पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास': वैदिक इतिहास और कालखंडों के वैज्ञानिक शोधकर्ता | Pt. Kunwarlal jain "vyas"

Sooraj Krishna Shastri
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पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास': वैदिक इतिहास और कालखंडों के वैज्ञानिक शोधकर्ता

पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास': वैदिक इतिहास और कालखंडों के वैज्ञानिक शोधकर्ता

औपनिवेशिक इतिहासलेखन को चुनौती देने वाले वह मूर्धन्य इतिहासकार और खगोल-विद्वान, जिन्होंने ग्रहीय स्थितियों (Astronomical data) के आधार पर वैदिक सभ्यता की प्राचीनता को सिद्ध किया और जैन एवं वैदिक परम्पराओं के मध्य ऐतिहासिक समन्वय स्थापित किया।

1. प्रस्तावना: भारतीय इतिहास की काल-समस्या (Chronological Crisis)

भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि 19वीं सदी में पश्चिमी विद्वानों (जैसे मैक्समूलर, ए.बी. कीथ आदि) ने इसका काल-निर्धारण (Chronology) बाइबल की मान्यताओं और भाषाई अनुमानों के आधार पर कर दिया। उन्होंने यह मान लिया कि सृष्टि की उत्पत्ति 4004 ईसा पूर्व हुई है, अतः ऋग्वेद की रचना 1200 ईसा पूर्व से अधिक पुरानी नहीं हो सकती।

इस भ्रामक और कपोल-कल्पित (Hypothetical) इतिहासलेखन का डटकर सामना करने वाले भारतीय विद्वानों में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और शंकर बालकृष्ण दीक्षित के पश्चात पंडित कुंवरलाल जैन 'व्यास' का नाम प्रमुखता से आता है। उन्होंने केवल 'आस्था' के आधार पर नहीं, बल्कि वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित 'नक्षत्रों और ग्रहीय स्थितियों' (Astronomical Configurations) के कठोर गणितीय साक्ष्यों के आधार पर वैदिक कालखंडों का सटीक वैज्ञानिक पुनर्निर्धारण किया।

📌 पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास': एक अकादमिक एवं ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम पंडित कुंवरलाल जैन (उपाधि: 'व्यास')
काल निर्धारण 20वीं शताब्दी - आधुनिक इतिहास-शोध के प्रमुख पुरोधा
अकादमिक उपाधि 'व्यास' (वेदों, पुराणों और इतिहास के विश्वकोशीय ज्ञान के कारण प्रदत्त सम्मान)
मुख्य शोध क्षेत्र वैदिक काल-निर्धारण (Vedic Chronology), आर्कियो-एस्ट्रोनॉमी (खगोलीय इतिहास)
ऐतिहासिक दृष्टिकोण जैन आगमों और वैदिक संहिताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर समान प्राचीनता सिद्ध करना
मुख्य प्रतिपादन वेदों की रचना 1200 ई.पू. में नहीं, बल्कि हज़ारों वर्ष पूर्व (खगोलीय साक्ष्यों के आधार पर) हुई।

2. जीवन और उपाधि: एक जैन विद्वान कैसे बने 'व्यास'?

पं. कुंवरलाल का जन्म एक जैन परिवार में हुआ था। सामान्यतः माना जाता है कि जैन विद्वान केवल 'श्रमण परम्परा' या प्राकृत साहित्य तक सीमित रहते हैं। परन्तु पं. कुंवरलाल की मेधा असाधारण थी।

उन्होंने जैन आगमों के साथ-साथ चारों वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत का ऐसा सांगोपांग (Comprehensive) अध्ययन किया कि तत्कालीन विद्वत-समाज आश्चर्यचकित रह गया। उनके इसी अगाध, समन्वयवादी और विश्वकोशीय (Encyclopedic) ज्ञान के कारण उन्हें महर्षि वेदव्यास की स्मृति में 'व्यास' की उपाधि से अलंकृत किया गया। उनका सम्पूर्ण जीवन एक तपस्वी इतिहासकार की भाँति 'सत्य' की खोज में बीता।

3. खगोलीय काल-निर्धारण (Archaeo-Astronomy) का वैज्ञानिक मॉडल

पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास' की शोध-पद्धति का मूल आधार आर्कियो-एस्ट्रोनॉमी (खगोलीय पुरातत्व) था।

अयन-चलन (Precession of the Equinoxes) का सिद्धांत

पृथ्वी अपनी धुरी पर लट्टू की तरह घूमती है, जिससे वसंत सम्पात (Vernal Equinox) का बिंदु धीरे-धीरे नक्षत्रों के सापेक्ष पीछे खिसकता है। यह एक निश्चित खगोलीय गति है (लगभग 72 वर्षों में 1 डिग्री)।

पं. कुंवरलाल ने बताया कि वैदिक ऋषियों ने 'समय' बताने के लिए अपने मंत्रों में दर्ज़ किया था कि अमुक यज्ञ के समय 'वसंत सम्पात' किस नक्षत्र में था (जैसे कृत्तिका, मृगशिरा या अदिति)। यह एक 'कॉस्मिक घड़ी' (Cosmic Clock) है। इस खगोलीय डाटा को कंप्यूटर या गणितीय गणना में डालकर उस काल का 100% सटीक वर्ष (Exact Year) निकाला जा सकता है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।

4. वेदों की प्राचीनता: मैक्समूलर के 1200 ई.पू. के सिद्धांत का खण्डन

जब मैक्समूलर ने वेदों को 1200 ई.पू. का बताया था, तो उसने स्वयं स्वीकार किया था कि यह केवल एक 'अनुमान' है। फिर भी, बाद के इतिहासकारों ने इसे 'पत्थर की लकीर' मान लिया।

पं. कुंवरलाल 'व्यास' ने शतपथ ब्राह्मण का उद्धरण प्रस्तुत किया— "कृत्तिकास्वग्निमादधीत... एता ह वै प्राच्यै दिशो न च्यवन्ते" (कृत्तिका नक्षत्र पूर्व दिशा से नहीं हटता)। खगोल विज्ञान के अनुसार कृत्तिका नक्षत्र ठीक पूर्व (Exact East) में केवल 2950 ईसा पूर्व (लगभग 3000 BCE) के आस-पास ही उदित होता था।

इससे सिद्ध हुआ कि ब्राह्मण ग्रंथों का रचनाकाल ही 3000 ईसा पूर्व है। ऋग्वेद में वसंत सम्पात 'मृगशिरा' और 'पुनर्वसु' (अदिति) नक्षत्रों में बताया गया है, जो गणितीय गणना के अनुसार 4000 ईसा पूर्व से 6000 ईसा पूर्व के काल को इंगित करता है। इस अकाट्य गणितीय साक्ष्य ने पाश्चात्य काल-निर्धारण की धज्जियां उड़ा दीं।

5. रामायण और महाभारत का सटीक ऐतिहासिक काल-निर्धारण

पाश्चात्य इतिहासकार रामायण और महाभारत को 'मिथक' (Mythology) मानते थे। पं. कुंवरलाल जी ने इन महाकाव्यों में महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास द्वारा दर्ज़ की गई ग्रहीय स्थितियों (Planetary positions) का अध्ययन किया।

  • महाभारत काल: भीष्म पर्व में महाभारत युद्ध से पूर्व ग्रहणों (Eclipses) और ग्रहों की स्थिति का स्पष्ट वर्णन है (जैसे शनि का रोहिणी को पीड़ित करना)। पं. कुंवरलाल ने इन साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट किया कि महाभारत युद्ध 3100 ईसा पूर्व (अर्थात आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व) एक ऐतिहासिक यथार्थ था, कोई काव्य-कल्पना नहीं।
  • रामायण काल: उन्होंने राम के जन्म के समय ग्रहों की उच्च स्थिति (Planetary exaltations in specific zodiacs) का खगोलीय मूल्यांकन कर रामायण को महाभारत से कई सहस्राब्दी पूर्व का एक वास्तविक ऐतिहासिक कालखंड सिद्ध किया।

6. 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (AIT) का साहित्यिक और खगोलीय खण्डन

आर्यन आक्रमण सिद्धांत यह मानता है कि आर्य मध्य एशिया से आए और उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता को नष्ट किया।

स्वदेशी आर्य और निरंतरता (Indigenous Continuity)

पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास' ने तर्क दिया कि यदि आर्य बाहर से आए होते, तो वेदों में मध्य एशिया या यूरोप के नक्षत्रों (Skymap) का वर्णन होता। परन्तु वेदों का सम्पूर्ण खगोल-विज्ञान, ऋतु-चक्र (सिक्स सीज़न्स) और नक्षत्र-मण्डल विशुद्ध रूप से 'भारतीय उपमहाद्वीप' (20° से 30° अक्षांश) से देखा गया है।

उन्होंने सिद्ध किया कि भारत का इतिहास एक 'निरंतरता' (Continuity) का इतिहास है, जिसमें कोई बाहरी आक्रमणकारी विखंडन नहीं हुआ। आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और वैदिक एवं सिंधु सभ्यता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

7. जैन और वैदिक परम्पराओं का ऐतिहासिक समन्वय (ऋषभदेव और शिव)

पं. कुंवरलाल जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'समन्वयवादी' (Synthetic) दृष्टिकोण था। अक्सर ऐसा माना जाता है कि जैन और वैदिक परम्पराएँ एक-दूसरे के विरोध में जन्मीं।

उन्होंने ऋग्वेद और जैन आगमों का तुलनात्मक अध्ययन कर यह सिद्ध किया कि दोनों परम्पराओं की जड़ें एक ही अत्यंत प्राचीन 'भारतीय आध्यात्मिक चिंतन' में हैं। उन्होंने ऋग्वेद और भागवत पुराण में वर्णित 'ऋषभदेव' (जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं) के ऐतिहासिक साक्ष्यों को प्रस्तुत किया। उन्होंने दिखाया कि वैदिक 'रुद्र' / 'शिव' (पशुपति, दिगंबर, योगी) और जैन 'ऋषभदेव' के प्रतीकों में अद्भुत समानता है। उनका यह शोध साम्प्रदायिक दूरियों को मिटाकर भारत की 'सांस्कृतिक एकता' (Cultural Unity) को स्थापित करता है।

8. प्रमुख ऐतिहासिक और साहित्यिक अवदान

पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास' ने इतिहास, खगोलशास्त्र और दर्शन पर विपुल साहित्य रचा। उनके शोध-निबंध विभिन्न ऐतिहासिक जर्नल्स और सम्मेलनों में प्रकाशित हुए।

  • वैदिक काल-निर्धारण और खगोलीय साक्ष्यों पर उनके विस्तृत शोध-ग्रंथ।
  • जैन और वैदिक साहित्य का तुलनात्मक और ऐतिहासिक अनुशीलन।
  • महाभारत और रामायण की ऐतिहासिकता (Historicity) को सिद्ध करने वाले अकाट्य वैज्ञानिक प्रलेख (Documents)।

9. निष्कर्ष: भारतीय इतिहास के सच्चे पुनरुद्धारक

इतिहास केवल राजाओं के युद्धों की कहानियाँ नहीं है; यह एक राष्ट्र की 'स्मृति' (Memory) है। जब अंग्रेजों ने भारत की इस स्मृति को नष्ट कर उसे केवल 3000 वर्ष पुराना बता दिया था, तब पं. कुंवरलाल जैन 'व्यास' जैसे मनीषियों ने 'खगोल-विज्ञान' के अस्त्र से भारत के इतिहास को पुनः 10,000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन और गौरवशाली सिद्ध किया।

आज जब 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (AIT) वैश्विक स्तर पर झूठा साबित हो चुका है और 'आर्कियो-एस्ट्रोनॉमी' को इतिहास-शोध का सबसे प्रामाणिक टूल माना जाता है, तो हमें पं. कुंवरलाल जी के उस मौन तप को याद करना चाहिए। उन्होंने सम्प्रदायों (जैन और वैदिक) की दीवारों को लांघकर केवल 'सत्य' और 'विज्ञान' का साथ दिया। भारतीय इतिहासलेखन उनका युगों-युगों तक ऋणी रहेगा।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वैदिक क्रोनोलॉजी (Vedic Chronology) - खगोलीय साक्ष्यों पर आधारित विभिन्न शोध पत्र।
  • The Orion & The Arctic Home in the Vedas - Bal Gangadhar Tilak (जिस परम्परा को पं. कुंवरलाल ने आगे बढ़ाया)।
  • जैन और वैदिक परम्पराओं का ऐतिहासिक समन्वय (Historical synthesis of Indian traditions)।
  • प्राचीन भारतीय इतिहास की खगोलीय तिथियाँ (Astronomical Dating of Ancient Indian History)।

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