आचार्य रत्नकीर्ति: 'क्षणभंगवाद' के अजेय योद्धा, विज्ञानवाद के शिखर और ईश्वर-निषेध के तार्किक
एक गहन दार्शनिक मीमांसा और 'अपोह-सिद्धि' का विश्लेषण (A Scholarly Treatise on Ratnakirti and Buddhist Logic)
- 1. प्रस्तावना: विक्रमशिला का अंतिम दार्शनिक वैभव
- 2. जीवन और काल: नैयायिकों से बौद्धिक युद्ध
- 3. क्षणभंगवाद: अस्तित्व का तार्किक समीकरण
- 4. अपोह-सिद्धि: शब्द और अर्थ का नकारात्मक संबंध
- 5. ईश्वर-साधन-दूषण: ईश्वरवाद का तार्किक खंडन
- 6. अंतर्व्याप्ति-समर्थन: तर्कशास्त्र में क्रांति
- 7. प्रभाव और निष्कर्ष: नव्य-न्याय की नींव
भारतीय तर्कशास्त्र (Indian Logic) के इतिहास में 11वीं शताब्दी एक निर्णायक मोड़ थी। एक ओर वैदिक न्याय परंपरा में उदयनाचार्य ईश्वर की सत्ता सिद्ध कर रहे थे, तो दूसरी ओर विक्रमशिला विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक बौद्ध विद्वान अपनी लेखनी से उन तर्कों को काट रहा था। वे थे—आचार्य रत्नकीर्ति (Ratnakirti)। वे 'दिग्नाग' और 'धर्मकीर्ति' की परंपरा के अंतिम महान स्तंभ थे। उन्होंने सिद्ध किया कि जो भी 'सत्' (Real) है, वह अनिवार्य रूप से 'क्षणिक' (Momentary) है।
उनका दर्शन 'योगाचार-विज्ञानवाद' और 'बौद्ध प्रमाण-शास्त्र' का संगम है। उनके ग्रंथ 'रत्नकीर्ति-निबंधावली' में तर्कशास्त्र की ऐसी सूक्ष्मता है जिसने बाद में 'नव्य-न्याय' के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
| नाम | आचार्य रत्नकीर्ति (Mahapandita Ratnakirti) |
| काल | 11वीं शताब्दी (लगभग 1000–1050 ईस्वी) |
| स्थान/कार्यक्षेत्र | विक्रमशिला महाविहार (बिहार, भारत) |
| संप्रदाय | बौद्ध योगाचार (साकार विज्ञानवाद) और प्रमाण-शास्त्र |
| गुरु | ज्ञानश्री मित्र (Jnanasrimitra) |
| प्रमुख ग्रंथ | अपोहसिद्धि, क्षणभंगसिद्धि, ईश्वर-साधन-दूषण, अंतर्व्याप्ति-समर्थन |
| मुख्य सिद्धांत | क्षणभंगवाद (Momentariness), अंतर्व्याप्ति (Internal Concomitance) |
2. जीवन और काल: नैयायिकों से बौद्धिक युद्ध
रत्नकीर्ति विक्रमशिला विश्वविद्यालय के 'द्वार-पंडित' (Gatekeeper Scholar) के पद पर आसीन थे, जो उस समय विद्वता का सर्वोच्च सम्मान था। उनके गुरु ज्ञानश्री मित्र थे, जिन्होंने 'चित्राद्वैतवाद' (Non-dualism of variegated cognition) का प्रतिपादन किया था।
रत्नकीर्ति का पूरा जीवन वैदिक नैयायिकों, विशेषकर त्रिलोचन, वाचस्पति मिश्र और उनके समकालीन उदयनाचार्य के मतों का खंडन करने में बीता। यह वह समय था जब भारतीय दर्शन में 'ईश्वर' (God) और 'आत्मा' (Soul) के अस्तित्व को लेकर सबसे घनघोर तार्किक युद्ध चल रहा था। रत्नकीर्ति ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से न्याय के तर्कों में छिपे विरोधाभासों (Fallacies) को उजागर किया।
3. क्षणभंगवाद: अस्तित्व का तार्किक समीकरण
बौद्ध दर्शन का आधार है—"सर्वं क्षणिकम्" (सब कुछ क्षणिक है)। लेकिन न्याय-वैशेषिक और मीमांसक मानते थे कि आत्मा और ईश्वर 'नित्य' (Permanent) हैं। रत्नकीर्ति ने 'सत्' (Existence) की नई परिभाषा देकर नित्यत्व का खंडन किया।
अर्थक्रियाकारित्व का तर्क (Causal Efficiency)
रत्नकीर्ति का तर्क है कि किसी वस्तु के 'होने' (Existence) का मतलब है—उसमें 'कुछ करने' (Effect) की क्षमता होना। इसे अर्थक्रियाकारित्व कहते हैं।
सन्तश्च भावाः अमी, इति स्वभावहेतुः॥" अर्थ: (क्षणभंगसिद्धि) जो कुछ भी 'सत्' (अस्तित्ववान) है, वह अनिवार्य रूप से 'क्षणिक' है, जैसे कि बादलों का समूह। और ये सभी पदार्थ (घड़ा, पहाड़ आदि) सत् हैं (क्योंकि ये कार्य करते हैं), अतः ये क्षणिक हैं।
रत्नकीर्ति पूछते हैं: "यदि कोई वस्तु (जैसे ईश्वर) नित्य और अपरिवर्तनीय है, तो वह कार्य कैसे करेगी?"
1. क्या वह सारे कार्य एक साथ (Simultaneously) करती है?
2. या क्रमशः (Successively) करती है?
निष्कर्ष: यदि नित्य ईश्वर सब कुछ एक साथ बना देता है, तो बाद में वह 'अकर्ता' हो जाएगा (उसका अस्तित्व व्यर्थ है)। यदि वह क्रमशः बनाता है, तो उसमें बदलाव (Change) आ रहा है। जो बदलता है, वह नित्य नहीं हो सकता। अतः "सत्ता केवल क्षणिक वस्तु में ही संभव है।"
4. अपोह-सिद्धि: शब्द और अर्थ का नकारात्मक संबंध
शब्द (Words) का अर्थ क्या है? न्याय मानता है कि 'गाय' शब्द का अर्थ एक सामान्य 'गोत्व' (Universal Cowhood) है जो सभी गायों में रहता है। रत्नकीर्ति ने इस 'सामान्य' (Universal) का खंडन किया और 'अपोह' (Exclusion) सिद्धांत को परिष्कृत किया।
सिद्धांत: शब्द किसी वस्तु के स्वरूप को नहीं बताते, बल्कि वे केवल यह बताते हैं कि वह वस्तु "क्या नहीं है"।
नापि निषेधमात्रम्, किन्तु विधिरेव निषेधावंगिनिष्ठः।" अर्थ: (अपोहसिद्धि) 'अपोह' शब्द से हम न तो केवल सकारात्मक विधि (Affirmation) कहते हैं और न ही केवल नकारात्मक निषेध (Negation)। बल्कि हम उस 'विधि' (विशिष्ट व्यक्ति) को मानते हैं जो अन्य-व्यावृत्ति (दूसरों से अलग होने) से विशिष्ट है।
उदाहरण: 'गाय' का अर्थ है—"जो अगौ (Non-cow) नहीं है।" रत्नकीर्ति ने दिगनाग के केवल नकारात्मक अपोह में सकारात्मक तत्व (Positive substratum) को भी जोड़ा, जो एक दार्शनिक क्रांति थी।
5. ईश्वर-साधन-दूषण: ईश्वरवाद का तार्किक खंडन
उदयनाचार्य और अन्य नैयायिक तर्क देते थे: "जगत एक कार्य (Effect) है, इसलिए इसका कोई कर्ता (Maker) होना चाहिए, जैसे घड़े का कुम्हार। वह कर्ता ईश्वर है।"
रत्नकीर्ति ने अपने ग्रंथ 'ईश्वर-साधन-दूषण' में इस अनुमान (Inference) को दूषित सिद्ध किया।
- दृष्टांत की अनुपस्थिति: वे कहते हैं कि हमने कुम्हार को घड़ा बनाते देखा है, इसलिए वहां व्याप्ति (संबंध) है। लेकिन हमने किसी "अशरीरी ईश्वर" को ब्रह्मांड बनाते कभी नहीं देखा।
- व्याप्ति का अभाव: 'कार्य' होने मात्र से किसी 'बुद्धिमान कर्ता' का होना सिद्ध नहीं होता। जंगल में पेड़ उगते हैं, घास उगती है (कार्य), पर वहां कोई माली नहीं होता। अतः सृष्टि प्राकृतिक कारणों से भी हो सकती है।
6. अंतर्व्याप्ति-समर्थन: तर्कशास्त्र में क्रांति
रत्नकीर्ति का सबसे मौलिक योगदान 'अंतर्व्याप्ति' (Internal Concomitance) का सिद्धांत है। उनसे पहले तर्कशास्त्र में उदाहरण (Example/दृष्टांत) देना जरूरी था।
(जैसे: जहाँ धुआँ है वहां आग है, रसोईघर की तरह।)
रत्नकीर्ति ने कहा कि यदि तर्क शुद्ध है, तो बाहरी उदाहरण (रसोईघर) की जरूरत नहीं है। व्याप्ति (Relation) पक्ष (Subject) के भीतर ही सिद्ध होनी चाहिए।
इस सिद्धांत ने भारतीय तर्कशास्त्र को अनुभवमूलक (Empirical) से हटाकर विशुद्ध तार्किक (Purely Logical) बना दिया।
7. प्रभाव और निष्कर्ष: नव्य-न्याय की नींव
आचार्य रत्नकीर्ति के बाद भारत में बौद्ध धर्म का पतन हो गया, लेकिन उनके तर्क मरे नहीं। 12वीं शताब्दी के बाद, मिथिला और बंगाल के नैयायिकों (जैसे गंगेश उपाध्याय) ने रत्नकीर्ति के तर्कों का उत्तर देने के लिए ही अपनी न्याय प्रणाली को और अधिक सूक्ष्म (Precise) बनाया, जिससे 'नव्य-न्याय' (Navya-Nyaya) का जन्म हुआ।
रत्नकीर्ति एक ऐसे दार्शनिक थे जिन्होंने दिखाया कि 'स्थायित्व' (Permanence) एक भ्रम है। जीवन का सत्य केवल 'प्रवाह' (Flux) है। उनका दर्शन आज के 'क्वांटम फिजिक्स' (Quantum Physics) के अनिश्चितता सिद्धांत और क्षणिक कणों के व्यवहार के अत्यंत निकट प्रतीत होता है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- रत्नकीर्तिनिबंधावली (Ratnakirtinibandhavali) - (Anantlal Thakur Ed., Patna).
- Buddhist Logic (Vol 1 & 2) - Th. Stcherbatsky.
- Ratnakirti’s Proof of Momentariness - A.C. Senapeyyam.
- Apohasiddhi - (Translated by D. Sharma).
- Materials for the Study of Navya-Nyaya Logic - Daniel Ingalls.
