॥ श्री हनुमान चरित ॥
बल, बुद्धि और विद्या के सागर का दिव्य एवं दार्शनिक विश्लेषण
॥ १. पिता और पुत्र का अद्भुत मिलन
पाताल लोक के द्वार पर एक जैसा रूप, एक जैसा तेज और एक जैसा अपार बल—यही पिता और पुत्र की पहचान थी. जब हनुमान जी ने मकरध्वज को देखा, तो वे अपनी ही प्रकृति का प्रतिबिंब देखकर स्तब्ध रह गए. उन्होंने विस्मय से पूछा, "तुम कौन हो?" मकरध्वज ने विनम्रता और गर्व के साथ उत्तर दिया, "मैं हनुमान का पुत्र हूँ।"
यह संबोधन हनुमान जी के जीवन का सबसे विचित्र क्षण था. जो मारुतिनंदन प्रतिक्षण अपनी लीलाओं से तीनों लोकों को अचरज में डालते थे, आज वे स्वयं एक पुत्र के मुख से 'पिता' शब्द सुनकर अचरज में थे. उन्होंने सोचा, "मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूँ, फिर यह पुत्र कैसे संभव है?"
यह युद्ध केवल दो योद्धाओं का नहीं, बल्कि 'मारुति बल' के दो भागों का था. एक तरफ राम-काज की निष्ठा थी, तो दूसरी तरफ स्वामी-भक्ति (अहिरावण के प्रति) का धर्म था. अंततः पिता ने पुत्र को परास्त कर उसकी पूंछ से उसे बांध दिया. कालांतर में, अहिरावण के वध के पश्चात, हनुमान जी ने ही मकरध्वज का राजतिलक किया और पाताल में भी रामराज्य की स्थापना हुई.
॥ २. अक्षर विश्व और वेद विज्ञान
यह लेख और मेरे द्वारा कहे गए शब्द 'अक्षर विश्व' (Word World) के अंतर्गत आते हैं. कितनी विचित्र विडंबना है कि हम अक्षरों के माध्यम से उस तत्व (अध्यात्म) को समझाने का प्रयास कर रहे हैं जो अक्षरों से परे है. अक्षर विश्व की अपनी सीमाएं और कमजोरियां हैं; यह शंका और कुशंका उत्पन्न करता है.
विशुद्ध अध्यात्म अक्षरों तक सीमित नहीं है. वेदों की रचना में 'शब्दार्थ' (Literal Meaning) का महत्व शून्य है; वेद तो स्पंदनमयी (Vibrational) हैं.
उदाहरण के लिए, वेदों में शिव को 'कामदेव' या 'कामी' कहा गया है. आज के युग में इसका अर्थ विकृत हो गया है, किंतु अध्यात्म में 'कामी' का अर्थ है—"अपने भक्तों की कामनाओं की पूर्ति के लिए सदैव कार्य करने वाली देव शक्ति".
॥ ३. जब हनुमान का गर्व चूर हुआ
आनंद रामायण का एक प्रसंग है। लंका से माता सीता की चूड़ामणि लेकर लौटते समय हनुमान जी के मन में सूक्ष्म अहंकार आ गया कि "मैं ही राम का कार्य कर सकता हूँ". मार्ग में उन्हें एक तपस्वी मिला। हनुमान जी सरोवर में स्नान करने गए, तभी एक वानर ने उनकी चूड़ामणि उठाकर तपस्वी के कमंडल में डाल दी.
जब हनुमान जी ने कमंडल में देखा, तो वे भौचक्के रह गए। वहां एक नहीं, बल्कि हजारों चूड़ामणियाँ पड़ी थीं. वे समझ नहीं पाए कि असली कौन सी है। तब उस तपस्वी (जो स्वयं महाकाल थे) ने रहस्य खोला:
हनुमान जी समझ गए कि वे काल के एक विशाल चक्र का हिस्सा मात्र हैं। महाकाल ने उन्हें काल-ज्ञान की शिक्षा दी, जो अक्षर विश्व के माध्यम से संभव नहीं थी.
॥ ४. हनुमद् रामायण का त्याग
महर्षि वाल्मीकि रामकथा के 'साक्षी' थे, उन्होंने प्रभु को देखा था. उनकी रामायण 'प्राकृतिक' है. वहीं तुलसीदास जी की रामायण 'अनुभूत' (Realized) है, जो ५०० वर्ष पुरानी है.
किंतु एक रामायण स्वयं हनुमान जी ने अपने नाखूनों से पर्वत की शिलाओं पर लिखी थी—हनुमद् रामायण. जब वाल्मीकि जी ने उसे पढ़ा, तो वे निराश हो गए क्योंकि हनुमान जी की रचना के सामने उनकी रामायण फीकी थी. वाल्मीकि को चिंतित देख, भक्तशिरोमणि हनुमान ने एक क्षण भी नहीं सोचा.
उन्होंने वाल्मीकि को एक कंधे पर बिठाया और दूसरे हाथ से अपनी लिखी उस दिव्य रामायण की शिलाओं को समुद्र में डुबो दिया, ताकि वाल्मीकि की रचना अमर रहे.
॥ ५. वानर तत्त्व: चपलता और शक्ति
वेदों में वानर को 'शाखामृग' (शाखाओं पर रहने वाला हिरण) कहा गया है. वानर तत्त्व केवल एक जीव नहीं, बल्कि एक विहंगम और अति-बलवान जीवन ऊर्जा का प्रतीक है. यह सृष्टि का सबसे चपल जीव है, जो जल, थल और नभ तीनों में गति कर सकता है.
अध्यात्म के पथ पर भी वानर जैसी चपलता और 'मारुति बल' की आवश्यकता होती है. यहाँ अनिश्चितता ही निश्चित है—कभी १२ वर्ष की तपस्या से कुछ नहीं मिलता, और कभी एक क्षण में इष्ट का साक्षात्कार हो जाता है.

