ऋभु (Ribhu)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि ऋभु: कर्म और कौशल से देवत्व प्राप्त करने वाले वैदिक शिल्पकार

महर्षि ऋभु: कर्म और कौशल से देवत्व प्राप्त करने वाले प्रखर वैदिक शिल्पी

शोधपरक और आध्यात्मिक आलेख (Deified Mortals & Ancient Vedic Artisans)

ऋग्वेद में ऋभु (Ribhu) उन विलक्षण सत्ताओं का नाम है जो जन्म से मरणधर्मा मनुष्य थे, किन्तु अपने असाधारण कर्मों और बुद्धि-कौशल के कारण अमर होकर देवता बन गए। वे तीन भाई थे—ऋभु, विभ्वा (Vibhvan) और वाज (Vaja)। उन्हें सामूहिक रूप से 'ऋभु' कहा जाता है। वे महर्षि अंगिरा के वंशज सुधन्वा के पुत्र थे। ऋभुओं की कथा यह सिद्ध करती है कि सनातन परंपरा में पद जन्म से नहीं, बल्कि पुरुषार्थ और कौशल (Skill) से प्राप्त किया जा सकता है।

📌 ऋभु गण: एक दृष्टि में
पिता सुधन्वा (अंगिरा कुल)
तीन भाई ऋभु, विभ्वा और वाज
सम्बन्धित वेद ऋग्वेद (11 सूक्त पूर्णतः उन्हें समर्पित)
विशेष सिद्धि मरणधर्मा से अमरत्व की प्राप्ति (Deification)
यज्ञ भाग तृतीय सवन (Evening Libation) के देवता
आध्यात्मिक प्रतीक रचनात्मक बुद्धि और अथक परिश्रम
⏳ काल निर्धारण एवं युग
युग
ऋग्वैदिक काल (Early Vedic Period)वेदों के प्राचीनतम मंडलों में उनकी स्तुति मिलती है, जो उन्हें अत्यंत प्राचीन सिद्ध करती है।
सांस्कृतिक स्थिति
शिल्प और विज्ञान का उदययह वह समय था जब मनुष्य ने औजारों, रथों और पशुपालन में नवीन अविष्कारों के माध्यम से सभ्यता को उन्नत किया था।

1. ऋभुओं के पाँच अद्भुत चमत्कार

ऋग्वेद के अनुसार, ऋभुओं ने पाँच ऐसे कार्य किए जिससे प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें अपना सहभागी बनाया और सोमपान का अधिकार दिया:

  • एक पात्र के चार पात्र बनाना: उन्होंने देव-शिल्पी त्वष्टा द्वारा बनाए गए अमृत के एक चमत्कारी पात्र (चमस) को अपनी बुद्धि से चार भागों में विभक्त कर दिया।
  • अश्विनी कुमारों के लिए रथ: उन्होंने बिना घोड़ों के चलने वाला और मन की गति से उड़ने वाला एक त्रिचक्र रथ बनाया।
  • इंद्र के घोड़े: उन्होंने इंद्र के लिए 'हरि' नामक दो शक्तिशाली घोड़ों का निर्माण किया।
  • माता-पिता का कायाकल्प: उन्होंने अपने वृद्ध और जर्जर माता-पिता को अपनी योग-शक्ति और औषधि-विज्ञान से पुनः युवा बना दिया।
  • मृत गौ को जीवित करना: उन्होंने एक मृत गाय के चमड़े से पुनः जीवित गाय का निर्माण किया, जो दूध देने में सक्षम थी।

2. दार्शनिक संदेश: कौशल ही उपासना है

ऋभु शब्द 'रभ्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है—'पकड़ना' या 'कार्य में लगना'। ऋभु उस 'ऋत' (Universal Order) के शिल्पी हैं जो संसार को व्यवस्थित करते हैं।

"सौधन्वनास ऋभवो विष्ट्वी शमी।" अर्थ: सुधन्वा के पुत्र ऋभुओं ने अपने कार्यों (शमी) के द्वारा अमरत्व प्राप्त किया। — (ऋग्वेद 1.110.4)

उनका दर्शन यह है कि यदि कोई मनुष्य अपने शिल्प, कला या विज्ञान में पूर्णता (Perfection) प्राप्त कर ले, तो वह भौतिक जगत की सीमाओं को लांघकर दिव्य पद को प्राप्त कर सकता है। वे 'श्रम की गरिमा' (Dignity of Labor) के प्रथम वैदिक प्रतीक हैं।

3. निष्कर्ष

महर्षि ऋभु की गाथा हमें कर्मवादी होने का संदेश देती है। वे सिखाते हैं कि देवत्व केवल प्रार्थना से नहीं, बल्कि रचनात्मकता और लोक-कल्याणकारी अविष्कारों से भी पाया जा सकता है। जहाँ विश्वकर्मा देवताओं के जन्मजात शिल्पी हैं, वहीं ऋभु "मानव से देवता" बनने वाले शिल्पी हैं। आज के विज्ञान और तकनीक के युग में ऋभुओं का आदर्श और भी प्रासंगिक हो जाता है।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • ऋग्वेद संहिता (प्रथम, चतुर्थ और दशम मंडल)।
  • निरुक्त (यास्क मुनि) - ऋभु निर्वचन।
  • वैदिक साहित्य एवं संस्कृति - आचार्य बलदेव उपाध्याय।
  • Aitareya Brahmana - Connection with Savanas.

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