स्वामी ओमानंद सरस्वती: वैदिक संस्कृति के रक्षक, प्राचीन लिपियों के शोधकर्ता और झज्जर संग्रहालय के संस्थापक | Swami Omanand Saraswati

Sooraj Krishna Shastri
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स्वामी ओमानंद सरस्वती: वैदिक संस्कृति और प्राचीन लिपियों के सन्यासी-शोधकर्ता

स्वामी ओमानंद सरस्वती: वैदिक संस्कृति के रक्षक और प्राचीन लिपियों के सन्यासी-शोधकर्ता

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक और पुरातात्विक विश्लेषण: आधुनिक भारत के वह अनूठे संन्यासी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन टीलों की खुदाई करने, प्राचीन सिक्कों को खोजने और वैदिक आर्यावर्त के गौरवशाली 'गणराज्यों' (Republics) के इतिहास को सप्रमाण सिद्ध करने में लगा दिया। (The Ascetic Archaeologist of Haryana)

भारत के बौद्धिक इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं जहाँ कोई संन्यासी (Monk) भगवा वस्त्र पहनकर जंगलों और पहाड़ियों में 'मोक्ष' खोजने के बजाय, प्राचीन टीलों (Mounds) की खुदाई कर रहा हो और अपनी झोली में प्राचीन सिक्के (Coins), मुहरें (Seals) और भूर्जपत्र बटोर रहा हो। स्वामी ओमानंद सरस्वती (Swami Omanand Saraswati) एक ऐसे ही विरले महापुरुष थे।

उनका मानना था कि वैदिक संस्कृति और प्राचीन भारत के गौरव को केवल 'भाषणों' से सिद्ध नहीं किया जा सकता; इसके लिए ठोस पुरातात्विक साक्ष्यों (Tangible Archaeological Evidences) की आवश्यकता है। उन्होंने हरियाणा के झज्जर में देश का सबसे अनूठा और विशाल 'पुरातत्व संग्रहालय' स्थापित किया, जो आज भी प्राचीन भारतीय इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए एक मक्का (Mecca) के समान है।

📌 स्वामी ओमानंद सरस्वती: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
मूल नाम भगवान सिंह (गुरुकुल में 'आचार्य भगवान देव' के नाम से प्रसिद्ध)
जन्म एवं मृत्यु (काल निर्धारण) जन्म: मार्च 1910 (नरेला, दिल्ली के निकट)।
मृत्यु: 23 मार्च 2003 (नई दिल्ली)।
(93 वर्ष का सुदीर्घ और अत्यंत सक्रिय जीवन)।
संस्थापक/निदेशक हरियाणा प्रान्तीय पुरातत्व संग्रहालय (गुरुकुल झज्जर, स्थापित 1959)
शोध का मुख्य विषय मुद्राशास्त्र (Numismatics), प्राचीन लिपियां (Epigraphy), और वैदिक गणराज्य (यौधेय गण)।
प्रमुख ग्रंथ 'प्राचीन भारत के यौधेय गण' (Ancient Yaudheya Republics of India)।
सम्मान भारत सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय पंडित' तथा हरियाणा सरकार द्वारा 'संस्कृत पंडित' की उपाधि।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: नरेला से झज्जर तक की यात्रा

स्वामी ओमानंद सरस्वती का जन्म मार्च 1910 में दिल्ली के निकट नरेला में हुआ था। उनके बचपन का नाम भगवान सिंह था। शिक्षा प्राप्ति के लिए वे आर्य समाज के गुरुकुल में प्रविष्ट हुए और बाद में 'आचार्य भगवान देव' के रूप में विख्यात हुए।

जब उन्होंने संन्यास की दीक्षा (Renunciation) ग्रहण की, तब उनका नाम स्वामी ओमानंद सरस्वती रखा गया। वे महर्षि दयानंद सरस्वती के राष्ट्रवाद और वैदिक विचारधारा से अत्यंत प्रभावित थे। अपना पूरा जीवन अविवाहित और एक निष्काम कर्मयोगी की तरह जीते हुए, उन्होंने 23 मार्च 2003 को 93 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में अपनी अंतिम सांस ली।

3. गुरुकुल झज्जर पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना

स्वामी जी का सबसे बड़ा और मूर्त (Physical) योगदान हरियाणा के झज्जर में पुरातात्विक संग्रहालय (Archaeological Museum) की स्थापना है।

वर्ष 1959 का ऐतिहासिक संकल्प

स्वामी ओमानंद जी ने एक झोला कंधे पर लटकाया और उत्तर भारत (विशेषकर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान) के गाँव-गाँव पैदल और बैलगाड़ी से घूमे। वे किसानों से आग्रह करते थे कि जुताई करते समय या टीलों की मिट्टी खोदते समय यदि कोई पुराना सिक्का या मूर्ति मिले, तो वे उसे गलाएं या फेंकें नहीं, बल्कि गुरुकुल को सौंप दें।

उनके इस जुनूनी प्रयास से 1959 में इस संग्रहालय की स्थापना हुई। आज इस संग्रहालय में हज़ारों प्राचीन मूर्तियां, टेराकोटा (पकी मिट्टी) की कलाकृतियां, और प्राचीन सिक्के सुरक्षित हैं, जिनमें से कुछ 5,000 वर्ष पुराने सिंधु-सरस्वती सभ्यता के काल के हैं। इस संग्रहालय में एक ऐसी अनूठी लकड़ी की चेन भी है जिसमें कोई जोड़ (Joint) नहीं है, और एक 'लचीला पत्थर' (Flexible stone) भी है जो विज्ञान के लिए आज भी कौतूहल है।

4. 'यौधेय गण' (Yaudheya Republic) का ऐतिहासिक शोध

प्राचीन वैदिक और महाभारत काल में भारत में राजाओं का नहीं, बल्कि 'गणराज्यों' (Republics/Democracies) का शासन होता था। इनमें सबसे वीर और शक्तिशाली गणराज्य 'यौधेय गण' था, जिसका उल्लेख पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' और समुद्रगुप्त के 'प्रयाग प्रशस्ति' में मिलता है।

पश्चिमी इतिहासकार यह मानने को तैयार नहीं थे कि प्राचीन भारत में एक विकसित 'लोकतांत्रिक' व्यवस्था थी। स्वामी ओमानंद सरस्वती ने रोहतक़ (प्राचीन रोहितक) और झज्जर के आस-पास की खुदाई में यौधेय गण के टकसालों (Mints - जहाँ सिक्के बनते थे) और उनकी मुहरों (Seals) के सांचे (Moulds) खोज निकाले।
उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "प्राचीन भारत के यौधेय गण" में इन सिक्कों के आधार पर सिद्ध किया कि वैदिक क्षत्रिय जनजातियों का अपना एक लोकतांत्रिक संविधान था और उन्होंने विदेशी कुषाणों (Kushanas) को पराजित करके आर्यावर्त की रक्षा की थी।

5. प्राचीन लिपियों (Brahmi & Kharoshthi) का अध्ययन और संरक्षण

प्राचीन सिक्के और मुहरें केवल धातु के टुकड़े नहीं होते, उन पर उस काल की लिपियों में इतिहास लिखा होता है। स्वामी ओमानंद जी को ब्राह्मी (Brahmi) और खरोष्ठी (Kharoshthi) जैसी प्राचीन भारतीय लिपियों (Epigraphy) का गहरा ज्ञान था।

मुहरों (Seals) का वाचन

गुरुकुल झज्जर संग्रहालय में लगभग 1440 प्राचीन मुहरें (Seals) हैं। स्वामी जी ने स्वयं इन मुहरों पर लिखी ब्राह्मी लिपि को पढ़ा। उन्होंने अग्रोहा (Agroha), नौरंगाबाद और भिवानी से प्राप्त मुहरों को डिकोड किया जिन पर 'पितृदत्त', 'जीवेकुनस भारद्वाज', 'हरिवरस' आदि नाम स्वास्तिक (Swastika) और शंख के प्रतीकों के साथ उकेरे गए थे।
इस लिपि-वाचन (Decipherment) ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्राचीन हरियाणा (कुरुक्षेत्र-ब्रह्मावर्त क्षेत्र) वैदिक ब्राह्मणों, व्यापारियों और क्षत्रियों की एक अत्यंत समृद्ध और साक्षर संस्कृति का केंद्र था।

6. वैदिक संस्कृति और पांडुलिपियों का संकलन

स्वामी ओमानंद सरस्वती केवल सिक्कों के संग्रहकर्ता नहीं थे, वे वेद-विद्या के भी परम उपासक थे।

उन्होंने महसूस किया कि भारत के पुराने घरों और मठों में संस्कृत, आयुर्वेद और वैदिक कर्मकांड की हज़ारों अमूल्य हस्तलिखित पांडुलिपियां (Manuscripts) दीमकों का भोजन बन रही हैं। उन्होंने पूरे देश से ऐसी हज़ारों प्राचीन पांडुलिपियां एकत्रित कीं और उन्हें झज्जर के पुस्तकालय में भावी शोधकर्ताओं के लिए वैज्ञानिक रूप से संरक्षित किया। यह उनका वैदिक ज्ञान परंपरा को बचाने का एक मौन लेकिन विराट महायज्ञ था।

7. आर्य समाज और सामाजिक क्रांतियों में योगदान

एक शिक्षाविद् (Educator) और पुरातात्विक होने के साथ-साथ, वे आर्य समाज के एक प्रखर नेता भी थे।

  • हिंदी और संस्कृत का उत्थान: उन्होंने गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के माध्यम से हज़ारों छात्रों को निःशुल्क शिक्षा, आवास और वैदिक संस्कार प्रदान किए।
  • गोरक्षा आंदोलन (1966): 1966 के ऐतिहासिक गोरक्षा आंदोलन में, स्वामी ओमानंद जी ने अग्रिम पंक्ति में रहकर नेतृत्व किया और वैदिक दर्शन के अनुरूप गो-धन की रक्षा के लिए सामाजिक चेतना जगाई।

8. निष्कर्ष: मिट्टी में सोना खोजने वाले आधुनिक ऋषि

स्वामी ओमानंद सरस्वती (1910-2003) का जीवन इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि एक 'संन्यासी' का कार्य केवल मोक्ष की साधना करना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र की 'सांस्कृतिक स्मृति' (Cultural Memory) को विस्मृति के गर्त से बाहर निकालना भी है।

जब आधुनिक विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर वातानुकूलित कमरों में बैठकर प्राचीन भारत के बारे में पश्चिमी किताबें पढ़ रहे थे, तब यह संन्यासी चिलचिलाती धूप में हरियाणा के टीलों से 'ब्राह्मी लिपि के सांचे' और 'यौधेय गणराज्यों के सिक्के' बटोर रहा था। आज हरियाणा सरकार द्वारा उनके नाम पर 100 करोड़ रुपये की लागत से झज्जर में नए 'स्वामी ओमानंद सरस्वती पुरातत्व संग्रहालय' का निर्माण किया जा रहा है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा के इस अमर साधक के प्रति राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजलि है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • प्राचीन भारत के यौधेय गण - स्वामी ओमानंद सरस्वती।
  • हरियाणा प्रान्तीय पुरातत्व संग्रहालय, झज्जर का कैटलॉग एवं इतिहास।
  • Society of Ancient Haryana Gleaned From The Seals At Gurukul Museum Jhajjar (Research Papers on Epigraphy).
  • आर्य समाज का इतिहास और आचार्य भगवान देव (स्वामी ओमानंद)।

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