सत्य की खोज: परमात्मा दूर नहीं, हमारे भीतर है
सत्य की खोज में जो भी निकले हैं, उन सबको ऐसा ही प्रतीत होता है कि सत्य बहुत दूर है। प्रतीति का कारण है, क्योंकि मिलता नहीं। इतना चलते हैं और मिलता नहीं। तो निश्चित ही दूर होगा।
यह तार्किक निष्पत्ति है कि बहुत चलकर भी जिसे न पाया जा सके, स्वभावतः मानना होगा बहुत दूर है। हमारे छोटे-छोटे पग, हमारी छोटी-छोटी आंखें, हमारे छोटे-छोटे हाथ उस तक नहीं पहुंच पाते। शायद अनंत दूरी है हमारे और उसके बीच।
तर्क की सीमा और सत्य का दर्शन
लेकिन तर्क की यह निष्पत्ति तार्किक भले दिखाई पड़े, सत्य नहीं है। परमात्मा दूर नहीं है। परमात्मा निकट से भी निकट है। उसे चलकर पाने की जो चेष्टा करेगा, उसके लिए दूर हो जाता है। उसे बैठकर जो पाना चाहेगा, तत्क्षण पा लेता है। चले कि भटके। रुके कि पहुंचे।
इस सूत्र को, इस स्वर्ण-सूत्र को हृदय में सम्हाल कर रख लेना चाहिए। क्योंकि परमात्मा व्यक्ति के अंतरतम में विराजमान ही है।
क्रिया नहीं, अक्रिया है ध्यान
परमात्मा इसलिए नहीं मिलता कि दूर है, बल्कि इसलिए नहीं मिलता है कि इतने पास है, इतने पास है कि आंख खोली कि दूर हो गया। आंख बंद रखी तो सामने है। हाथ फैलाया कि दूर हो गया। क्योंकि हाथ के भीतर भी वह मौजूद है। पग बढ़ाया कि चूके, क्योंकि पग जिसने बढ़ाया, वही वह है। क्रिया से परमात्मा नहीं पाया जाता है, पाया जाता है अक्रिया से। उस अक्रिया में ठहरने को ध्यान कहा गया है।
और अक्रिया केवल देह की नहीं, मन की। देह से तो कोई भी बैठ सकता है। बहुत लोग आसन लगाए बैठे हैं गुफाओं में, वृक्षों के नीचे। आसन तो लगा है, लेकिन मन का आसन नहीं लगा है। तन तो ठहर गया, लेकिन मन कहीं और जगह गया है।
भगवान के चरण कहाँ हैं?
कहते हैं, भगवान के चरण में ध्यान। भगवान के चरण कहां हैं? काशी में, काबा में, कैलाश में? सत्य तो यह है कि भगवान का चरण हृदय में विराजमान है। किसी मंदिर में नहीं जाना। हृदय की सीढ़ियों से उतरने पर ही भगवान को पाया जा सकता है।

