान लिया गया था। आचार्य प्रियव्रत ने अपने ग्रन्थ 'मेरा धर्म' में वेदों से सीधे प्रमाण देकर इस पितृसत्तात्मक (Patriarchal) पाखंड को जड़ से उखाड़ फेंका।
- वेदाध्ययन का अधिकार: उन्होंने यजुर्वेद (26.2) का उद्धरण दिया— "यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय॥" अर्थात् "जिस प्रकार मैं (ईश्वर) यह कल्याणकारी वेद-वाणी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्रियों (सभी जनों) के लिए उपदेश करता हूँ, वैसे ही तुम भी करो।" आचार्य जी ने स्पष्ट किया कि जब ईश्वर स्वयं वेद पढ़ने का अधिकार दे रहा है, तो किसी गुरु या पांडा को इसे रोकने का अधिकार किसने दिया?
- ब्रह्मचर्य और उपनयन: उन्होंने अथर्ववेद (11.5.18) का प्रमाण दिया— "ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्" (अर्थात् कन्याएँ भी ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन कर पूर्ण विद्या प्राप्त करने के पश्चात् ही युवा पति का वरण करें)। इससे सिद्ध होता है कि वैदिक काल में कन्याओं का भी गुरुकुलों में उपनयन संस्कार होता था।
- यज्ञ और राष्ट्र-संचालन: आचार्य प्रियव्रत ने श्रौतसूत्रों ("इमं मन्त्रं पत्नी पठेत्" - पत्नी यज्ञ में मंत्र पढ़े) और यजुर्वेद (20.9) का उल्लेख किया जहाँ नारी को राज्य-शासन करने के योग्य माना गया है। उन्होंने ऋग्वेद (3.31.1) के आधार पर सिद्ध किया कि वैदिक काल में पित्रृक संपत्ति (Patriarchal Property) में पुत्र और पुत्री का समान अधिकार था।
उन्होंने अपनी पुस्तक में स्पष्ट लिखा कि ऋग्वेद में अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, विश्ववारा जैसी 27 महिला 'ऋषिकाएं' (Mantra-drashta) हैं। जिस धर्म में मंत्रों का साक्षात् करने वाली नारियां हों, उस धर्म में नारियों को वेद पढ़ने से रोकना महान पाप और वेद-विरुद्ध आचरण है।
4. 'वेदोद्यान के चुने हुए फूल': वैदिक ऋचाओं का काव्यात्मक और आध्यात्मिक दर्शन
वेद ज्ञान का एक असीम महासागर हैं, जिसे समझना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन हो सकता है। जनसाधारण को वेदों की मधुरता और उनके आध्यात्मिक सौन्दर्य से परिचित कराने के लिए आचार्य प्रियव्रत जी ने "वेदोद्यान के चुने हुए फूल" (Vedodyaan Ke Chune Hue Phool) नामक एक अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय ग्रन्थ की रचना की।
इस पुस्तक में उन्होंने चारों वेदों रूपी उद्यान (बगीचे) से चुन-चुन कर उन श्रेष्ठ मंत्रों (फूलों) का संकलन किया, जो मानव जीवन के नित्य-प्रति के व्यवहार, प्रार्थना, आत्म-बल और शांति से जुड़े हैं।
आचार्य जी का अनुवाद कोरा शाब्दिक नहीं था, बल्कि उसमें काव्यात्मक लालित्य (Poetic grace) और दार्शनिक गहराई थी। उन्होंने अथर्ववेद (10.8.15) "दूरे पूर्णेन वसति दूर ऊनेन हीयते..." की व्याख्या करते हुए लिखा कि परमात्मा अपनी पूर्णता के कारण सांसारिक इच्छाओं से 'दूर' (उत्कृष्ट) है। जो जीव स्वयं को उस पूर्ण (ईश्वर) के प्रति समर्पित कर देता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त होकर 'अमृत' स्वरूप हो जाता है। यह पुस्तक वेद को एक 'शुष्क विधि-निषेध' की किताब से निकालकर मनुष्य के 'हृदय का गीत' बना देती है।
5. 'वेदों में इन्द्र': पाश्चात्य बहुदेववाद का खण्डन और विशुद्ध एकेश्वरवाद
उन्नीसवीं सदी में जब पाश्चात्य विद्वानों (मैक्स मूलर, ग्रिफिथ, विट्जेल आदि) ने वेदों का अंग्रेजी अनुवाद किया, तो उन्होंने एक बहुत बड़ा भ्रम फैलाया। चूँकि ऋग्वेद में सबसे अधिक सूक्त 'इन्द्र' (Indra) के लिए आए हैं, अतः उन्होंने इन्द्र को आर्यों का एक आदिम कबीलाई देवता (Tribal God), वर्षा का देवता (Rain God), या एक ऐसा राजा मान लिया जो शराब (सोमरस) पीकर युद्ध लड़ता था। इस कुव्याख्या ने भारतीय संस्कृति को 'बहुदेववादी' (Polytheistic) और बर्बर सिद्ध करने का प्रयास किया।
आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति ने अपनी युगांतरकारी कृति "वेदों में इन्द्र" के माध्यम से इस पाश्चात्य मायाजाल को छिन्न-भिन्न कर दिया। उन्होंने यास्काचार्य के 'निरुक्त' और व्याकरण के धातु-पाठ का आश्रय लेकर यह सिद्ध किया कि वेदों में 'इन्द्र' किसी व्यक्ति या भौतिक देवता का नाम नहीं है।
यौगिक मीमांसा: आचार्य जी ने बताया कि 'इन्द्र' शब्द 'इदम्' (यह सब) और 'दृश्' (देखने वाला) के योग से भी बनता है। उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है कि "उसने इस सम्पूर्ण जगत को देखा, इसलिए वह इदन्द्र (इन्द्र) है।" अतः इन्द्र साक्षात् परब्रह्म परमात्मा (Supreme Lord) का ही नाम है, जो अपनी विद्युत रूपी शक्ति (वज्र) से अज्ञान और पाप रूपी 'वृत्रासुर' (अन्धकार के बादल) का नाश करता है।
आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में, मानव शरीर में जो 'जीवात्मा' है, जो इन्द्रियों का स्वामी है, उसे भी वेद में 'इन्द्र' कहा गया है। सोमरस कोई नशीली शराब नहीं है, बल्कि वह 'भक्ति और ज्ञान का रस' (Spiritual Bliss) है, जिसे पीकर जीवात्मा (इन्द्र) बलवान होता है और काम-क्रोध रूपी राक्षसों को मारता है। यह पुस्तक वेदों पर लगाए गए अश्लीलता और बहुदेववाद के आक्षेपों का सबसे प्रामाणिक उत्तर है।
6. 'वेद का राष्ट्रिय गीत': राष्ट्रवाद, राजनीति और भूमि-सूक्त का अमर सन्देश
आज जब 'राष्ट्रवाद' (Nationalism) पर विश्व भर में तरह-तरह की बहसें छिड़ी हुई हैं, आचार्य प्रियव्रत जी की पुस्तक "वेद का राष्ट्रिय गीत" (National Song of the Vedas) वैदिक राजनीति और राज्य-व्यवस्था का एक अत्यंत उत्कृष्ट मॉडल प्रस्तुत करती है।
इस पुस्तक का मूल आधार अथर्ववेद का 12वाँ काण्ड— 'भूमि सूक्त' (पृथ्वी सूक्त) है। आचार्य जी ने 63 मन्त्रों वाले इस सूक्त को मानव इतिहास का प्रथम 'राष्ट्रीय घोषणापत्र' (National Manifesto) घोषित किया।
- मातृभूमि की अवधारणा: "माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः"। उन्होंने समझाया कि पाश्चात्य राष्ट्रवाद जहाँ 'अधिकार' (Rights) और 'विस्तारवाद' पर आधारित है, वहीं वैदिक राष्ट्रवाद 'कर्तव्य' और 'मातृत्व' के भाव पर आधारित है। भूमि एक मृत भूखंड नहीं है, वह एक सजीव माता है।
- विविधता में एकता (Unity in Diversity): भूमि सूक्त के मन्त्र "जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसम्..." का भाष्य करते हुए उन्होंने लिखा कि वैदिक राष्ट्र वह है जो अनेक भाषाएँ बोलने वाले, अनेक धर्म-स्वभावों को मानने वाले लोगों को एक माता के समान बिना किसी भेदभाव के धारण करता है। यह एक 'समावेशी' (Inclusive) राष्ट्रवाद है, जो किसी भी प्रकार की कट्टरता (Fanaticism) को नकारता है।
- पर्यावरण संरक्षण: उन्होंने वैदिक मंत्रों के आधार पर बताया कि राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों (जल, जंगल, खनिज) का दोहन इस प्रकार होना चाहिए कि मातृभूमि के मर्म (हृदय) को पीड़ा न पहुंचे।
7. 'वेदों में लोक कल्याण': वैदिक अर्थशास्त्र और सामाजिक समरसता का मॉडल
समाजवाद (Socialism) और पूंजीवाद (Capitalism) के द्वंद्व के बीच, आचार्य प्रियव्रत जी ने अपनी पुस्तक "वेदों में लोक कल्याण" (Vedon mein Lok Kalyan) के माध्यम से वैदिक अर्थशास्त्र (Vedic Economics) का तीसरा और सबसे संतुलित मार्ग प्रस्तुत किया।
आचार्य जी का तर्क था कि वेद का लक्ष्य केवल व्यक्ति का मोक्ष नहीं है, बल्कि समाज का 'सर्वोदय' है। ऋग्वेद के मन्त्र "केवलाघो भवति केवलादी" (जो केवल अपने लिए खाता है, वह केवल पाप खाता है) की व्याख्या करते हुए उन्होंने संपत्ति के अति-संचय (Hoarding of wealth) को समाज के लिए घातक बताया।
वेदों की 'यज्ञीय संस्कृति' हमें सिखाती है कि जो कुछ भी हम अर्जित करते हैं, उस पर "इदन्न मम" (यह मेरा नहीं है) का भाव रखें। व्यक्ति को धन कमाने की पूर्ण स्वतंत्रता है ("शतहस्त समाहर" - सौ हाथों से कमाओ), परन्तु उसे समाज के कल्याण के लिए दान करने का भी कड़ा निर्देश है ("सहस्रहस्त संकिर" - हजार हाथों से बाँटो)। यह 'लोक कल्याण' का वह वैदिक प्रारूप है जो समाज से दरिद्रता और आर्थिक असमानता को दूर करता है।
8. इतिहास-लेखन व सम्पादन: 'आर्य समाज का इतिहास' का संरक्षण
एक प्रकांड वैदिक भाष्यकार होने के साथ-साथ, आचार्य प्रियव्रत जी में इतिहास-बोध (Historical sense) भी कूट-कूट कर भरा था। वे जानते थे कि किसी भी संस्था या विचारधारा को जीवित रखने के लिए उसके इतिहास का प्रामाणिक दस्तावेज़ीकरण आवश्यक है।
उन्होंने प्रख्यात इतिहासकार डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार (डी. लिट., पेरिस) के साथ मिलकर "आर्य समाज का इतिहास" (प्रधान सम्पादक मण्डल के सदस्य के रूप में) जैसे वृहद् ऐतिहासिक ग्रन्थ के सम्पादन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सुनिश्चित किया कि महर्षि दयानन्द के पश्चात आर्य समाज के विद्वानों, बलिदानियों और संस्थाओं (जैसे गुरुकुल और डी.ए.वी.) के अवदान को सत्यता और ऐतिहासिक प्रामाणिकता के साथ लिपिबद्ध किया जाए।
9. शैक्षणिक दर्शन: आधुनिकता और प्राच्य-विद्या का अद्भुत समन्वय
गुरुकुल कांगड़ी के कुलपति के रूप में आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति का शैक्षणिक दर्शन (Educational Philosophy) लार्ड मैकाले (Lord Macaulay) की 'क्लर्क बनाने वाली' शिक्षा पद्धति के सर्वथा विपरीत था।
उनका स्पष्ट मत था कि एक छात्र को वेदों, उपनिषदों और दर्शन का ज्ञान तो होना ही चाहिए, किन्तु इसके साथ-साथ उसे आधुनिक विज्ञान, गणित, और राजनीति शास्त्र का भी अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने 'चरित्र-निर्माण' (Character Building), 'ब्रह्मचर्य', और 'स्वावलंबन' को शिक्षा का प्राण माना। वे चाहते थे कि भारत का युवा केवल डिग्रियां लेकर न घूमे, बल्कि उसके भीतर एक 'तेज' (Radiance) हो, जो उसे समाज के अन्याय से लड़ने और राष्ट्र-निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित करे।
10. निष्कर्ष: इक्कीसवीं सदी में आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति की प्रासंगिकता
आचार्य पण्डित प्रियव्रत वेदवाचस्पति मात्र एक लेखक या प्रोफेसर नहीं थे; वे महर्षि दयानन्द की वैचारिक क्रान्ति के एक सशक्त सारथी (Charioteer) थे।
आज जब हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं और दुनिया जेंडर-इक्वालिटी (Gender Equality), मानवाधिकार (Human Rights), और सतत विकास (Sustainable Development) की बात कर रही है, तो हमें आश्चर्य होता है कि इन सभी आधुनिक विचारों के बीज आचार्य प्रियव्रत ने अपनी 'मेरा धर्म' और 'वेद का राष्ट्रिय गीत' जैसी पुस्तकों में दशकों पहले ही वैदिक मंत्रों के आधार पर बो दिए थे।
उनका साहित्य हमें यह विश्वास दिलाता है कि "वेद मनुष्य मात्र का धर्मग्रंथ है"— यह किसी एक जाति, लिंग या देश की संपत्ति नहीं है। जो भी व्यक्ति वैदिक दर्शन के मूल रहस्य, उसकी काव्यात्मक सुंदरता और उसके समाज-विज्ञान को समझना चाहता है, उसके लिए आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति के ग्रन्थ आज भी एक दीपस्तंभ (Lighthouse) के समान प्रकाशमान हैं। आर्य समाज और वैश्विक प्राच्यविद्या (Indology) का जगत उनके इस महान और भगीरथ अवदान का सदैव ऋणी रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- मेरा धर्म - पण्डित प्रियव्रत वेदवाचस्पति (प्रकाशन मन्दिर, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार)।
- वेदोद्यान के चुने हुए फूल - पण्डित प्रियव्रत वेदवाचस्पति (आर्ष साहित्य प्रकाशन)।
- वेद का राष्ट्रिय गीत (National Song of the Vedas) - पण्डित प्रियव्रत वेदवाचस्पति।
- वेदों में इन्द्र एवं वेदों में लोक कल्याण - आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति।
- आर्य समाज का इतिहास (विभिन्न खण्ड) - सम्पादक: डा० सत्यकेतु विद्यालंकार एवं सम्पादक मण्डल।
- हिन्दू धर्म में नारी की महिमा (Vedic Feminism and Women's Rights in ancient India) - संदर्भित शोध पत्र।
